महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1792, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंबालामपश्यन्त तदा रुदन्तीं धात्रेयिकां प्रेष्यवधूं प्रियायाः ॥ ९ ॥ इस प्रकार उस विशाल वनमें शिकार खेलकर लौटे हुए पाण्डव जब आश्रमके समीपवर्ती वनमें प्रवेश करने लगे, तब उन्होंने देखा कि उनकी प्रिया द्रौपदीकी दासी धात्रेयिका, जो उन्हींके एक सेवककी स्त्री थी, रो रही है ॥ ९ ॥
तामिन्द्रसेनस्त्वरितोऽभिसृत्य रथादवप्लुत्य ततोऽभ्यधावत् । प्रोवाच चैनां वचनं नरेन्द्र धात्रेयिकामन्तरस्तदानीम् ॥ १० ॥ राजा जनमेजय! उसे रोती देख सारथि इन्द्रसेन तुरंत रथसे कूद पड़ा और वहाँसे दौड़कर धात्रेयिकाके अत्यन्त निकट जाकर उस समय इस प्रकार बोला— ॥ १० ॥
किं रोदिषि त्वं पतिता धरण्यां किं ते मुखं शुष्यति दीनवर्णम् । कच्चिन्न पापैः सुनृशंसकृद्भिः प्रमाथिता द्रौपदी राजपुत्री ॥ ११ ॥ ‘तू इस प्रकार धरतीपर पड़ी क्यों रो रही है? तेरा मुँह दीन होकर क्यों सूख रहा है? कहीं अत्यन्त निष्ठुर कर्म करनेवाले पापी कौरवोंने यहाँ आकर राजकुमारी द्रौपदीका तिरस्कार तो नहीं किया? ॥ ११ ॥
अचिन्त्यरूपा सुविशालनेत्रा शरीरतुल्या कुरुपुङ्गवानाम् । यद्येव देवी पृथिवीं प्रविष्टा दिवं प्रपन्नाप्यथवा समुद्रम् ॥ १२ ॥ तस्या गमिष्यन्ति पदे हि पार्था यथा हि संतप्यति धर्मपुत्रः ।