भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 1701

प्रख्यातास्तेऽर्जुनं वीरं हनिष्यन्ति च मा शुचः । असपत्ना त्वया हीयं भोक्तव्या वसुधा नृप ॥ २४ ॥ इसीलिये हमलोगोंने भी एक लाख दैत्यों तथा राक्षसोंको इस काममें लगा रखा है, जो संशप्तक नामसे विख्यात हैं। वे वीर अर्जुनको मार डालेंगे। अतः आप शोक न करें। नरेश्वर! आपको इस पृथ्वीका निष्कंटक राज्य भोगना है ॥ २३-२४ ॥

मा विषादं गमस्तस्मान्नैतत्त्वय्युपपद्यते । विनष्टे त्वयि चास्माकं पक्षो हीयेत कौरव ॥ २५ ॥ अतः कुरुनन्दन! आप विषाद न करें। यह आपको शोभा नहीं देता है। आपके नष्ट हो जानेपर तो हमारे पक्षका ही नाश हो जायगा ॥ २५ ॥

गच्छ वीर न ते बुद्धिरन्या कार्या कथञ्चन । त्वमस्माकं गतिर्नित्यं देवतानां च पाण्डवाः ॥ २६ ॥ वीरवर! जाइये। अब आपको किसी तरह भी अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये। देखिये, देवताओंने पाण्डवोंका आश्रय ले रखा है; परंतु हमारी गति तो सदा आप ही हैं ॥ २६ ॥

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्त्वा परिष्वज्य दैत्यास्तं राजकुञ्जरम् । समाश्वास्य च दुर्धर्षं पुत्रवद् दानवर्षभाः ॥ २७ ॥ स्थिरां कृत्वा बुद्धिमस्य प्रियाण्युक्त्वा च भारत । गम्यतामित्यनुज्ञाय जयमाप्नुहि चेत्यथ ॥ २८ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! दुर्धर्ष वीर नृपशिरोमणि दुर्योधनसे ऐसा कहकर दैत्यों तथा दानवेश्वरोंने उसे पुत्रकी भाँति हृदयसे लगाया और आश्वासन देकर उसकी बुद्धिको स्थिर किया। भारत! तत्पश्चात् प्रिय वचन बोलकर उन्होंने दुर्योधनको जानेके लिये आज्ञा देते हुए कहा—'अब आप जाइये और शत्रुओंपर विजय प्राप्त कीजिये' ॥ २७-२८ ॥

तैर्विसृष्टं महाबाहुं कृत्या सैवानयत् पुनः । तमेव देशं यत्रासौ तदा प्रायमुपाविशत् ॥ २९ ॥ दैत्योंके विदा करनेपर उसी कृत्याने महाबाहु दुर्योधनको पुनः उसी स्थानपर पहुँचा दिया, जहाँ वह पहले आमरण उपवासके लिये बैठा था ॥ २९ ॥

प्रतिनिक्षिप्य तं वीरं कृत्या समभिपूज्य च । अनुज्ञाता च राज्ञा सा तथैवान्तरधीयत ॥ ३० ॥ वीर राजा दुर्योधनको वहाँ रखकर कृत्याने उसके प्रति सम्मान प्रदर्शित किया और उससे आज्ञा लेकर जैसे आयी थी, वैसे ही अदृश्य हो गयी ॥ ३० ॥