महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1709, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंतच्छ्रुत्वा तु वचो राजन् कर्णस्य भरतर्षभ । प्रीत्या परमया युक्तः कर्णमाह नराधिपः ॥ २४ ॥ भरतश्रेष्ठ राजन्! कर्णकी यह बात सुनकर राजा दुर्योधनने बड़ी प्रसन्नताके साथ उससे कहा— ॥ २४ ॥
धन्योऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि यस्य मे त्वं महाबलः । हितेषु वर्तसे नित्यं सफलं जन्म चाद्य मे ॥ २५ ॥ ‘वीर! मैं धन्य हूँ, तुम्हारे अनुग्रहका पात्र हूँ; क्योंकि तुम-जैसे महाबली सुहृद् सदा मेरे हितसाधनमें लगे रहते हैं। आज मेरा जन्म सफल हो गया ॥ २५ ॥
यदा च मन्यसे वीर सर्वशत्रुनिबर्हणम् । तदा निर्गच्छ भद्रं ते ह्यनुशाधि च मामिति ॥ २६ ॥ ‘वीरवर! जब तुम्हें विश्वास है कि तुम्हारे द्वारा सब शत्रुओंका संहार हो सकता है तब तुम दिग्विजयके लिये यात्रा करो। तुम्हारा कल्याण हो। मुझे आवश्यक व्यवस्थाके लिये आज्ञा दो ॥ २६ ॥
एवमुक्तस्तदा कर्णो धार्तराष्ट्रेण धीमता । सर्वमाज्ञापयामास प्रायात्रिकमरिंदम ॥ २७ ॥ जनमेजय! बुद्धिमान् दुर्योधनके इस प्रकार कहनेपर कर्णने यात्रासम्बन्धी सारी आवश्यक तैयारीके लिये आज्ञा दे दी ॥ २७ ॥
प्रययौ च महेष्वासो नक्षत्रे शुभदैवते । शुभे तिथौ मुहूर्ते च पूज्यमानो द्विजातिभिः ॥ २८ ॥ मङ्गलैश्च शुभैः स्नातो वाग्भिश्चापि प्रपूजितः । नादयन् रथघोषेण त्रैलोक्यं सचराचरम् ॥ २९ ॥ तदनन्तर महान् धनुर्धर कर्णने मांगलिक शुभ पदार्थोंसे जलके द्वारा स्नान करके द्विजातियोंकी आशीर्वादमय वाणीसे सम्मानित एवं प्रशंसित हो शुभ नक्षत्र, शुभ तिथि और शुभ मुहूर्तमें यात्रा की। उस समय वह अपने रथकी घर्घराहटसे चराचर भूतोंसहित समस्त त्रिलोकीको प्रतिध्वनित कर रहा था ॥ २८-२९ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि घोषयात्रापर्वणि कर्णदिग्विजये त्रिपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २५३ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत घोषयात्रापर्वमें कर्णदिग्विजयविषयक दो सौ तिरपनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २५३ ॥