भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1717

सूतनन्दन! 'पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरके उस क्रतुश्रेष्ठ महान् राजसूययज्ञको देखकर मेरे मनमें

भी उसे करनेकी इच्छा जाग उठी है। तुम इस इच्छाको पूर्ण करो' ।। ६ ।।

एवमुक्तस्ततः कर्णो राजानमिदमब्रवीत् ।

तवाद्य पृथिवीपाला वश्याः सर्वे नृपोत्तम ॥ ७ ॥

आहूयन्तां द्विजवराः सम्भाराश्च यथाविधि ।

सम्भ्रियन्तां कुरुश्रेष्ठ यज्ञोपकरणानि च ।। ८ ।।

दुर्योधनकी यह बात सुनकर कर्णने उससे यह कहा—'नृपश्रेष्ठ! इस समय भूपाल

तुम्हारे वशमें हैं। कुरुकुलश्रेष्ठ! उत्तम ब्राह्मणोंको बुलाओ और विधिपूर्वक यज्ञकी सामग्रियों

तथा उपकरणोंको जुटाओ ।। ७-८ ।।

ऋत्विजश्च समाहूता यथोक्ता वेदपारगाः ।

क्रियां कुर्वन्तु ते राजन् यथाशास्त्रमरिंदम ॥ ९ ॥

'शत्रुदमन नरेश! तुम्हारे द्वारा आमन्त्रित शास्त्रोक्त योग्यतासे सम्पन्न वेदज्ञ ऋत्विक्

विधिके अनुसार सब कार्य करें ।। ९ ।।

बह्वन्नपानसंयुक्तः सुसमृद्धगुणान्वितः ।

प्रवर्त्ततां महायज्ञस्तवापि भरतर्षभ ॥ १० ॥

'भरतश्रेष्ठ! तुम्हारा महायज्ञ भी प्रचुर अन्नपानकी सामग्रीसे युक्त और अत्यन्त

समृद्धिशाली गुणोंसे सम्पन्न हो' ।। १० ।।

एवमुक्तस्तु कर्णेन धार्तराष्ट्रो विशाम्पते ।

पुरोहितं समानाय्य वचनं चेदमब्रवीत् ।। ११ ।।

राजसूयं क्रतुश्रेष्ठं समाप्तवरदक्षिणम् ।

आहर त्वं मम कृते यथान्यायं यथाक्रमम् ।। १२ ।।

राजन्! कर्णके इस प्रकार अनुमोदन करनेपर दुर्योधनने अपने पुरोहितको बुलाकर यह

बात कही—'ब्रह्मन्! आप मेरे लिये उत्तम दक्षिणाओंसे युक्त क्रतुश्रेष्ठ राजसूयका यथोचित

रीतिसे विधिपूर्वक अनुष्ठान करवाइये' ।। ११-१२ ।।

स एवमुक्तो नृपतिमुवाच द्विजसत्तमः ।

(ब्राह्मणैः सहितो राजन् ये तत्रासन् समागताः ।)

न स शक्यः क्रतुश्रेष्ठो जीवमाने युधिष्ठिरे ।। १३ ।।

आहर्तुं कौरवश्रेष्ठ कुले तव नृपोत्तम ।

दीर्घायुर्जीवति च ते धृतराष्ट्रः पिता नृप ।। १४ ।।

अतश्चापि विरुद्धस्ते क्रतुरेष नृपोत्तम ।

नरेश्वर! राजाके इस प्रकार आदेश देनेपर विप्रवर पुरोहितने वहाँ आये हुए अन्य

ब्राह्मणोंके साथ इस प्रकार उत्तर दिया—'कौरवश्रेष्ठ! नृपशिरोमणे! राजा युधिष्ठिरके जीते

आपके कुलमें इस उत्तम क्रतु राजसूयका अनुष्ठान नहीं किया जा सकता। महाराज! अभी