महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1708, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंकर्ण उवाच
दुर्योधन निबोधेदं यत् त्वां वक्ष्यामि कौरव ।
भीष्मोऽस्मान् निन्दति सदा पाण्डवांश्च प्रशंसति ॥ १६ ॥
**कर्ण बोला—**कुरुकुलरत्न दुर्योधन! मैं तुमसे जो कुछ कह रहा हूँ, उसपर ध्यान दो। भीष्म सदा हमारी निन्दा और पाण्डवोंकी प्रशंसा करते रहते हैं ॥ १६ ॥
त्वद् द्वेषाच्च महाबाहो ममापि द्वेष्टुमर्हति ।
विगर्हते च मां नित्यं त्वत्समीपे नरेश्वर ॥ १७ ॥
महाबाहो! वे तुम्हारे प्रति द्वेष होनेसे मुझसे भी द्वेष रखते हैं। नरेश्वर! तुम्हारे सामने वे सदा मेरी निन्दा ही किया करते हैं ॥ १७ ॥
सोऽहं भीष्मवचस्तद् वै न मृष्यामीह भारत ।
त्वत्समक्षं यदुक्तं च भीष्मेणामित्रकर्षण ॥ १८ ॥
पाण्डवानां यशो राजंस्तव निन्दां च भारत ।
अनुजानीहि मां राजन् सभृत्यबलवाहनम् ॥ १९ ॥
भारत! तुम्हारे सामने भीष्मने जो कुछ कहा है, उसे मैं सहन नहीं कर सकता। शत्रुदमन! भरतकुलनन्दन! उन्होंने जो पाण्डवोंका यश गाया और तुम्हारी निन्दा की है, यह मेरे लिये असह्य है। अतः तुम मुझे सेवक, सेना तथा सवारियोंके साथ दिग्विजय करनेकी आज्ञा दो ॥
जेष्यामि पृथिवीं राजन् सशैलवनकाननाम् ।
जिता च पाण्डवैर्भूमिश्चतुर्भिर्बलशालिभिः ॥ २० ॥
तामहं ते विजेष्यामि एक एव न संशयः ।
सम्पश्यतु सुदुर्बुद्धिर्भीष्मः कुरुकुलाधमः ॥ २१ ॥
राजन्! मैं पर्वत, वन और काननोंसहित सारी पृथ्वीको जीत लूँगा। जिस भूमिपर चार बलशाली पाण्डवोंने मिलकर विजय पायी है उसे मैं तुम्हारे लिये अकेला ही जीत लूँगा, इसमें संशय नहीं है। खोटी बुद्धिवाला कुरु-कुलाधम भीष्म मेरे इस पराक्रमको अपनी आँखों देखे ॥
अनिन्द्यं निन्दते यो हि अप्रशंस्यं प्रशंसति ।
स पश्यतु बलं मेऽद्य आत्मानं तु विगर्हतु ॥ २२ ॥
जो अनिन्दनीयकी निन्दा और अप्रशंसनीयकी प्रशंसा करता है, वह भीष्म आज मेरा बल देख ले और अपने-आपको धिक्कारे ॥ २२ ॥
अनुजानीहि मां राजन् ध्रुवो हि विजयस्तव ।
प्रतिजानामि ते सत्यं राजन्नायुधमालभे ॥ २३ ॥
राजन्! मुझे आज्ञा दो। तुम्हारी विजय निश्चित है। यह मैं तुमसे प्रतिज्ञापूर्वक सत्य कहता हूँ और शस्त्र छूकर शपथ करता हूँ ॥ २३ ॥