महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअरण्यवासिनः पार्थान् नानुरोद्धुं त्वमर्हसि ।। १४ ।।
नैव प्राज्ञा गतश्रीकं भर्तारमुपयुञ्जते ।
युञ्जानमनुयुञ्जीत न श्रियः संक्षये वसेत् ।। १५ ।।
जयद्रथने कहा—आओ चलो, मेरे रथपर बैठो और अखण्ड सुखका उपभोग करो।
अब पाण्डवोंके पास धन नहीं रहा। उनका राज्य छीन लिया गया। वे दीन और उत्साहहीन
हो गये हैं। अब इन वनवासी कुन्तीपुत्रोंका अनुसरण करना तुम्हें शोभा नहीं देता। विदुषी
स्त्रियाँ निर्धन पतिकी उपासना नहीं करती हैं। स्वामीके पास जबतक लक्ष्मी रहे, तभीतक
उसके साथ रहना चाहिये। जब उसकी सम्पत्ति नष्ट हो जाय, तो वहाँ कदापि न रहे ।। १३
—१५ ।।
श्रिया विहीना राष्ट्राच्च विनष्टाः शाश्वतीः समाः ।
अलं ते पाण्डुपुत्राणां भक्त्या क्लेशमुपासितुम् ।। १६ ।।
पाण्डव सदाके लिये श्रीहीन तथा राज्यभ्रष्ट हो गये हैं। अब तुम्हें पाण्डवोंके प्रति भक्ति
रखकर कष्ट भोगनेकी आवश्यकता नहीं है ।। १६ ।।
भार्या मे भव सुश्रोणि त्यजैनान् सुखमाप्नुहि ।
अखिलान् सिन्धुसौवीरानाप्नुहि त्वं मया सह ।। १७ ।।
सुन्दरि! तुम मेरी भार्या बन जाओ। इन पाण्डवोंको छोड़ दो और मेरे साथ रहकर सुख
भोगो। मेरे साथ रहनेसे तुम्हें सम्पूर्ण सिन्धु और सौवीरदेशका राज्य प्राप्त होगा, तुम
महारानी बनोगी ।। १७ ।।
वैशम्पायन उवाच
इत्युक्ता सिन्धुराजेन वाक्यं हृदयकम्पनम् ।
कृष्णा तस्मादपाक्रामद् देशात् सभ्रुकुटीमुखी ।। १८ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! सिन्धुराज जयद्रथके मुखसे यह हृदय कँपा
देनेवाली बात सुनकर द्रुपदकुमारी कृष्णा उस स्थानसे दूर हट गयी। उसके मुखपर रोष छा
गया और उसकी भौंहें तन गयीं ।। १८ ।।
अवमत्यास्य तद् वाक्यमाक्षिप्य च सुमध्यमा ।
मैवमित्यब्रवीत् कृष्णा लज्जस्वेति च सैन्धव ।। १९ ।।
उसके इस प्रस्तावका तिरस्कार करके सुन्दरी द्रौपदीने उसे कड़ी फटकार सुनायी और
बोली—'खबरदार, फिर कभी ऐसी बात मुखसे मत निकालना। सिन्धुराज! तुम्हें लज्जा
आनी चाहिये थी ।। १९ ।।
सा काङ्क्षमाणा भर्तॄणामुपयातमनिन्दिता ।
विलोभयामास परं वाक्यैर्वाक्यानि युञ्जती ।। २० ।।