महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1791, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ें‘अब शीघ्र आश्रमकी ओर लौटो। हमें विलम्ब नहीं करना चाहिये; क्योंकि मेरा मन बुद्धिकी विवेकशक्तिको आच्छादित करके व्यथित तथा चिन्तासे दग्ध हो रहा है। तथा मेरे शरीरमें यह प्राणोंका स्वामी (जीव) भयभीत हुआ छटपटा रहा है ।। ४ ।।
सरः सुपर्णेन हृतोरगं यथा राष्ट्रं यथाराजकमात्तलक्ष्मि । एवंविधं मे प्रतिभाति काम्यकं शौण्डैर्यथा पीतरसश्च कुम्भः ॥ ५ ॥
‘जैसे गरुड़के द्वारा सरोवरमें रहनेवाले महासर्पके पकड़ लिये जानेपर वह मथित-सा हो उठता है, जैसे बिना राजाका राज्य श्रीहीन हो जाता है तथा जिस प्रकार रससे भरा हुआ घड़ा धूर्तोंद्वारा (चुपकेसे) पी लिये जानेपर सहसा खाली दिखायी देता है; उसी प्रकार शत्रुओंद्वारा काम्यकवनकी भी दुरवस्था की गयी है, ऐसा मुझे जान पड़ता है’ ।। ५ ।।
ते सैन्धवैरत्यनिलोग्रवेगै- र्महाजवैर्वाजिभिरुह्यमानाः । युक्तैर्बृहद्भिः सुरथैर्नृवीरा- स्तदाऽऽश्रमायाभिमुखा बभूवुः ॥ ६ ॥
तत्पश्चात् वे नरवीर पाण्डव हवासे भी अधिक तेज चलनेवाले सिन्धुदेशके महान् वेगशाली अश्वोंसे जुते हुए सुन्दर एवं विशाल रथोंपर बैठकर आश्रमकी ओर चले ।। ६ ।।
तेषां तु गोमायुरनल्पघोषो निवर्ततां वाममुपेत्य पार्श्वम् । प्रव्याहरत् तत् प्रविमृश्य राजा प्रोवाच भीमं च धनंजयं च ॥ ७ ॥
उस समय एक गीदड़ बड़े जोरसे रोता हुआ लौटते हुए पाण्डवोंके वामभागसे होकर निकल गया। इस अपशकुनपर विचार करके राजा युधिष्ठिरने भीमसेन और अर्जुनसे कहा— ।। ७ ।।
यथा वदत्येष विहीनयोनिः शालावृको वाममुपेत्य पार्श्वम् । सुव्यक्तमस्मानवमन्य पापैः कृतोऽभिमर्दः कुरुभिः प्रसह्य ॥ ८ ॥
‘यह नीच योनिका गीदड़, जो हमलोगोंके वामभागसे होकर निकला है, जैसा शब्द कर रहा है, उससे स्पष्ट जान पड़ता है कि पापी कौरवोंने यहाँ आकर हमारी अवहेलना करते हुए हठपूर्वक भारी संहार मचा रखा है’ ।। ८ ।।
इत्येव ते तद् वनमाविशन्तो महत्यरण्ये मृगयां चरित्वा ।