भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 1699

नृपश्रेष्ठ! इस प्रकार आपका शरीर देवी पार्वतीके साथ साक्षात् भगवान् महेश्वरने संघटित किया है। अतः राजसिंह! आप मनुष्य नहीं, दिव्य पुरुष हैं॥ ८॥ क्षत्रियाश्च महावीर्या भगदत्तपुरोगमाः । दिव्यास्त्रविदुषः शूराः क्षपयिष्यन्ति ते रिपून् ॥ ९ ॥ भगदत्त आदि महापराक्रमी क्षत्रिय दिव्यास्त्रोंके ज्ञाता तथा शौर्यसम्पन्न हैं। वे आपके शत्रुओंका संहार करेंगे।। तदलं ते विषादेन भयं तव न विद्यते । साहाय्यार्थं च ते वीराः सम्भूता भुवि दानवाः ॥ १० ॥ अतः आपको शोक करनेकी आवश्यकता नहीं है। आपको कोई भय नहीं है। आपकी सहायताके लिये बहुत-से वीर दानव भूतलपर प्रकट हो चुके हैं।। १० ।। भीष्मद्रोणकृपादींश्च प्रवेक्ष्यन्त्यपरेऽसुराः । यैराविष्टा घृणां त्यक्त्वा योत्स्यन्ते तव वैरिभिः ॥ ११ ॥ दूसरे भी अनेक असुर भीष्म, द्रोणाचार्य और कृपाचार्य आदिके शरीरोंमें प्रवेश करेंगे, जिनसे आविष्ट होकर वे लोग दयाको त्यागकर आपके शत्रुओंके साथ युद्ध करेंगे ।। ११ ।। नैव पुत्रान् न च भ्रातॄन् न पितॄन् च बान्धवान् । नैव शिष्यान् न च ज्ञातीन् न बालात् स्थविरान् न च ॥ १२ ॥ युधि सम्प्रहरिष्यन्तो मोक्ष्यन्ति कुरुसत्तम । निःस्नेहा दानवाविष्टाः समाक्रान्तेऽन्तरात्मनि ॥ १३ ॥ कुरुश्रेष्ठ! दानवोंका आवेश होनेपर भीष्म, द्रोण आदिकी अन्तरात्मापर भी उन दानवोंका ही अधिकार हो जायगा। उस दशामें युद्धमें स्नेहरहित हो प्रहार करते हुए वे लोग पुत्रों, भाइयों, पितृजनों, बान्धवों, शिष्यों, कुटुम्बीजनों, बालकों तथा बूढ़ोंको भी नहीं छोड़ेंगे ।। प्रहरिष्यन्ति विवशाः स्नेहमुत्सृज्य दूरतः । हृष्टाः पुरुषशार्दूलाः कलुषीकृतमानसाः । अविज्ञानविमूढाश्च दैवाच्च विधिनिर्मितात् ॥ १४ ॥ वे पुरुषसिंह भीष्म आदि वीर (दानवोंके आवेशके कारण) विवश होकर अज्ञानसे मोहित हो जायँगे। उनके मनमें मलिनता आ जायगी और वे स्नेहको दूर छोड़कर प्रसन्नतापूर्वक अस्त्र-शस्त्रोंद्वारा प्रहार करेंगे। इसमें विधिनिर्मित होनहार ही कारण है ॥ १४ ॥ व्याभाषमाणाश्चान्योन्यं न मे जीवन् विमोक्ष्यसे । सर्वे शस्त्रास्त्रमोक्षेण पौरुषे समवस्थिताः ॥ १५ ॥ श्लाघमानाः कुरुश्रेष्ठ करिष्यन्ति जनक्षयम् ।