महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1704, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंयुक्त अपनी चतुरंगिणी सेनाको तैयार होनेकी आज्ञा दी। राजन्! वह विशाल वाहिनी गंगाके प्रवाहके समान चलने लगी ॥ ४५-४६ ॥
श्वेतच्छत्रैः पताकाभिश्चामरैश्च सुपाण्डुरैः । रथैर्नागैः पदातैश्च शुशुभेऽतीव संकुला ॥ ४७ ॥ व्यपेताभ्रघने काले द्यौरिवाव्यक्तशारदी ।
श्वेत छत्र, पताका, शुभ चँवर, रथ, हाथी और पैदल योद्धाओंसे भरी हुई वह कौरव-सेना शरत्कालमें कुछ-कुछ व्यक्त शारदीय सुषमासे सुशोभित आकाशकी भाँति शोभा पा रही थी ॥ ४७१/२ ॥
जयाशीर्भिर्द्विजेन्द्रैः स स्तूयमानोऽधिराजवत् ॥ ४८ ॥ गृह्णन्नञ्जलिमालाश्च धार्तराष्ट्रो जनाधिपः । सुयोधनो ययावग्रे श्रिया परमया ज्वलन् ॥ ४९ ॥
धृतराष्ट्रपुत्र राजा दुर्योधन सम्राट्की भाँति श्रेष्ठ ब्राह्मणोंके मुखसे विजयसूचक आशीर्वादोंके साथ अपनी स्तुति सुनता तथा लोगोंकी प्रणामाञ्जलियोंको ग्रहण करता हुआ उत्कृष्ट शोभासे प्रकाशित हो आगे-आगे चला ॥ ४८-४९ ॥
कर्णेन सार्धं राजेन्द्र सौबलेन च देविना । दुःशासनादयश्चास्य भ्रातरः सर्व एव ते ॥ ५० ॥ भूरिश्रवाः सोमदत्तो महाराजश्च बाह्निकः । रथैर्नानाविधाकारैर्हयैर्गजवरैस्तथा ॥ ५१ ॥ प्रयान्तं नृपसिंहं तमनुजग्मुः कुरूद्वहाः । कालेनाल्पेन राजेन्द्र स्वपुरं विविशुस्तदा ॥ ५२ ॥
राजेन्द्र! कर्ण तथा द्यूतकुशल शकुनिके साथ दुःशासन आदि सब भाई, भूरिश्रवा, सोमदत्त तथा महाराज बाह्लीक—ये सभी कुरुकुलरत्न नाना प्रकारके रथों, गजराजों तथा घोड़ोंपर बैठकर राजसिंह दुर्योधनके पीछे-पीछे चल रहे थे। जनमेजय! थोड़े समयमें उन सबने अपनी राजधानी हस्तिनापुरमें प्रवेश किया ॥ ५०—५२ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि घोषयात्रापर्वणि दुर्योधनपुरप्रवेशे द्विपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २५२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत घोषयात्रापर्वमें दुर्योधनका नगरमें प्रवेशविषयक दो सौ बावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २५२ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका ११/२ श्लोक मिलाकर कुल ५३ १/२ श्लोक हैं)