महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवैशम्पायन उवाच
एवमुक्तः प्रत्युवाच पश्यामि द्रौपदीमिति ॥ ७ ॥
पतिः सौवीरसिन्धूनां दुष्टभावो जयद्रथः ।
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! कोटिकास्यके ऐसा कहनेपर सौवीर और सिन्धु आदि देशोंके स्वामी जयद्रथने मनमें दुर्भावना लेकर उसे उत्तर दिया—'अच्छा, मैं भी द्रौपदीसे मिल लेता हूँ' ॥ ७ १/२ ॥
स प्रविश्याश्रमं पुण्यं सिंहगोष्ठं वृको यथा ॥ ८ ॥
आत्मना सप्तमः कृष्णामिदं वचनमब्रवीत् ।
कुशलं ते वरारोहे भर्तारस्तेऽप्यनामयाः ॥ ९ ॥
येषां कुशलकामासि तेऽपि कच्चिदनामयाः ।
उसने अपने छः भाइयोंके साथ स्वयं सातवाँ बनकर द्रौपदीके पवित्र आश्रममें प्रवेश किया, मानो कोई भेड़िया सिंहकी माँदमें घुसा हो। वहाँ जाकर उसने द्रौपदीसे इस प्रकार कहा—'वरारोहे! तुम कुशलसे हो न? तुम्हारे पति नीरोग तो हैं न? इनके सिवा और जिन लोगोंको तुम सकुशल देखना चाहती हो, वे सभी स्वस्थ तो हैं न? ॥ ८-९ १/२ ॥
द्रौपद्युवाच
अपि ते कुशलं राजन् राष्ट्रे कोशे बले तथा ॥ १० ॥
कच्चिदेकः शिबीनाढ्यान् सौवीरान् सह सिन्धुभिः ।
अनुतिष्ठसि धर्मेण ये चान्ये विजितास्त्वया ॥ ११ ॥
द्रौपदी बोली—राजन्! तुम स्वयं सकुशल हो न? तुम्हारे राज्य, खजाना और सैनिक तो कुशलसे हैं न? समृद्धिशाली शिबि, सौवीर, सिन्धु तथा अन्य जो-जो प्रदेश तुम्हारे अधिकारमें आ गये हैं, उन सबकी प्रजाका तुम धर्मपूर्वक पालन तो करते हो न? ॥ १०-११ ॥
कौरव्यः कुशली राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ।
अहं च भ्रातरश्चास्य यांश्चान्यान् परिपृच्छसि ॥ १२ ॥
पाद्यं प्रतिगृह्णाणेदमासनं च नृपात्मज ।
मेरे पति कुरुकुलरत्न कुन्तीकुमार राजा युधिष्ठिर सकुशल हैं। मैं, उनके चारों भाई तथा अन्य जिन लोगोंके विषयमें तुम पूछ रहे हो, वे सब कुशलसे हैं। राजकुमार! यह पैर धोनेके लिये जल है, इसे ग्रहण करो और यह आसन है, इसपर बैठो ॥ १२ १/२ ॥
जयद्रथ उवाच
एहि मे रथमारोह सुखमाप्नुहि केवलम् ॥ १३ ॥
गतश्रीकांश्च्युतान् राज्यात् कृपणान् गतचेतसः ।