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महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

एषां देवनिकायानां पृथक् पृथगनेकशः । भास्वन्तः कामसम्पन्ना लोकास्तेजोमयाः शुभाः ॥ ७ ॥ मुद्गल! वहाँ देवता, साध्य, विश्वेदेव, महर्षिगण, याम, धाम, गन्धर्व तथा अप्सरा—इन सब देवसमूहोंके अलग-अलग अनेक प्रकाशमान लोक हैं, जो इच्छानुसार प्राप्त होनेवाले भोगोंसे सम्पन्न, तेजस्वी तथा मंगलकारी हैं ॥ ६-७ ॥ त्रयस्त्रिंशत्सहस्राणि योजनानि हिरण्मयः । मेरुः पर्वतराड् यत्र देवोद्यानानि मुद्गल ॥ ८ ॥ नन्दनादीनि पुण्यानि विहाराः पुण्यकर्मणाम् । न क्षुत्पिपासे न ग्लानिर्न शीतोष्णे भयं तथा ॥ ९ ॥ स्वर्गमें तैंतीस हजार योजनका सुवर्णमय एक बहुत ऊँचा पर्वत है जो मेरुगिरिके नामसे विख्यात है। मुद्गल! वहीं देवताओंके नन्दन आदि पवित्र उद्यान तथा पुण्यात्मा पुरुषोंके विहारस्थल हैं। वहाँ किसीको भूख-प्यास नहीं लगती, मनमें कभी ग्लानि नहीं होती, गरमी और जाड़ेका कष्ट भी नहीं होता और न कोई भय ही होता है ॥ ८-९ ॥ बीभत्समशुभं वापि तत्र किंचिन्न विद्यते । मनोज्ञाः सर्वतो गन्धाः सुखस्पर्शाश्च सर्वशः ॥ १० ॥ शब्दाः श्रुतिमनोग्राहाः सर्वतस्तत्र वै मुने । न शोको न जरा तत्र नायासपरिवेदने ॥ ११ ॥ वहाँ कोई भी वस्तु ऐसी नहीं है, जो घृणा करने-योग्य एवं अशुभ हो। वहाँ सब ओर मनोरम सुगन्ध, सुखदायक स्पर्श तथा कानों और मनको प्रिय लगनेवाले मधुर शब्द सुननेमें आते हैं। मुने! स्वर्गलोकमें न शोक होता है, न बुढ़ापा। वहाँ थकावट तथा करुणाजनक विलाप भी श्रवणगोचर नहीं होते ॥ १०-११ ॥ ईदृशः स मुने लोकः स्वकर्मफलहेतुकः । सुकृतैस्तत्र पुरुषाः सम्भवन्त्यात्मकर्मभिः ॥ १२ ॥ महर्षे! स्वर्गलोक ऐसा ही है। अपने सत्कर्मोंके फलस्वरूप ही उसकी प्राप्ति होती है। मनुष्य वहाँ अपने किये हुए पुण्यकर्मोंसे ही रह पाते हैं ॥ १२ ॥ तैजसानि शरीराणि भवन्त्यत्रोपपद्यताम् । कर्मजान्येव मौद्गल्य न मातृपितृजान्युत ॥ १३ ॥ मुद्गल! स्वर्गवासियोंके शरीरमें तेजस तत्त्वकी प्रधानता होती है। वे शरीर पुण्यकर्मोंसे ही उपलब्ध होते हैं। माता-पिताके रजोवीर्यसे उनकी उत्पत्ति नहीं होती है ॥ १३ ॥ न संस्वेदो न दौर्गन्ध्यं पुरीषं मूत्रमेव च । तेषां न च रजो वस्त्रं बाधते तत्र वै मुने ॥ १४ ॥ उन शरीरोंमें कभी पसीना नहीं निकलता, दुर्गन्ध नहीं आती तथा मल-मूत्रका भी अभाव होता है। मुने! उनके कपड़ोंमें कभी मैल नहीं बैठती है ॥ १४ ॥

न म्लायन्ति स्रजस्तेषां दिव्यगन्धा मनोरमाः । संयुज्यन्ते विमानैश्च ब्रह्मन्नेवंविधैश्च ते ॥ १५ ॥ स्वर्गवासियोंकी जो (दिव्य कुसुमोंकी) मालाएँ होती हैं, वे कभी कुम्हलाती नहीं हैं। उनसे निरन्तर दिव्य सुगन्ध फैलती रहती है तथा वे देखनेमें भी बड़ी मनोरम होती हैं। ब्रह्मन्! स्वर्गके सभी निवासी ऐसे ही विमानोंसे सम्पन्न होते हैं ॥ १५ ॥ ईर्ष्याशोकक्लमापेता मोहमात्सर्यवर्जिताः । सुखं स्वर्गजितस्तत्र वर्तयन्ते महामुने ॥ १६ ॥ महामुने! जो अपने सत्कर्मोंद्वारा स्वर्गलोकपर विजय पा चुके हैं, वे वहाँ बड़े सुखसे जीवन बिताते हैं। उनमें किसीके प्रति ईर्ष्या नहीं होती, वे कभी शोक तथा थकावटका अनुभव नहीं करते एवं मोह तथा मात्सर्य (द्वेषभाव)-से सदा दूर रहते हैं ॥ १६ ॥ तेषां तथाविधानां तु लोकानां मुनिपुङ्गव । उपर्युपरि लोकस्य लोका दिव्या गुणान्विताः ॥ १७ ॥ मुनिश्रेष्ठ! देवताओंके जो पूर्वोक्त प्रकारके लोक हैं, उन सबसे ऊपर अन्य कितने ही विविध गुणसम्पन्न दिव्य लोक हैं ॥ १७ ॥ पुरस्ताद् ब्राह्मणास्तत्र लोकास्तेजोमयाः शुभाः । यत्र यान्त्यृषयो ब्रह्मन् पूताः स्वैः कर्मभिः शुभैः ॥ १८ ॥ उन सबसे ऊपर ब्रह्माजीके लोक हैं, जो अत्यन्त तेजस्वी एवं मंगलकारी हैं। ब्रह्मन्! वहाँ अपने शुभ कर्मोंसे पवित्र ऋषि, मुनि जाते हैं ॥ १८ ॥ ऋभवो नाम तत्रान्ये देवानामपि देवताः । तेषां लोकात् परतरे यान् यजन्तीह देवताः ॥ १९ ॥ वहीं ऋभु नामक दूसरे देवता रहते हैं, जो देवगणोंके भी आराध्यदेव हैं। देवताओंके लोकोंसे उनका स्थान उत्कृष्ट है। देवतालोग भी यज्ञोंद्वारा उनका यजन करते हैं ॥ १९ ॥ स्वयंप्रभास्ते भास्वन्तो लोकाः कामदुघाः परे । न तेषां स्त्रीकृतस्तापो न लोकैश्वर्यमत्सरः ॥ २० ॥ उनके उत्तम लोक स्वयंप्रकाश, तेजस्वी और सम्पूर्ण कामनाओंकी पूर्ति करनेवाले हैं। उन्हें स्त्रियोंके लिये संताप नहीं होता। लोकोंके ऐश्वर्यके लिये उनके मनमें कभी ईर्ष्या नहीं होती ॥ २० ॥ न वर्तयन्त्याहुतिभिस्ते नाप्यमृतभोजनाः । तथा दिव्यशरीरास्ते न च विग्रहमूर्तयः ॥ २१ ॥ वे देवताओंकी तरह आहुतियोंसे जीविका नहीं चलाते। उन्हें अमृत पीनेकी आवश्यकता नहीं होती। उनके शरीर दिव्य ज्योतिर्मय हैं। उनकी कोई विशेष आकृति नहीं होती ॥ २१ ॥ न सुखे सुखकामास्ते देवदेवाः सनातनाः ।

न कल्पपरिवर्तेषु परिवर्तन्ति ते तथा ॥ २२ ॥
वे सुखमें प्रतिष्ठित हैं, परंतु सुखकी कामना नहीं रखते। वे देवताओंके भी देवता और सनातन हैं। कल्पका अन्त होनेपर भी उनकी स्थितिमें कोई परिवर्तन नहीं होता—वे ज्यों-के-त्यों बने रहते हैं ॥ २२ ॥
जरा मृत्युः कुतस्तेषां हर्षः प्रीतिः सुखं न च ।
न दुःखं न सुखं चापि रागद्वेषौ कुतो मुने ॥ २३ ॥
मुने! उनमें जरा-मृत्युकी सम्भावना तो हो ही कैसे सकती है? हर्ष, प्रीति तथा सुख आदि विकारोंका भी उनमें सर्वथा अभाव ही है। ऐसी स्थितिमें उनके भीतर दुःख-सुख तथा राग-द्वेषादि कैसे रह सकते हैं? ॥ २३ ॥
देवानांमपि मौद्गल्य कांक्षिता सा गतिः परा ।
दुष्प्रापा परमा सिद्धिर्गम्या कामगोचरैः ॥ २४ ॥
मौद्गल्य! स्वर्गवासी देवता भी उस (ऋभु नामक देवताओंकी) परमगतिको प्राप्त करनेकी इच्छा रखते हैं। वह परा सिद्धिकी अवस्था है, जो अत्यन्त दुर्लभ है। विषयभोगोंकी इच्छा रखनेवाले लोगोंकी वहाँतक पहुँच नहीं होती ॥ २४ ॥
त्रयस्त्रिंशदिमे देवा येषां लोका मनीषिभिः ।
गम्यन्ते नियमैः श्रेष्ठैर्दानैर्वा विधिपूर्वकैः ॥ २५ ॥
ये जो तैंतीस देवता हैं, उन्हींके लोकोंको मनीषी पुरुष उत्तम नियमोंके आचरणसे अथवा विधिपूर्वक दिये हुए दानोंसे प्राप्त करते हैं ॥ २५ ॥
सेयं दानकृता व्युष्टिरनुप्राप्ता सुखं त्वया ।
तां भुङ्क्ष्व सुकृतैर्लब्धां तपसा द्योतितप्रभः ॥ २६ ॥
ब्रह्मन्! तुमने अपने दानके प्रभावसे अनायास ही वह स्वर्गीय सुख-सम्पत्ति प्राप्त कर ली है। अपनी तपस्याके तेजसे देदीप्यमान होकर अब तुम अपने पुण्यसे प्राप्त हुए उस दिव्य वैभवका उपभोग करो ॥ २६ ॥
एतत् स्वर्गसुखं विप्र लोका नानाविधास्तथा ।
गुणाः स्वर्गस्य प्रोक्तास्ते दोषानपि निबोध मे ॥ २७ ॥
विप्रवर! यही स्वर्गका सुख है और ऐसे ही वहाँ भाँति-भाँतिके लोक हैं। यहाँतक मैंने तुम्हें स्वर्गके गुण बताये हैं; अब वहाँके दोष भी मुझसे सुन लो ॥ २७ ॥
कृतस्य कर्मणस्तत्र भुज्यते यत् फलं दिवि ।
न चान्यत् क्रियते कर्म मूलच्छेदेन भुज्यते ॥ २८ ॥
अपने किये हुए सत्कर्मोंका जो फल होता है, वही स्वर्गमें भोगा जाता है। वहाँ कोई नया कर्म नहीं किया जाता। अपना पुण्यरूप मूलधन गँवानेसे ही वहाँके भोग प्राप्त होते हैं ॥ २८ ॥
सोऽत्र दोषो मम मतस्तस्यान्ते पतनं च यत् ।

सुखव्याप्तमनस्कानां पतनं यच्च मुद्गल ॥ २९ ॥
मुद्गल! स्वर्गमें सबसे बड़ा दोष मुझे यह जान पड़ता है कि कर्मोंका भोग समाप्त होनेपर एक दिन वहाँसे पतन हो ही जाता है। जिनका मन सुखभोगमें लगा हुआ है, उनको सहसा पतन कितना दुःखदायी होता है ॥ २९ ॥
असंतोषः परीतापो दृष्ट्वा दीप्ततराः श्रियः ।
यद् भवत्यवरे स्थाने स्थितानां तत् सुदुष्करम् ॥ ३० ॥

स्वर्गमें भी जो लोग नीचेके स्थानोंमें स्थित हैं, उन्हें अपनेसे ऊपरके लोकोंकी समुज्ज्वल श्रीसम्पत्ति देखकर जो असंतोष और संताप होता है, उसका वर्णन करना अत्यन्त कठिन है ॥ ३० ॥
संज्ञामोहश्च पततां रजसा च प्रधर्षणम् ।
प्रम्लानेषु च माल्येषु ततः पिपतिषोर्भयम् ॥ ३१ ॥

स्वर्गलोकसे गिरते समय वहाँके निवासियोंकी चेतना लुप्त हो जाती है। रजोगुणके आक्रमणसे उनकी बुद्धि बिगड़ जाती है। पहले उनके गलेकी मालाएँ कुम्हला जाती हैं; इससे उन्हें पतनकी सूचना मिल जानेसे उनके मनमें बड़ा भारी भय समा जाता है ॥ ३१ ॥
आब्रह्मभवनादेते दोषा मौद्गल्य दारुणाः ।
नाकलोके सुकृतिनां गुणास्त्वयुतशो नृणाम् ॥ ३२ ॥

मौद्गल्य! ब्रह्मलोकपर्यन्त जितने लोक हैं, उन सबमें ये भयंकर दोष देखे जाते हैं। स्वर्गलोकमें रहते समय तो पुण्यात्मा पुरुषोंमें सहस्रों गुण होते हैं ॥ ३२ ॥
अयं त्वन्यो गुणः श्रेष्ठश्च्युतानां स्वर्गतो मुने ।
शुभानुशययोगेन मनुष्येषूपजायते ॥ ३३ ॥

मुने! परंतु वहाँसे भ्रष्ट हुए जीवोंका भी यह एक अन्य श्रेष्ठ गुण देखा जाता है कि वे अपने शुभ कर्मों-के संस्कारसे युक्त होनेके कारण मनुष्ययोनिमें ही जन्म पाते हैं ॥ ३३ ॥
तत्रापि स महाभागः सुखभागभिजायते ।
न चेत् सम्बुध्यते तत्र गच्छत्यधमतां ततः ॥ ३४ ॥

वहाँ भी वह महाभाग मानव सुखके साधनोंसे सम्पन्न होकर ही उत्पन्न होता है। परंतु यदि मानवयोनिमें वह अपने कर्तव्यको न समझे, तो उससे भी नीची योनिमें चला जाता है ॥ ३४ ॥
इह यत् क्रियते कर्म तत् परत्रोपभुज्यते ।
कर्मभूमिरियं ब्रह्मन् फलभूमिरसौ मता ॥ ३५ ॥

इस मनुष्यलोकमें मानव-शरीरद्वारा जो कर्म किया जाता है, उसीको परलोकमें भोगा जाता है। ब्रह्मन्! यह कर्मभूमि और वह फलभोगकी भूमि मानी गयी है ॥ ३५ ॥

मुद्गल उवाच

महान्तस्तु अमी दोषास्त्वया स्वर्गस्य कीर्तिताः ।
निर्दोष एव यस्त्वन्यो लोकं तं प्रवदस्व मे ॥ ३६ ॥
**मुद्गल बोले—**देवदूत! तुमने स्वर्गके महान् दोष बताये, परंतु स्वर्गकी अपेक्षा यदि कोई दूसरा लोक इन दोषोंसे सर्वथा रहित हो तो मुझसे उसीका वर्णन करो ॥

देवदूत उवाच

ब्रह्मणः सदनादूर्ध्वं तद् विष्णोः परमं पदम् ।
शुद्धं सनातनं ज्योतिः परं ब्रह्मेति यद् विदुः ॥ ३७ ॥
**देवदूतने कहा—**ब्रह्माजीके भी लोकसे ऊपर भगवान् विष्णुका परम धाम है। वह शुद्ध सनातन ज्योतिर्मय लोक है। उसे परब्रह्म भी कहते हैं ॥ ३७ ॥
न तत्र विप्र गच्छन्ति पुरुषा विषयात्मकाः ।
दम्भलोभमहाक्रोधमोहद्रोहैरभिद्रुताः ॥ ३८ ॥
विप्रवर! जिनका मन विषयोंमें रचा-पचा रहता है, वे लोग वहाँ नहीं जा सकते। दम्भ, लोभ, महाक्रोध, मोह और द्रोहसे युक्त मनुष्य भी वहाँ नहीं पहुँच सकते ॥ ३८ ॥
निर्ममा निरहङ्कारा निर्द्वन्द्वाः संयतेन्द्रियाः ।
ध्यानयोगपराश्चैव तत्र गच्छन्ति मानवाः ॥ ३९ ॥
जो ममता और अहंकारसे रहित, सुख-दुःख आदि द्वन्द्वोंसे ऊपर उठे हुए, जितेन्द्रिय तथा ध्यानयोगमें तत्पर हैं, वे मनुष्य ही उस लोकमें जा सकते हैं ॥ ३९ ॥
एतत् ते सर्वमाख्यातं यन्मां पृच्छसि मुद्गल ।
तवानुकम्पया साधो साधु गच्छाम मा चिरम् ॥ ४० ॥
मुद्गल! तुमने जो कुछ मुझसे पूछा था, वह सब मैंने कह सुनाया। साधो! अब आपकी कृपासे हमलोग सुखपूर्वक स्वर्गकी यात्रा करें, विलम्ब नहीं होना चाहिये ॥ ४० ॥

व्यास उवाच

एतच्छ्रुत्वा तु मौद्गल्यो वाक्यं विममृशे धिया ।
विमृश्य च मुनिश्रेष्ठो देवदूतमुवाच ह ॥ ४१ ॥
**व्यासजी कहते हैं—**राजन्! देवदूतकी यह बात सुनकर मुनिश्रेष्ठ मुद्गलने उसपर बुद्धिपूर्वक विचार किया। विचार करके उन्होंने देवदूतसे कहा— ॥ ४१ ॥
देवदूत नमस्तेऽस्तु गच्छ तात यथासुखम् ।
महादोषेण मे कार्यं न स्वर्गेण सुखेन वा ॥ ४२ ॥
‘देवदूत! तुम्हें नमस्कार है। तात! तुम सुखपूर्वक पधारो। स्वर्ग अथवा वहाँका सुख महान् दोषसे युक्त है; इसलिये मुझे उसकी आवश्यकता नहीं है ॥ ४२ ॥
पतनान्ते महद् दुःखं परितापः सुदारुणः ।
स्वर्गभाजश्चरन्तीह तस्मात् स्वर्गं न कामये ॥ ४३ ॥

'ओह! पतनके बाद तो स्वर्गवासी मनुष्योंको अत्यन्त भयंकर महान् दुःख और अनुताप होता है और फिर वे इसी लोकमें विचरते रहते हैं; इसलिये मुझे स्वर्गमें जानेकी इच्छा नहीं है ।। ४३ ।। यत्र गत्वा न शोचन्ति न व्यथन्ति चलन्ति वा । तदहं स्थानमत्यन्तं मार्गयिष्यामि केवलम् ।। ४४ ।। 'जहाँ जाकर मनुष्य कभी शोक नहीं करते, व्यथित नहीं होते तथा जहाँसे विचलित नहीं होते हैं। केवल उसी अक्षय धामका मैं अनुसंधान करूँगा' ।। ४४ ।। इत्युक्त्वा स मुनिर्वाक्यं देवदूतं विसृज्य तम् । शिलोञ्छवृत्तिर्धर्मात्मा शममातिष्ठदुत्तमम् ।। ४५ ।। ऐसा कहकर मुद्गल मुनिने उस देवदूतको विदा कर दिया और शिल एवं उञ्छवृत्तिसे जीवन-निर्वाह करनेवाले वे धर्मात्मा महर्षि उत्तम रीतिसे शम-दम आदि नियमोंका पालन करने लगे ।। ४५ ।। तुल्यनिन्दास्तुतिर्भूत्वा समलोष्टाश्मकाञ्चनः । ज्ञानयोगेन शुद्धेन ध्याननित्यो बभूव ह ।। ४६ ।। उनकी दृष्टिमें निन्दा और स्तुति समान हो गयी। वे मिट्टीके ढेले, पत्थर और सुवर्णको समान समझने लगे और विशुद्ध ज्ञानयोगके द्वारा नित्य ध्यानमें तत्पर रहने लगे ।। ध्यानयोगाद् बलं लब्ध्वा प्राप्य बुद्धिमनुत्तमाम् । जगाम शाश्वतीं सिद्धिं परां निर्वाणलक्षणाम् ।। ४७ ।। ध्यानसे (परम वैराग्यका) बल पाकर उन्हें उत्तम बोध प्राप्त हुआ और उसके द्वारा उन्होंने सनातन मोक्षरूपा परम सिद्धि प्राप्त कर ली ।। ४७ ।। तस्मात् त्वमपि कौन्तेय न शोकं कर्तुमर्हसि । राज्यात् स्फीतात् परिभ्रष्टस्तपसा तदवाप्स्यसि ।। ४८ ।। कुन्तीनन्दन! इसलिये तुम भी समृद्धिशाली राज्यसे भ्रष्ट होनेके कारण शोक न करो; तपस्याद्वारा तुम उसे प्राप्त कर लोगे ।। ४८ ।। सुखस्यानन्तरं दुःखं दुःखस्यानन्तरं सुखम् । पर्यायेणोपसर्पन्ते नरं नेमिररा इव ।। ४९ ।। मनुष्यपर सुखके बाद दुःख और दुःखके बाद सुख बारी-बारीसे आते रहते हैं। जैसे अरे नेमिसे जुड़े हुए ऊँचे-नीचे आते रहते हैं, वैसे ही मनुष्यका दुःख-सुखसे सम्बन्ध होता रहता है ।। ४९ ।। पितृपैतामहं राज्यं प्राप्स्यस्यमितविक्रम । वर्षात् त्रयोदशादूर्ध्वं व्येतु ते मानसो ज्वरः ।। ५० ।। अमितपराक्रमी युधिष्ठिर! तुम तेरहवें वर्षके बाद अपने बाप-दादोंका राज्य प्राप्त कर लोगे, अतः अब तुम्हारी मानसिक चिन्ता दूर हो जानी चाहिये ।। ५० ।।

वैशम्पायन उवाच

स एवमुक्त्वा भगवान् व्यासः पाण्डवनन्दनम् ।
जगाम तपसे धीमान् पुनरेवाश्रमं प्रति ॥ ५१ ॥

**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! परम बुद्धिमान् भगवान् व्यास पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरसे ऐसा कहकर तपस्याके लिये पुनः अपने आश्रमकी ओर चले गये ॥ ५१ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि व्रीहिद्रौणिकपर्वणि मुद्गलदेवदूतसंवादे एकषष्ट्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २६१ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत व्रीहिद्रौणिकपर्वमें मुद्गल-देवदूत-संवादविषयक दो सौ इकसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २६१ ॥


* मुद्गल ऋषिको ही ‘मौद्गल्य’ भी कहा है।

(द्रौपदीहरणपर्व)

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(द्रौपदीहरणपर्व)

द्विषष्ट्यधिकद्विशततमोऽध्यायः

दुर्योधनका महर्षि दुर्वासाको आतिथ्यसत्कारसे संतुष्ट करके उन्हें युधिष्ठिरके पास भेजकर प्रसन्न होना

जनमेजय उवाच

वसत्स्वेवं वने तेषु पाण्डवेषु महात्मसु ।
रममाणेषु चित्राभिः कथाभिर्मुनिभिः सह ॥ १ ॥
सूर्यदत्ताक्षयान्नेव कृष्णाया भोजनावधि ।
ब्राह्मणांस्तर्पमाणेषु ये चान्नार्थमुपागताः ॥ २ ॥
धार्तराष्ट्रा दुरात्मानः सर्वे दुर्योधनादयः ।
कथं तेष्वन्ववर्तन्त पापाचारा महामुने ॥ ३ ॥
दुःशासनस्य कर्णस्य शकुनेश्च मते स्थिताः ।
एतदाचक्ष्व भगवन् वैशम्पायन पृच्छतः ॥ ४ ॥

**जनमेजयने पूछा—**महामुनि वैशम्पायनजी! जब महात्मा पाण्डव इस प्रकार वनमें रहकर मुनियोंके साथ विचित्र कथा-वार्ताद्वारा मनोरञ्जन करते थे तथा जबतक द्रौपदी भोजन न कर ले, तबतक सूर्यके दिये हुए अक्षयपात्रसे प्राप्त होनेवाले अन्नसे वे उन ब्राह्मणोंको तृप्त करते थे, जो भोजनके लिये उनके पास आये होते थे; उन दिनों दुःशासन, कर्ण और शकुनिके मतके अनुसार चलनेवाले पापाचारी दुरात्मा दुर्योधन आदि धृतराष्ट्रपुत्रोंने उन पाण्डवोंके साथ कैसा बर्ताव किया? भगवन्! मेरे प्रश्नके अनुसार ये सब बातें कहिये ॥ १—४ ॥

वैशम्पायन उवाच

श्रुत्वा तेषां तथा वृत्तिं नगरे वसतामिव ।
दुर्योधनो महाराज तेषु पापमरोचयत् ॥ ५ ॥

**वैशम्पायनजीने कहा—**महाराज! जब दुर्योधनने सुना कि पाण्डवलोग तो वनमें भी उसी प्रकार दान-पुण्य करते हुए आनन्दसे रह रहे हैं, जैसे नगरके निवासी रहा करते हैं, तब उसने उनका अनिष्ट करनेका विचार किया ॥ ५ ॥

तथा तैर्निकृतिप्रज्ञैः कर्णदुःशासनादिभिः ।

नानोपायैरघं तेषु चिन्तयत्सु दुरात्मसु ॥ ६ ॥
अभ्यागच्छत् स धर्मात्मा तपस्वी सुमहायशाः ।
शिष्यायुतसमोपेतो दुर्वासा नाम कामतः ॥ ७ ॥
इस प्रकार सोचकर छल-कपटकी विद्यामें निपुण कर्ण और दुःशासन आदिके साथ जब वे दुरात्मा धृतराष्ट्र-पुत्र भाँति-भाँतिके उपायोंसे पाण्डवोंको संकटमें डालनेकी युक्तिका विचार कर रहे थे, उसी समय महायशस्वी धर्मात्मा तपस्वी महर्षि दुर्वासा अपने दस हजार शिष्योंको साथ लिये हुए वहाँ स्वेच्छासे ही आ पहुँचे ॥ ६-७ ॥

तमागतमभिप्रेक्ष्य मुनिं परमकोपनम् ।
दुर्योधनो विनीतात्मा प्रश्रयेण दमेन च ॥ ८ ॥
सहितो भ्रातृभिः श्रीमानातिथ्येन न्यमन्त्रयत् ।
परम क्रोधी दुर्वासा मुनिको आया देख भाइयों-सहित श्रीमान् राजा दुर्योधनने अपनी इन्द्रियोंको काबूमें रखकर नम्रतापूर्वक विनीतभावसे उन्हें अतिथिसत्कारके रूपमें निमन्त्रित किया ॥ ८ १/२ ॥

विधिवत् पूजयामास स्वयं किङ्करवत् स्थितः ॥ ९ ॥
अहानि कतिचित् तत्र तस्थौ स मुनिसत्तमः ।
दुर्योधनने स्वयं दासकी भाँति उनकी सेवामें खड़े रहकर विधिपूर्वक उनकी पूजा की। मुनिश्रेष्ठ दुर्वासा कई दिनोंतक वहाँ ठहरे रहे ॥ ९ १/२ ॥

तं च पर्यचरद् राजा दिवारात्रमतन्द्रितः ॥ १० ॥
दुर्योधनो महाराज शापात् तस्य विशङ्कितः ।
महाराज जनमेजय! राजा दुर्योधन (श्रद्धासे नहीं, अपितु) उनके शापसे डरता हुआ दिन-रात आलस्य छोड़कर उनकी सेवामें लगा रहा ॥ १० १/२ ॥

क्षुधितोऽस्मि ददस्वान्नं शीघ्रं मम नराधिप ॥ ११ ॥
इत्युक्त्वा गच्छति स्नातुं प्रत्यागच्छति वै चिरात् ।
न भोक्ष्याम्यद्य मे नास्ति क्षुधेत्युक्त्वैत्यदर्शनम् ॥ १२ ॥
वे मुनि कभी कहते कि 'राजन्! मैं बहुत भूखा हूँ, मुझे शीघ्र भोजन दो' ऐसा कहकर वे स्नान करनेके लिये चले जाते और बहुत देरके बाद लौटते थे। लौटकर वे कह देते—'मैं नहीं खाऊँगा; आज मुझे भूख नहीं है' ऐसा कहकर अदृश्य हो जाते थे ॥ ११-१२ ॥

अकस्मादेत्य च ब्रूते भोजयास्मांस्त्वरान्वितः ।
कदाचिच्च निशीथे स उत्थाय निकृतौ स्थितः ॥ १३ ॥
पूर्ववत् कारयित्वान्नं न भुङ्क्ते गर्हयन् स्म सः ।
फिर कहींसे अकस्मात् आकर कहते—'हमलोगोंको जल्दी भोजन कराओ।' कभी आधी रातमें उठकर उसे नीचा दिखानेके लिये उद्यत हो पूर्ववत् भोजन बनवाकर उस भोजनकी निन्दा करते हुए भोजन करनेसे इनकार कर देते थे ॥ १३ १/२ ॥

वर्तमाने तथा तस्मिन् यदा दुर्योधनो नृपः ॥ १४ ॥ विकृतिं नैति न क्रोधं तदा तुष्टोऽभवन्मुनिः । आह चैनं दुराधर्षो वरदोऽस्मीति भारत ॥ १५ ॥ भारत! ऐसा उन्होंने कई बार किया, तो भी जब राजा दुर्योधनके मनमें विकार या क्रोध नहीं उत्पन्न हुआ, तब वे दुर्धर्ष मुनि उसपर बहुत प्रसन्न हुए और इस प्रकार बोले—'मैं तुम्हें वर देना चाहता हूँ' ॥ १४-१५ ॥

दुर्वासा उवाच

वरं वरय भद्रं ते यत् ते मनसि वर्तते । मयि प्रीते तु यद् धर्म्यं नालभ्यं विद्यते तव ॥ १६ ॥ दुर्वासा बोले—राजन्! तुम्हारा कल्याण हो। तुम्हारे मनमें जो इच्छा हो, उसके लिये वर माँगो। मेरे प्रसन्न होनेपर जो धर्मानुकूल वस्तु होगी, वह तुम्हारे लिये अलभ्य नहीं रहेगी ॥ १६ ॥

वैशम्पायन उवाच

एतच्छ्रुत्वा वचस्तस्य महर्षेर्भावितात्मनः । अमन्यत पुनर्जातमात्मानं स सुयोधनः ॥ १७ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! शुद्ध अन्तःकरणवाले महर्षि दुर्वासाका यह वचन सुनकर दुर्योधनने मन-ही-मन ऐसा समझा, मानो उसका नया जन्म हुआ हो ॥ १७ ॥

प्रागेव मन्त्रितं चासीत् कर्णदुःशासनादिभिः । याचनीयं मुनेस्तुष्टादिति निश्चित्य दुर्मतिः ॥ १८ ॥ अतिहर्षान्वितो राजन् वरमेनमायाचत । शिष्यैः सह मम ब्रह्मन् यथा जातोऽतिथिर्भवान् ॥ १९ ॥ अस्मत्कुले महाराजो ज्येष्ठः श्रेष्ठो युधिष्ठिरः । वने वसति धर्मात्मा भ्रातृभिः परिवारितः ॥ २० ॥ गुणवान् शीलसम्पन्नस्तस्य त्वमतिथिर्भव । मुनि संतुष्ट हों, तो क्या माँगना चाहिये, इस बातके लिये कर्ण और दुःशासन आदिके साथ उसकी पहलेसे ही सलाह हो चुकी थी। राजन्! उसी निश्चयके अनुसार दुर्बुद्धि दुर्योधनने अत्यन्त प्रसन्न होकर यह वर माँगा—'ब्रह्मन्! हमारे कुलमें महाराज युधिष्ठिर सबसे ज्येष्ठ और श्रेष्ठ हैं। इस समय वे धर्मात्मा पाण्डुकुमार अपने भाइयोंके साथ वनमें निवास करते हैं। युधिष्ठिर बड़े गुणवान् और सुशील हैं। जिस प्रकार आप मेरे अतिथि हुए, उसी तरह शिष्योंके सहित आप उनके भी अतिथि होइये ॥ १८—२०१/२ ॥

यदा च राजपुत्री सा सुकुमारी यशस्विनी ॥ २१ ॥

भोजयित्वा द्विजान् सर्वान् पतींश्च वरवर्णिनी ।
विश्रान्ता च स्वयं भुक्त्वा सुखासीना भवेद् यदा ॥ २२ ॥
तदा त्वं तत्र गच्छेथा यद्यनुग्राह्यता मयि ।
‘यदि आपकी मुझपर कृपा हो तो मेरी प्रार्थनासे आप वहाँ ऐसे समयमें जाइयेगा, जब परम सुन्दरी यशस्विनी सुकुमारी राजकुमारी द्रौपदी समस्त ब्राह्मणों तथा पाँचों पतियोंको भोजन कराकर स्वयं भी भोजन करनेके पश्चात् सुखपूर्वक बैठकर विश्राम कर रही हो’ ॥ २१-२२½ ॥

तथा करिष्ये त्वत्प्रीत्येत्येवमुक्त्वा सुयोधनम् ॥ २३ ॥
दुर्वासा अपि विप्रेन्द्रो यथागतमगात् ततः ।
कृतार्थमपि चात्मानं तदा मेने सुयोधनः ॥ २४ ॥
‘तुमपर प्रेम होनेके कारण मैं वैसा ही करूँगा’, दुर्योधनसे ऐसा कहकर विप्रवर दुर्वासा जैसे आये थे, वैसे ही चले गये। उस समय दुर्योधनने अपने-आपको कृतार्थ माना ॥ २३-२४ ॥

करेण च करं गृह्य कर्णस्य मुदितो भृशम् ।
कर्णोऽपि भ्रातृसहितमित्युवाच नृपं मुदा ॥ २५ ॥
वह कर्णका हाथ अपने हाथमें लेकर अत्यन्त प्रसन्न हुआ। कर्णने भी भाइयोंसहित राजा दुर्योधनसे बड़े हर्षके साथ इस प्रकार कहा ॥ २५ ॥

कर्ण उवाच

दिष्ट्या कामः सुसंवृत्तो दिष्ट्या कौरव वर्धसे ।
दिष्ट्या ते शत्रवो मग्ना दुस्तरे व्यसनार्णवे ॥ २६ ॥
**कर्ण बोला—**कुरुनन्दन! सौभाग्यसे हमारा काम बन गया। तुम्हारा अभ्युदय हो रहा है, यह भी भाग्यकी ही बात है। तुम्हारे शत्रु विपत्तिके अपार महासागरमें डूब गये, यह कितने सौभाग्यकी बात है? ॥ २६ ॥

दुर्वासःक्रोधजे वह्नौ पतिताः पाण्डुनन्दनाः ।
स्वैरेव ते महापापैर्गता वै दुस्तरं तमः ॥ २७ ॥
पाण्डव दुर्वासाकी क्रोधाग्निमें गिर गये हैं और अपने ही महापापोंके कारण वे दुस्तर नरकमें जा पड़े हैं ॥

वैशम्पायन उवाच

इत्थं ते निकृतिप्रज्ञा राजन् दुर्योधनादयः ।
हसन्तः प्रीतमनसो जग्मुः स्वं स्वं निकेतनम् ॥ २८ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! छल-कपटकी विद्यामें प्रवीण दुर्योधन आदि इस प्रकार बातें करते और हँसते हुए प्रसन्न मनसे अपने-अपने भवनोंमें गये ॥ २८ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि द्रौपदीहरणपर्वणि दुर्वासउपाख्याने
द्विषष्ट्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २६२ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत द्रौपदीहरणपर्वमें दुर्वासाका उपाख्यानविषयक
दो सौ बासठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २६२ ॥

२६३-

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त्रिषष्ट्यधिकद्विशततमोऽध्यायः

दुर्वासाका पाण्डवोंके आश्रमपर असमयमें आतिथ्यके लिये जाना, द्रौपदीके द्वारा स्मरण किये जानेपर भगवान्‌का प्रकट होना तथा पाण्डवोंको दुर्वासाके भयसे मुक्त करना और उनको आश्वासन देकर द्वारका जाना

वैशम्पायन उवाच

ततः कदाचिद् दुर्वासाः सुखासीनांस्तु पाण्डवान् ।
भुक्त्वा चावस्थितां कृष्णां ज्ञात्वा तस्मिन् वने मुनिः ॥ १ ॥
अभ्यागच्छत् परिवृतः शिष्यैरयुतसम्मितैः ।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तदनन्तर एक दिन महर्षि दुर्वासा इस बातका पता लगाकर कि पाण्डवलोग भोजन करके सुखपूर्वक बैठे हैं और द्रौपदी भी भोजनसे निवृत्त हो आराम कर रही है, दस हजार शिष्योंसे घिरे हुए उस वनमें आये ॥ १ १/२ ॥

दृष्ट्वाऽऽयान्तं तमतिथिं स च राजा युधिष्ठिरः ॥ २ ॥
जगामाभिमुखः श्रीमान् सह भ्रातृभिरच्युतः ।
तस्मै बद्ध्वाञ्जलिं सम्यगुपवेश्य वरासने ॥ ३ ॥
विधिवत् पूजयित्वा तमातिथ्येन न्यमन्त्रयत् ।
आह्निकं भगवन् कृत्वा शीघ्रमेहीति चाब्रवीत् ॥ ४ ॥
श्रीमान् राजा युधिष्ठिर अतिथिको आते देख भाइयोंसहित उनके सम्मुख गये। वे अपनी मर्यादासे कभी च्युत नहीं होते थे। उन्होंने उन अतिथिदेवताको लाकर श्रेष्ठ आसनपर आदरपूर्वक बैठाया और हाथ जोड़कर प्रणाम किया। फिर विधिपूर्वक पूजा करके उन्हें अतिथिसत्कारके रूपमें निमन्त्रित किया और कहा—'भगवन्! अपना नित्य नियम पूरा करके (भोजनके लिये) शीघ्र पधारिये' ॥ २—४ ॥

जगाम च मुनिः सोऽपि स्नातुं शिष्यैः सहानघः ।
भोजयेत् सहशिष्यं मां कथमित्यविचिन्तयन् ॥ ५ ॥
न्यमज्जत् सलिले चापि मुनिसङ्घः समाहितः ।
यह सुनकर वे निष्पाप मुनि अपने शिष्योंके साथ स्नान करनेके लिये चले गये। उन्होंने इस बातका तनिक भी विचार नहीं किया कि ये इस समय शिष्योंसहित मुझे भोजन कैसे दे सकेंगे। सारी मुनिमण्डलीने जलमें गोता लगाया, फिर सब लोग एकाग्रचित्त होकर ध्यान करने लगे ॥ ५ १/२ ॥
एतस्मिन्नन्तरे राजन् द्रौपदी योषितां वरा ॥ ६ ॥
चिन्तामवाप परमामन्नहेतोः पतिव्रता ।
राजन्! इसी समय युवतियोंमें श्रेष्ठ पतिव्रता द्रौपदीको अन्नके लिये बड़ी चिन्ता हुई ॥ ६ १/२ ॥
सा चिन्तयन्ती च सदा नान्नहेतुमविन्दत ॥ ७ ॥
मनसा चिन्तयामास कृष्णं कंसनिषूदनम् ।
जब बहुत सोचने-विचारनेपर भी उसे अन्न मिलनेका कोई उपाय नहीं सूझा, तब वह मन-ही-मन कंसनिकन्दन आनन्दकन्द भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रका स्मरण करने लगी— ॥ ७ १/२ ॥

कृष्ण कृष्ण महाबाहो देवकीनन्दनाव्यय ॥ ८ ॥
वासुदेव जगन्नाथ प्रणतार्तिविनाशन ।
विश्वात्मन् विश्वजनक विश्वहर्तः प्रभोऽव्यय ॥ ९ ॥
प्रपन्नपाल गोपाल प्रजापाल परात्पर ।
आकूतीनां च चित्तीनां प्रवर्तक नतास्मि ते ॥ १० ॥

‘हे कृष्ण! हे महाबाहु श्रीकृष्ण! हे देवकीनन्दन! हे अविनाशी वासुदेव! चरणोंमें पड़े हुए दुखियोंका दुःख दूर करनेवाले हे जगदीश्वर! तुम्हीं सम्पूर्ण जगत्के आत्मा हो। अविनाशी प्रभो! तुम्हीं इस विश्वकी उत्पत्ति और संहार करनेवाले हो। शरणागतोंकी रक्षा करनेवाले गोपाल! तुम्हीं समस्त प्रजाका पालन करनेवाले परात्पर परमेश्वर हो। आकृति (मन) और चित्ति (बुद्धि)-के प्रेरक परमात्मन्! मैं तुम्हें प्रणाम करती हूँ ॥ ८—१० ॥
वरेण्य वरदानन्त अगतीनां गतिर्भव ।
पुराणपुरुष प्राणमनोवृत्त्याद्यगोचर ॥ ११ ॥
सर्वाध्यक्ष पराध्यक्ष त्वामहं शरणं गता ।
पाहि मां कृपया देव शरणागतवत्सल ॥ १२ ॥

‘सबके वरण करने योग्य वरदाता अनन्त! आओ। जिन्हें तुम्हारे सिवा दूसरा कोई सहायता देनेवाला नहीं है, उन असहाय भक्तोंकी सहायता करो। पुराणपुरुष! प्राण और मनकी वृत्ति आदि तुम्हारे पासतक नहीं पहुँच सकती। सबके साक्षी परमात्मन्! मैं तुम्हारी शरणमें आयी हूँ। शरणागतवत्सल देव! कृपा करके मुझे बचाओ’ ॥ ११-१२ ॥
नीलोत्पलदलश्याम पद्मगर्भारुणेक्षण ।
पीताम्बरपरीधान लसत्कौस्तुभभूषण ॥ १३ ॥
त्वमादिरन्तो भूतानां त्वमेव च परायणम् ।
परात्परतरं ज्योतिर्विश्वात्मा सर्वतोमुखः ॥ १४ ॥

‘नीलकमलदलके समान श्यामसुन्दर! कमलपुष्पके भीतरी भागके समान किंचित् लाल नेत्रोंवाले पीताम्बरधारी श्रीकृष्ण! तुम्हारे वक्षःस्थलपर कौस्तुभमणिमय आभूषण शोभा पाता है। प्रभो! तुम्हीं समस्त प्राणियोंके आदि और अन्त हो। तुम्हीं सबके परम आश्रय हो। तुम्हीं परात्पर, ज्योतिर्मय सर्वात्मा एवं सब ओर मुखवाले परमेश्वर हो ॥ १३-१४ ॥
त्वामेवाहुः परं बीजं निधानं सर्वसम्पदाम् ।
त्वया नाथेन देवेश सर्वापद्भ्यो भयं न हि ॥ १५ ॥

‘ज्ञानी पुरुष तुम्हें ही इस जगत्का परम बीज और सम्पूर्ण सम्पदाओंकी निधि बतलाते हैं। देवेश्वर! यदि तुम मेरे रक्षक हो तो मुझपर सारी विपत्तियाँ टूट पड़ें, तो भी मुझे उनसे भय नहीं है’ ॥ १५ ॥
दुःशासनादहं पूर्वं सभायां मोचिता यथा ।

तथैव संकटादस्मान्मामुद्धर्तुमिहार्हसि ॥ १६ ॥
‘भगवन्! पहले कौरव-सभामें दुःशासनके हाथसे जैसे तुमने मुझे बचाया था, उसी प्रकार इस वर्तमान संकटसे भी मेरा उद्धार करो’ ॥ १६ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवं स्तुतस्तदा देवः कृष्णया भक्तवत्सलः ।
द्रौपद्याः संकटं ज्ञात्वा देवदेवो जगत्पतिः ॥ १७ ॥
पार्श्वस्थां शयने त्यक्त्वा रुक्मिणीं केशवः प्रभुः ।
तत्राजगाम त्वरितो ह्यचिन्त्यगतिरीश्वरः ॥ १८ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—द्रौपदीके इस प्रकार स्तुति करनेपर अचिन्त्यगति परमेश्वर देवाधिदेव जगन्नाथ भक्तवत्सल भगवान् केशवको यह मालूम हो गया कि द्रौपदीपर कोई संकट आ गया है, फिर तो शय्यापर अपने पास ही सोयी हुई रुक्मिणीको छोड़कर तुरंत वहाँ आ पहुँचे ॥ १७-१८ ॥
ततस्तं द्रौपदी दृष्ट्वा प्रणम्य परया मुदा ।
अब्रवीद् वासुदेवाय मुनेरागमनादिकम् ॥ १९ ॥
भगवान्‌को आया देख द्रौपदीको बड़ा आनन्द हुआ। उसने उन्हें प्रणाम करके दुर्वासा मुनिके आने आदिका सारा समाचार कह सुनाया ॥ १९ ॥
ततस्तामब्रवीत् कृष्णः क्षुधितोऽस्मि भृशातुरः ।
शीघ्रं भोजय मां कृष्णे पश्चात् सर्वं करिष्यसि ॥ २० ॥
निशम्य तद्वचः कृष्णा लज्जिता वाक्यमब्रवीत् ।
स्थाल्यां भास्करदत्तायामन्नं मद्‌भोजनावधि ॥ २१ ॥
भुक्तवत्यस्म्यहं देव तस्मादन्नं न विद्यते ।
तब भगवान् श्रीकृष्णने द्रौपदीसे कहा—‘कृष्णे! इस समय मुझे बड़ी भूख लगी है; मैं भूखसे अत्यन्त पीड़ित हो रहा हूँ। पहले मुझे जल्दी भोजन करा; फिर सारा प्रबन्ध करती रहना।' उनकी यह बात सुनकर द्रौपदीको बड़ी लज्जा हुई। वह बोली—'भगवन्! सूर्यनारायणकी दी हुई बटलोईसे तभीतक भोजन मिलता है जबतक मैं भोजन न कर लूँ। देव! आज तो मैं भी भोजन कर चुकी हूँ; अतः अब उसमें अन्न नहीं रह गया है' ॥ २०-२१ १/२ ॥
ततः प्रोवाच भगवान् कृष्णां कमललोचनः ॥ २२ ॥
कृष्णे न नर्मकालोऽयं क्षुच्छ्रमेणातुरे मयि ।
शीघ्रं गच्छ मम स्थालीमानीय त्वं प्रदर्शय ॥ २३ ॥
इति निर्बन्धतः स्थालीमानाय्य स यदूद्वहः ।
स्थाल्याः कण्ठेऽथ संलग्नं शाकान्नं वीक्ष्य केशवः ॥ २४ ॥

उपयुज्याब्रवीदेनामनेन हरिरीश्वरः । विश्वात्मा प्रीयतां देवस्तुष्टश्चास्त्विति यज्ञभुक् ॥ २५ ॥ यह सुनकर कमलनयन भगवान् श्रीकृष्णने द्रौपदीसे फिर कहा—'कृष्णे! मैं तो भूख और थकावटसे आतुर हो रहा हूँ और तुझे हँसी सूझती है। यह परिहासका समय नहीं है। जल्दी जा और बटलोई लाकर मुझे दिखा। इस प्रकार हठ करके भगवान्‌ने द्रौपदीसे बटलोई मँगवायी। उसके गलेमें जरा-सा साग लगा हुआ था। उसे देखकर श्रीकृष्णने लेकर खा लिया और द्रौपदीसे कहा—'इस सागसे सम्पूर्ण विश्वके आत्मा यज्ञभोक्ता सर्वेश्वर भगवान् श्रीहरि तृप्त और संतुष्ट हों' ॥ २२-२५ ॥

आकारय मुनीन् शीघ्रं भोजनायेति चाब्रवीत् । सहदेवं महाबाहुः कृष्णः क्लेशविनाशनः ॥ २६ ॥ इतना कहकर सबका क्लेश दूर करनेवाले महाबाहु भगवान् श्रीकृष्ण सहदेवसे बोले—'तुम शीघ्र जाकर मुनियोंको भोजनके लिये बुला लाओ' ॥ २६ ॥

ततो जगाम त्वरितः सहदेवो महायशाः । आकारितुं तु तान् सर्वान् भोजनार्थं नृपोत्तम ॥ २७ ॥ स्नातुं गतान् देवनद्यां दुर्वासः प्रभृतीन् मुनीन् ।

नृपश्रेष्ठ! तब महायशस्वी सहदेव देवनदीमें स्नानके लिये गये हुए उन दुर्वासा आदि सब मुनियोंको भोजनके निमित्त बुलानेके लिये तुरंत गये ॥ २७ १/२ ॥ ते चावतीर्णाः सलिले कृतवन्तोऽघमर्षणम् ॥ २८ ॥ दृष्ट्वोद्गारान् सान्नरसांस्तृप्त्या परमया युताः । उत्तीर्य सलिलात् तस्माद् दृष्टवन्तः परस्परम् ॥ २९ ॥ दुर्वाससमभिप्रेक्ष्य ते सर्वे मुनयोऽब्रुवन् । राज्ञा हि कारयित्वान्नं वयं स्नातुं समागताः ॥ ३० ॥ आकण्ठतृप्ता विप्रर्षे किंस्विद् भुञ्जामहे वयम् । वृथा पाकः कृतोऽस्माभिस्तत्र किं करवामहे ॥ ३१ ॥ वे मुनिलोग उस समय जलमें उतरकर अघमर्षण मन्त्रका जप कर रहे थे। सहसा उन्हें पूर्ण तृप्तिका अनुभव हुआ; बार-बार अन्नरससे युक्त डकारें आने लगीं। यह देखकर वे जलसे बाहर निकले और आपसमें एक-दूसरेकी ओर देखने लगे। (सबकी एक-सी अवस्था हो रही थी।) वे सभी मुनि दुर्वासाकी ओर देखकर बोले—‘ब्रह्मर्षे! हमलोग राजा युधिष्ठिरको रसोई बनवानेकी आज्ञा देकर स्नान करनेके लिये आये थे, परंतु इस समय इतनी तृप्ति हो रही है कि कण्ठतक अन्न भरा हुआ जान पड़ता है। अब हम कैसे भोजन करेंगे? हमने जो रसोई तैयार करवायी है, वह व्यर्थ होगी। उसके लिये हमें क्या करना चाहिये' ॥ २८—३१ ॥

दुर्वासा उवाच

वृथा पाकेन राजर्षेरपराधः कृतो महान् ।
मास्मानधाक्षुर्दृष्ट्वैव पाण्डवाः क्रूरचक्षुषा ॥ ३२ ॥
स्मृत्वानुभावं राजर्षेरम्बरीषस्य धीमतः ।
बिभेमि सुतरां विप्रा हरिपादाश्रयाज्जनात् ॥ ३३ ॥
पाण्डवाश्च महात्मानः सर्वे धर्मपरायणाः ।
शूराश्च कृतविद्याश्च व्रतिनस्तपसि स्थिताः ॥ ३४ ॥
सदाचाररता नित्यं वासुदेवपरायणाः ।
क्रुद्धास्ते निर्दहेयुर्वै तूलराशिमिवानलः ।
तत एतानपृष्ट्वैव शिष्याः शीघ्रं पलायत ॥ ३५ ॥

दुर्वासा बोले—वास्तवमें व्यर्थ ही रसोई बनवाकर हमने राजर्षि युधिष्ठिरका महान् अपराध किया है। कहीं ऐसा न हो कि पाण्डव क्रूर दृष्टिसे देखकर हमें भस्म कर दें। ब्राह्मणो! परम बुद्धिमान् राजा अम्बरीषके प्रभावको याद करके मैं उन भक्तजनोंसे सदा डरता रहता हूँ, जिन्होंने भगवान् श्रीहरिके चरणोंका आश्रय ले रखा है। सब पाण्डव महामना, धर्मपरायण, विद्वान्, शूरवीर, व्रतधारी तथा तपस्वी हैं। वे सदा सदाचारपरायण तथा भगवान् वासुदेवको अपना परम आश्रय माननेवाले हैं। पाण्डव कुपित होनेपर हमको

उसी प्रकार भस्म कर सकते हैं, जैसे रूईके ढेरको आग। अतः शिष्यो! पाण्डवोंसे बिना पूछे ही तुरंत भाग चलो ॥ ३२—३५ ॥

वैशम्पायन उवाच

इत्युक्तास्ते द्विजाः सर्वे मुनिना गुरुणा तदा । पाण्डवेभ्यो भृशं भीता दुद्रुवुस्ते दिशो दश ॥ ३६ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! गुरु दुर्वासा मुनिके ऐसा कहनेपर वे सब ब्राह्मण पाण्डवोंसे अत्यन्त भयभीत हो दसों दिशाओंमें भाग गये ॥ ३६ ॥

सहदेवो देवनद्यामपश्यन् मुनिसत्तमान् । तीर्थेष्वितस्ततस्तस्या विचचार गवेषयन् ॥ ३७ ॥ सहदेवने जब देवनदीमें उन श्रेष्ठ मुनियोंको नहीं देखा, तब वे वहाँके तीर्थोंमें इधर-उधर खोजते हुए विचरने लगे ॥ ३७ ॥

तत्रस्थेभ्यस्तापसेभ्यः श्रुत्वा तांश्चैव विद्रुतान् । युधिष्ठिरमथाभ्येत्य तं वृत्तान्तं न्यवेदयत् ॥ ३८ ॥ वहाँ रहनेवाले तपस्वी मुनियोंके मुखसे उनके भागनेका समाचार सुनकर सहदेव युधिष्ठिरके पास लौट आये और सारा वृत्तान्त उनसे निवेदन कर दिया ॥ ३८ ॥

ततस्ते पाण्डवाः सर्वे प्रत्यागमनकाङ्क्षिणः । प्रतीक्षन्तः कियत्कालं जितात्मानोऽवतस्थिरे ॥ ३९ ॥ तदनन्तर मनको वशमें करनेवाले सब पाण्डव उनके लौट आनेकी आशासे कुछ देरतक उनकी प्रतीक्षा करते रहे ॥ ३९ ॥

निशीथेऽभ्येत्य चाकस्मादस्मान् स छलयिष्यति । कथं च निस्तरे मास्मात् कृच्छ्राद् दैवोपसादितात् ॥ ४० ॥ इति चिन्तापरान् दृष्ट्वा निःश्वसन्तो मुहुर्मुहुः । उवाच वचनं श्रीमान् कृष्णः प्रत्यक्षतां गतः ॥ ४१ ॥ पाण्डव सोचने लगे—‘दुर्वासा मुनि अकस्मात् आधी रातको आकर हमें छलेंगे। दैववश प्राप्त हुए इस महान् संकटसे हमारा उद्धार कैसे होगा?’ इसी चिन्तामें पड़कर वे बारंबार लंबी साँसें खींचने लगे। उनकी यह दशा देखकर भगवान् श्रीकृष्णने युधिष्ठिर आदि अन्य सब पाण्डवोंको प्रत्यक्ष दर्शन देकर कहा ॥ ४०-४१ ॥

श्रीकृष्ण उवाच

भवतामापदं ज्ञात्वा ऋषेः परमकोपनात् । द्रौपद्या चिन्तितः पार्था अहं सत्वरमागतः ॥ ४२ ॥ न भयं विद्यते तस्मादृषेर्दुर्वाससोऽल्पकम् । तेजसा भवतां भीतः पूर्वमेव पलायितः ॥ ४३ ॥