भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 1702, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 1702

गतायामथ तस्यां तु राजा दुर्योधनस्तदा ।
स्वप्रभूतमिदं सर्वमचिन्तयत भारत ॥ ३१ ॥
(सम्पृश्य तानि वाक्यानि दानवोक्तानि दुर्मतिः ।)
विजेष्यामि रणे पाण्डूनिति चास्याभवन्मतिः ।
भारत! कृत्याके चले जानेपर राजा दुर्योधनने इन सारी बातोंको स्वप्न समझा। दैत्योंके कहे हुए वचनोंपर विचार करके दुर्बुद्धि दुर्योधनके मनमें यह संकल्प उदित हुआ कि 'मैं युद्धमें पाण्डवोंको जीत लूँगा' ॥ ३१ ½ ॥
कर्णं संशप्तकांश्चैव पार्थस्यामित्रघातिनः ॥ ३२ ॥
अमन्यत वधे युक्तान् समर्थांश्च सुयोधनः ।
दुर्योधनने यह मान लिया कि संशप्तकगण तथा कर्ण ये शत्रुघाती अर्जुनके वधमें लगे हुए हैं और इसके लिये वे समर्थ हैं ॥ ३२ ½ ॥
एवमाशा दृढा तस्य धार्तराष्ट्रस्य दुर्मतेः ॥ ३३ ॥
विनिर्जये पाण्डवानांमभवद् भरतर्षभ ।
जनमेजय! इस प्रकार उस खोटी बुद्धिवाले धृतराष्ट्रपुत्रके मनमें पाण्डवोंपर विजय पानेकी दृढ़ आशा हो गयी ॥ ३३ ½ ॥
कर्णोऽप्याविष्टचित्तात्मा नरकस्यान्तरात्मना ॥ ३४ ॥
अर्जुनस्य वधे क्रूरां करोति स्म तदा मतिम् ।
इधर कर्ण भी नरकासुरकी अन्तरात्मासे आविष्टचित्त होनेके कारण अर्जुनका वध करनेके लिये क्रूरतापूर्ण संकल्प करने लगा ॥ ३४ ½ ॥
संशप्तकाश्च ते वीरा राक्षसाविष्टचेतसः ॥ ३५ ॥
रजस्तमोभ्यामाक्रान्ताः फाल्गुनस्य वधैषिणः ।
इसी प्रकार राक्षसोंसे आविष्टचित्त होकर वे संशप्तक वीर भी रजोगुण और तमोगुणसे आक्रान्त हो अर्जुनको मार डालनेकी इच्छा रखने लगे ॥ ३५ ½ ॥
भीष्मद्रोणकृपाद्याश्च दानवाक्रान्तचेतसः ॥ ३६ ॥
न तथा पाण्डुपुत्राणां स्नेहवन्तो विशाम्पते ।
राजन्! भीष्म, द्रोण और कृपाचार्य आदिके मनपर भी दानवोंने अधिकार कर लिया था। अतः पाण्डवोंके प्रति उनका भी वैसा स्नेह नहीं रह गया ॥ ३६ ½ ॥
(कृत्ययाऽऽनाय्यकथितं यत् तस्यां निशि दानवैः ।)
न चाचचक्षे कस्मैचिदेतद् राजा सुयोधनः ॥ ३७ ॥
दानवोंने रातमें कृत्याद्वारा अपने यहाँ बुलाकर जो बातें कही थीं, उन्हें राजा दुर्योधनने किसीपर भी प्रकट नहीं किया ॥ ३७ ॥
दुर्योधनं निशान्ते च कर्णो वैकर्तनोऽब्रवीत् ।

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