महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1805, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंपपाताभिमुखः पार्थं छिन्नमूल इव द्रुमः ॥ १४ ॥ तब हृदय विदीर्ण हो जानेके कारण वीर त्रिगर्तराज मुखसे रक्त वमन करता हुआ राजा युधिष्ठिरके सामने ही जड़से कटे हुए वृक्षकी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ १४ ॥
इन्द्रसेनद्वितीयस्तु रथात् प्रस्कन्द्य धर्मराट् । हताश्वः सहदेवस्य प्रतिपेदे महारथम् ॥ १५ ॥ इधर धर्मराज युधिष्ठिर अपने घोड़े मारे जानेके कारण सारथि इन्द्रसेनके साथ सहदेवके विशाल रथपर जा बैठे ॥ १५ ॥
नकुलं त्वभिसंधाय क्षेमङ्करमहामुखौ । उभावुभयतस्तीक्ष्णैः शरवर्षैरवर्षताम् ॥ १६ ॥ दूसरी ओर क्षेमंकर और महामुख नामक दो वीर (राजकुमार) नकुलको लक्ष्य करके दोनों ओरसे तीखे बाणोंकी वर्षा करने लगे ॥ १६ ॥
तोमरैरभिवर्षन्तौ जीमूताविव वार्षिकौ । एकैकेन विपाथेन जघ्ने माद्रवतीसुतः ॥ १७ ॥ उस समय तोमरोंकी वर्षा करते हुए वे दोनों योद्धा वर्षार्त्तुके दो बादलोंके समान जान पड़ते थे। परंतु माद्रीनन्दन नकुलने एक-एक विपाठ नामक बाण मारकर उन दोनोंको धराशायी कर दिया ॥ १७ ॥
त्रिगर्तराजः सुरथस्तस्याथ रथधूर्गतः । रथमाक्षेपयामास गजेन गजयानवित् ॥ १८ ॥ तदनन्तर हाथीका संचालन करनेमें निपुण त्रिगर्तराज सुरथने नकुलके रथके धुरेके पास पहुँचकर अपने हाथीके द्वारा उनके रथको दूर फेंकवा दिया ॥ १८ ॥
नकुलस्त्वपभीस्तस्माद् रथाच्चर्मासिपाणिमान् । उद्भ्रान्तं स्थानमास्थाय तस्थौ गिरिरिवाचलः ॥ १९ ॥ परंतु नकुलको इससे तनिक भी भय नहीं हुआ। वे हाथमें ढाल-तलवार लिये उस रथसे कूद पड़े और एक निरापद स्थानमें आकर पर्वतकी भाँति अविचलभावसे खड़े हो गये ॥ १९ ॥
सुरथस्तं गजवरं वधाय नकुलस्य तु । प्रेषयामास सक्रोधमत्युच्छ्रितकरं ततः ॥ २० ॥ तब सुरथने कुपित होकर अत्यन्त ऊँचे सूँड़ उठाये हुए उस गजराजको नकुलका वध करनेके लिये प्रेरित किया ॥ २० ॥
नकुलस्तस्य नागस्य समीपपरिवर्तिनः । सविषाणं भुजं मूले खड्गेन निरकृन्तत ॥ २१ ॥ परंतु नकुलने खड्गद्वारा अपने निकट आये हुए उस हाथीकी सूँड़को दाँतोंसहित जड़से काट डाला ॥