महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1781, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंपतिव्रता द्रौपदी चाहती थी कि मेरे पति अभी यहाँ आ जायँ। अतः वह जयद्रथसे वाद-विवाद करती हुई उसे बातोंमें फँसाये रखनेकी चेष्टा करने लगी ॥ २० ॥
(द्रौपद्युवाच
नैवं वद महाबाहो न्याय्यं त्वं न च बुध्यसे ।
पाण्डूनां धार्तराष्ट्राणां स्वसा चैव कनीयसी ।
दुःशला नाम तस्यास्त्वं भर्ता राजकुलोद्वह ॥
मम भ्राता च न्याय्येन त्वया रक्ष्या महारथ ।
धर्मिष्ठानां कुले जातो न धर्मं त्वमवेक्षसे ॥
**द्रौपदी बोली—**महाबाहो! ऐसी पापकी बात न बोलो। कौन-सा कार्य धर्मके अनुकूल और न्यायसंगत है, इसका तुम्हें ज्ञान नहीं है। तुम धृतराष्ट्रपुत्रों तथा पाण्डवोंकी छोटी बहन दुःशलाके पति हो। महारथी राजकुमार! इस नातेसे न्यायतः तुम मेरे भाई हो; अतः तुम्हें मेरी रक्षा करनी चाहिये। तुम्हारा जन्म तो धर्मात्माओंके कुलमें हुआ है, परंतु तुम्हारी दृष्टि धर्मकी ओर नहीं है ॥
वैशम्पायन उवाच
इत्युक्तः सिन्धुराजोऽथ वाक्यमुत्तरमब्रवीत् ।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**द्रौपदीके ऐसा कहनेपर सिन्धुराज जयद्रथने उसे इस प्रकार उत्तर दिया।
जयद्रथ उवाच
राज्ञां धर्मं न जानीषे स्त्रियो रत्नानि चैव हि ।
साधारणानि लोकेऽस्मिन् प्रवदन्ति मनीषिणः ॥)
**जयद्रथ बोला—**कृष्णे! तुम राजाओंका धर्म नहीं जानती। मनीषी पुरुषोंका कथन है कि इस संसारमें स्त्रियाँ तथा रत्न सर्वसाधारणकी वस्तुएँ हैं ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि द्रौपदीहरणपर्वणि जयद्रथद्रौपदीसंवादे
सप्तषष्ट्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २६७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत द्रौपदीहरणपर्वमें जयद्रथद्रौपदीसंवादविषयक दो सौ सरसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २६७ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ४ श्लोक मिलाकर कुल २४ श्लोक हैं)