भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 1673

दिष्ट्या भवद्भिर्बलिभिः शक्तैः सर्वैर्न हिंसितः । दुर्वृत्तो धार्तराष्ट्रोऽयं सामात्यज्ञातिबान्धवः ॥ १४ ॥ 'आप सब लोग बलवान् और सामर्थ्यशाली हैं। आपने मन्त्रियों तथा जाति-भाइयोंसहित इस दुराचारी दुर्योधनका वध नहीं किया, यह बड़े सौभाग्यकी बात है ॥ १४ ॥

उपकारो महांस्तात कृतोऽयं मम खेचरैः । कुलं न परिभूतं मे मोक्षणेऽस्य दुरात्मनः ॥ १५ ॥ 'तात! आकाशचारी गन्धर्वोंने यह मेरा बहुत बड़ा उपकार किया कि इस दुरात्माको छोड़ दिया, इसलिये मेरे कुलका अपमान नहीं हुआ ॥ १५ ॥

आज्ञापयध्वमिष्टानि प्रीयामो दर्शनेन वः । प्राप्य सर्वानभिप्रायांस्ततो व्रजत मा चिरम् ॥ १६ ॥ 'गन्धर्वो! अपनी अभीष्ट सेवाके लिये हमें आज्ञा दीजिये। हम सब लोग आपके दर्शनसे बहुत प्रसन्न हैं। अपनी समस्त मनोवांछित वस्तुओंको प्राप्त करनेके पश्चात् यहाँसे शीघ्रतापूर्वक प्रस्थान कीजियेगा ॥ १६ ॥

अनुज्ञातास्तु गन्धर्वाः पाण्डुपुत्रेण धीमता । सहाप्सरोभिः संहृष्टाश्चित्रसेनमुखा ययुः ॥ १७ ॥ बुद्धिमान् पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरसे आज्ञा लेकर चित्रसेन आदि सब गन्धर्व अप्सराओंके साथ प्रसन्नतापूर्वक वहाँसे विदा हुए ॥ १७ ॥

(देवलोकं ततो गत्वा गन्धर्वैः सहितस्तदा । न्यवेदयच्च तत् सर्वं चित्रसेनः शतक्रतोः ॥) देवराडपि गन्धर्वान् मृतांस्तान् समजीवयत् । दिव्येनामृतवर्षेण ये हताः कौरवैर्युधि ॥ १८ ॥ तदनन्तर गन्धर्वोंसहित चित्रसेनने देवलोकमें पहुँचकर देवराज इन्द्रके समक्ष सब समाचार निवेदन किया। युद्धमें कौरवोंद्वारा जो गन्धर्व मारे गये थे, उन सबको देवराज इन्द्रने दिव्य अमृतकी वर्षा करके जिला दिया ॥ १८ ॥

ज्ञातींस्तानवमुच्याथ राजदारांश्च सर्वशः । कृत्वा च दुष्करं कर्म प्रीतियुक्ताश्च पाण्डवाः ॥ १९ ॥ सस्त्रीकुमारैः कुरुभिः पूज्यमाना महारथाः । बभ्राजिरे महात्मानः क्रतुमध्ये यथाग्नयः ॥ २० ॥ इस प्रकार उन सब भाई-बंधुओं एवं राजकुलकी महिलाओंको गन्धर्वोंसे छुड़ाकर एवं दुष्कर पराक्रम करके प्रसन्न हुए महारथी महामना पाण्डव स्त्री-बालकोंसहित कौरवोंद्वारा पूजित एवं प्रशंसित हो यज्ञ-मण्डपमें प्रज्वलित अग्नियोंके समान देदीप्यमान हो रहे थे ॥ १९-२० ॥