महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1746, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंएषां देवनिकायानां पृथक् पृथगनेकशः । भास्वन्तः कामसम्पन्ना लोकास्तेजोमयाः शुभाः ॥ ७ ॥ मुद्गल! वहाँ देवता, साध्य, विश्वेदेव, महर्षिगण, याम, धाम, गन्धर्व तथा अप्सरा—इन सब देवसमूहोंके अलग-अलग अनेक प्रकाशमान लोक हैं, जो इच्छानुसार प्राप्त होनेवाले भोगोंसे सम्पन्न, तेजस्वी तथा मंगलकारी हैं ॥ ६-७ ॥ त्रयस्त्रिंशत्सहस्राणि योजनानि हिरण्मयः । मेरुः पर्वतराड् यत्र देवोद्यानानि मुद्गल ॥ ८ ॥ नन्दनादीनि पुण्यानि विहाराः पुण्यकर्मणाम् । न क्षुत्पिपासे न ग्लानिर्न शीतोष्णे भयं तथा ॥ ९ ॥ स्वर्गमें तैंतीस हजार योजनका सुवर्णमय एक बहुत ऊँचा पर्वत है जो मेरुगिरिके नामसे विख्यात है। मुद्गल! वहीं देवताओंके नन्दन आदि पवित्र उद्यान तथा पुण्यात्मा पुरुषोंके विहारस्थल हैं। वहाँ किसीको भूख-प्यास नहीं लगती, मनमें कभी ग्लानि नहीं होती, गरमी और जाड़ेका कष्ट भी नहीं होता और न कोई भय ही होता है ॥ ८-९ ॥ बीभत्समशुभं वापि तत्र किंचिन्न विद्यते । मनोज्ञाः सर्वतो गन्धाः सुखस्पर्शाश्च सर्वशः ॥ १० ॥ शब्दाः श्रुतिमनोग्राहाः सर्वतस्तत्र वै मुने । न शोको न जरा तत्र नायासपरिवेदने ॥ ११ ॥ वहाँ कोई भी वस्तु ऐसी नहीं है, जो घृणा करने-योग्य एवं अशुभ हो। वहाँ सब ओर मनोरम सुगन्ध, सुखदायक स्पर्श तथा कानों और मनको प्रिय लगनेवाले मधुर शब्द सुननेमें आते हैं। मुने! स्वर्गलोकमें न शोक होता है, न बुढ़ापा। वहाँ थकावट तथा करुणाजनक विलाप भी श्रवणगोचर नहीं होते ॥ १०-११ ॥ ईदृशः स मुने लोकः स्वकर्मफलहेतुकः । सुकृतैस्तत्र पुरुषाः सम्भवन्त्यात्मकर्मभिः ॥ १२ ॥ महर्षे! स्वर्गलोक ऐसा ही है। अपने सत्कर्मोंके फलस्वरूप ही उसकी प्राप्ति होती है। मनुष्य वहाँ अपने किये हुए पुण्यकर्मोंसे ही रह पाते हैं ॥ १२ ॥ तैजसानि शरीराणि भवन्त्यत्रोपपद्यताम् । कर्मजान्येव मौद्गल्य न मातृपितृजान्युत ॥ १३ ॥ मुद्गल! स्वर्गवासियोंके शरीरमें तेजस तत्त्वकी प्रधानता होती है। वे शरीर पुण्यकर्मोंसे ही उपलब्ध होते हैं। माता-पिताके रजोवीर्यसे उनकी उत्पत्ति नहीं होती है ॥ १३ ॥ न संस्वेदो न दौर्गन्ध्यं पुरीषं मूत्रमेव च । तेषां न च रजो वस्त्रं बाधते तत्र वै मुने ॥ १४ ॥ उन शरीरोंमें कभी पसीना नहीं निकलता, दुर्गन्ध नहीं आती तथा मल-मूत्रका भी अभाव होता है। मुने! उनके कपड़ोंमें कभी मैल नहीं बैठती है ॥ १४ ॥