भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 1700, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 1700

एक-दूसरेके विरुद्ध भाषण करते हुए वे सब योद्धा कहेंगे—'आज तू मेरे हाथोंसे जीवित नहीं बच सकता।' कुरुश्रेष्ठ! इस प्रकार सभी अस्त्र-शस्त्रोंकी वर्षा करते हुए पराक्रमपर डटे रहेंगे और परस्पर होड़ लगाकर जनसंहार करेंगे ।। १५१/२ ।। तेऽपि पञ्च महात्मानः प्रतियोत्स्यन्ति पाण्डवाः ।। १६ ।। वधं चैषां करिष्यन्ति दैवयुक्ता महाबलाः । वे दैवप्रेरित महाबली महात्मा पाँचों पाण्डव भी इन भीष्म आदिका सामना करते हुए इनका वध करेंगे ।। १६१/२ ।। दैत्यरक्षोगणाश्चैव सम्भूताः क्षत्रयोनिषु ।। १७ ।। योत्स्यन्ति युधि विक्रम्य शत्रुभिस्तव पार्थिव । गदाभिर्मुसलैः शूलैः शस्त्रैरुच्चावचैस्तथा ।। १८ ।। (प्रहरिष्यन्ति ते वीरास्तवारिषु महाबलाः ।) राजन्! दैत्यों तथा राक्षसोंके समुदाय क्षत्रिययोनिमें उत्पन्न हुए हैं, जो आपके शत्रुओंके साथ पराक्रमपूर्वक युद्ध करेंगे। वे महाबली वीर दैत्य आपके शत्रुओंपर गदा, मुसल, शूल तथा अन्य छोटे-बड़े अस्त्र-शस्त्रोंद्वारा प्रहार करेंगे ।। १७-१८ ।। यच्च तेऽन्तर्गतं वीर भयमर्जुनसम्भवम् । तत्रापि विहितोऽस्माभिर्वधोपायोऽर्जुनस्य वै ।। १९ ।। वीर! आपके भीतर जो अर्जुनका भय समाया हुआ है, वह भी निकाल देना चाहिये; क्योंकि हमलोगोंने अर्जुनके वधका उपाय भी कर लिया है ।। १९ ।। हतस्य नरकस्यात्मा कर्णमूर्तिमुपाश्रितः । तद् वैरं संस्मरन् वीर योत्स्यते केशवार्जुनौ ।। २० ।। श्रीकृष्णके हाथों जो नरकासुर मारा गया है, उसकी आत्मा कर्णके शरीरमें घुस गयी है। वीरवर! वह (नरकासुर) उस वैरको याद करके श्रीकृष्ण और अर्जुनसे युद्ध करेगा ।। २० ।। स ते विक्रमशौटीरो रणे पार्थं विजेष्यति । कर्णः प्रहरतां श्रेष्ठः सर्वांश्चारीन् महारथः ।। २१ ।। महारथी कर्ण योद्धाओंमें श्रेष्ठ और अपने पराक्रमपर गर्व रखनेवाला है। वह रणभूमिमें अर्जुन तथा आपके अन्य सब शत्रुओंपर अवश्य विजयी होगा ।। २१ ।। ज्ञात्वैतच्छद्मना वज्री रक्षार्थं सव्यसाचिनः । कुण्डले कवचं चैव कर्णस्यापहरिष्यति ।। २२ ।। इस बातको समझकर वज्रधारी इन्द्र अर्जुनकी रक्षाके लिये छल करके कर्णके कुण्डल और कवचका अपहरण कर लेंगे ।। २२ ।। तस्मादस्माभिरप्यत्र दैत्याः शतसहस्रशः । नियुक्ता राक्षसाश्चैव ये ते संशप्तका इति ।। २३ ।।

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