महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1718, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंआपके दीर्घायु पिता धृतराष्ट्र भी जीवित हैं, इसलिये भी यह यज्ञ आपके लिये अनुकूल नहीं पड़ता ।।
अस्ति त्वन्यन्महत् सत्रं राजसूयसमं प्रभो ॥ १५ ॥ प्रभो! एक-दूसरा महान् यज्ञ है, जो राजसूयकी समानता रखता है ॥ १५ ॥
तेन त्वं यज राजेन्द्र शृणु चेदं वचो मम । य इमे पृथिवीपालाः करदास्तव पार्थिव ॥ १६ ॥ ते करान् सम्प्रयच्छन्तु सुवर्णं च कृताकृतम् । तेन ते क्रियतामद्य लाङ्गलं नृपसत्तम ॥ १७ ॥ ‘राजेन्द्र! आप उसीके द्वारा भगवान्का यजन कीजिये और इसके सम्बन्धमें मेरी यह बात सुनिये। पृथ्वीनाथ! ये जो सब भूपाल आपको कर देते हैं, इन्हें आज्ञा दीजिये—ये लोग आपको सुवर्णके बने हुए आभूषण तथा सुवर्ण ‘कर’ के रूपमें अर्पण करें। नृपश्रेष्ठ! उसी सुवर्णसे आप एक हल तैयार करवाइये ॥ १६-१७ ॥
यज्ञवाटस्य ते भूमिः कृष्यतां तेन भारत । तत्र यज्ञो नृपश्रेष्ठ प्रभूतान्नः सुसंस्कृतः ॥ १८ ॥ प्रवर्ततां यथान्यायं सर्वतो ह्यनिवारितः । ‘भारत! उसी हलसे आपके यज्ञमण्डपकी भूमि जोती जाय। नृपश्रेष्ठ! उस जोती हुई भूमिमें ही उत्तम संस्कारसे सम्पन्न, प्रचुर अन्नपानसे युक्त और सबके लिये खुला हुआ यज्ञ यथोचितरूपसे प्रारम्भ किया जाय ॥ १८ १/२ ॥
एष ते वैष्णवो नाम यज्ञः सत्पुरुषोचितः ॥ १९ ॥ एतेन नेष्टवान् कश्चिदृते विष्णुं पुरातनम् । राजसूयं क्रतुश्रेष्ठं स्पर्धत्येष महाक्रतुः ॥ २० ॥ ‘यह मैंने आपको वैष्णव नामक यज्ञ बताया है जिसका अनुष्ठान सत्पुरुषोंके लिये सर्वथा उचित है। पुरातन पुरुष भगवान् विष्णुके सिवा और किसीने अबतक इस यज्ञका अनुष्ठान नहीं किया है। यह महायज्ञ क्रतुश्रेष्ठ राजसूयसे टक्कर लेनेवाला है ॥ १९-२० ॥
अस्माकं रोचते चैव श्रेयश्च तव भारत । निर्विघ्नश्च भवत्येष सफला स्यात् स्पृहा तव ॥ २१ ॥ ‘भारत! हमलोगोंको तो यही यज्ञ पसंद है और यही आपके लिये कल्याणकारी होगा। यह यज्ञ बिना किसी विघ्न-बाधाके सम्पन्न हो जाता है; अतः तुम्हारी यह यज्ञविषयक अभिलाषा भी इसीसे सफल होगी ॥ २१ ॥
(तस्मादेष महाबाहो तव यज्ञः प्रवर्तताम् ।) एवमुक्तस्तु तैर्विप्रैर्धार्तराष्ट्रो महीपतिः । कर्णं च सौबलं चैव भ्रातॄंश्चैवेदमब्रवीत् ॥ २२ ॥