महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ
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संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 1674
ततो दुर्योधनं मुक्तं भ्रातृभिः सहितस्तदा । युधिष्ठिरस्तु प्रणयादिदं वचनमब्रवीत् ॥ २१ ॥ तदनन्तर बन्धनमुक्त हुए दुर्योधनसे भाइयोंसहित युधिष्ठिरने प्रेमपूर्वक यह बात कही — ॥ २१ ॥
मा स्म तात पुनः कार्षीरीदृशं साहसं क्वचित् । न हि साहसकर्तारः सुखमेधन्ति भारत ॥ २२ ॥ ‘तात! फिर कभी ऐसा दुःसाहस न करना। भारत! दुःसाहस करनेवाले मनुष्य कभी सुखी नहीं होते ॥ २२ ॥
स्वस्तिमान् सहितः सर्वैर्भ्रातृभिः कुरुनन्दन । गृहान् व्रज यथाकामं वैमनस्यं च मा कृथाः ॥ २३ ॥ ‘कुरुनन्दन! अब तुम अपने सब भाइयोंके साथ कुशलपूर्वक इच्छानुसार घर जाओ। हमलोगोंके प्रति मनमें वैमनस्य न रखना? ॥ २३ ॥
वैशम्पायन उवाच
पाण्डवेनाभ्यनुज्ञातो राजा दुर्योधनस्तदा । प्रणम्य धर्मपुत्रं तु गतेन्द्रिय इवातुरः ॥ २४ ॥