महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1707, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंराजेन्द्र! राजकुमार! जब सेनासहित तुम चीखते-चिल्लाते रहे उस समय महात्मा पाण्डवोंने जो पराक्रम कर दिखाया था वह भी तुमने प्रत्यक्ष देखा है ।। ७ १/२ ।। कर्णस्य च महाबाहो सूतपुत्रस्य दुर्मतेः ॥ ८ ॥ न चापि पादभाक् कर्णः पाण्डवानां नृपोत्तम । धनुर्वेदे च शौर्ये च धर्मे वा धर्मवत्सल ॥ ९ ॥ महाबाहो! उस समय खोटी बुद्धिवाले सूतपुत्र कर्णका पराक्रम भी तुमसे छिपा नहीं था। नृपश्रेष्ठ! धर्मवत्सल! मेरा तो ऐसा विश्वास है कि धनुर्वेद, शौर्य और धर्माचरणमें कर्ण पाण्डवोंकी अपेक्षा चौथाई योग्यता भी नहीं रखता है ।। ८-९ ।। तस्मादहं क्षमं मन्ये पाण्डवैस्तैर्महात्मभिः । संधिं संधिविदां श्रेष्ठ कुलस्यास्य विवृद्धये ॥ १० ॥ ‘अतः संधिवेत्ताओंमें श्रेष्ठ नरेश! मैं तो इस कुलके अभ्युदयके लिये उन महात्मा पाण्डवोंके साथ संधि कर लेना ही उचित समझता हूँ’ ।। १० ।। एवमुक्तश्च भीष्मेण धार्तराष्ट्रो जनेश्वरः । प्रहस्य सहसा राजन् विप्रतस्थे ससौबलः ॥ ११ ॥ राजन्! भीष्मके ऐसा कहनेपर राजा दुर्योधन हँस पड़ा और शकुनिके साथ सहसा वहाँसे अन्यत्र चला गया ।। ११ ।। तं तु प्रस्थितमाज्ञाय कर्णदुःशासनादयः । अनुजग्मुर्महेष्वासा धार्तराष्ट्रं महाबलम् ॥ १२ ॥ महाबली दुर्योधनको अन्यत्र गया जान कर्ण और दुःशासन आदि महान् धनुर्धरोंने उसका अनुसरण किया ।। १२ ।। तांस्तु सम्प्रस्थितान् दृष्ट्वा भीष्मः कुरुपितामहः । लज्जया व्रीडितो राजन् जगाम स्वं निवेशनम् ॥ १३ ॥ राजन्! उन सबको वहाँसे प्रस्थान करते देख कुरुकुलपितामह भीष्म लज्जित होकर अपने आवास-स्थानको चले गये ।। १३ ।। गते भीष्मे महाराज धार्तराष्ट्रो जनेश्वरः । पुनरागम्य तं देशममन्त्रयत मन्त्रिभिः ॥ १४ ॥ महाराज! भीष्मके चले जानेपर राजा दुर्योधन फिर उसी स्थानपर लौट आया और अपने मन्त्रियोंके साथ गुप्त मन्त्रणा करने लगा— ।। १४ ।। किमस्माकं भवेच्छ्रेयः किं कार्यमवशिष्यते । कथं च सुकृतं तत् स्यान्मन्त्रयामोऽद्य यद्धितम् ॥ १५ ॥ ‘मित्रो! क्या करनेसे हमलोगोंकी भलाई होगी? हमारे लिये कौन-सा कार्य शेष रह गया है? कैसे करनेसे हमारा कार्य शुभ परिणामजनक होगा? क्या करनेमें हमारा हित है? आज इसी विषयपर हमलोगोंको विचार करना है’ ।। १५ ।।