महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रूयतां तु प्रभो तत्त्वं दिव्यतां चात्मनो नृप । निर्माणं च शरीरस्य ततो धैर्यमवाप्नुहि ॥ ५ ॥ प्रभो! एक रहस्यकी बात सुनिये। नरेश्वर! आपका स्वरूप दिव्य है तथा आपके शरीरका निर्माण भी अद्भुत प्रकारसे हुआ है। यह हमलोगोंसे सुनकर धैर्य धारण कीजिये ॥ ५ ॥
पुरा त्वं तपसास्माभिर्लब्धो राजन् महेश्वरात् । पूर्वकायश्च पूर्वस्ते निर्मितो वज्रसंचयैः ॥ ६ ॥ राजन्! पूर्वकालमें हमलोगोंने तपस्याद्वारा भगवान् शंकरकी आराधना करके आपको प्राप्त किया था। आपके शरीरका पूर्वभाग—जो नाभिसे ऊपर है, वज्रसमूहसे बना हुआ है ॥ ६ ॥
अस्त्रैरभेद्यः शस्त्रैश्चाप्यधः कायश्च तेऽनघ । कृतः पुष्पमयो देव्या रूपतः स्त्रीमनोहरः ॥ ७ ॥ वह किसी भी अस्त्र-शस्त्रसे विदीर्ण नहीं हो सकता। अनघ! उसी प्रकार आपका नाभिसे नीचेका शरीर पार्वतीदेवीने पुष्पमय बनाया है, जो अपने रूप-सौन्दर्यसे स्त्रियोंके मनको मोहनेवाला है ॥ ७ ॥
एवमीश्वरसंयुक्तस्तव देहो नृपोत्तम । देव्या च राजशार्दूल दिव्यस्त्वं हि न मानुषः ॥ ८ ॥