महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1806, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंस विनद्य महानादं गजः किङ्किणिभूषणः । पतन्नवाक्शिरा भूमौ हस्त्यारोहमपोथयत् ॥ २२ ॥ फिर तो घुघुरुओंसे विभूषित वह गजराज बड़े जोरसे चीत्कार करके नीचे मस्तक किये पृथ्वीपर गिर पड़ा। गिरते-गिरते उसने महावतको भी पृथ्वीपर दे मारा ॥ २२ ॥
स तत् कर्म महत् कृत्वा शूरो माद्रवतीसुतः । भीमसेनरथं प्राप्य शर्म लेभे महारथः ॥ २३ ॥ यह महान् पराक्रम प्रकट करके शूरवीर माद्रीनन्दन महारथी नकुल भीमसेनके रथपर चढ़ गये और वहीं पहुँचकर उन्हें शान्ति मिली ॥ २३ ॥
भीमस्त्वापततो राज्ञः कोटिकास्यस्य सङ्गरे । सूतस्य नुदतो वाहान् क्षुरेणापाहरच्छिरः ॥ २४ ॥ इधर भीमसेनने युद्धमें अपने ऊपर आक्रमण करनेवाले राजा कोटिकास्यके सारथिका, जो उस समय घोड़ोंका संचालन कर रहा था, छुरेसे सिर उड़ा दिया ॥ २४ ॥
न बुबोध हतं सूतं स राजा बाहुशालिना । तस्याश्वा व्यद्रवन् संख्ये हतसूतास्ततस्ततः ॥ २५ ॥ परंतु राजाको यह मालूम न हो सका कि बाहुशाली भीमके द्वारा मेरा सारथि मारा गया है। उसके मारे जानेसे कोटिकास्यके घोड़े रणभूमिमें इधर-उधर भागने लगे ॥ २५ ॥
विमुखं हतसूतं तं भीमः प्रहरतां वरः । जघान तलयुक्तेन प्रासेनाभ्येत्य पाण्डवः ॥ २६ ॥ सारथिके नष्ट हो जानेसे कोटिकास्यको रणसे विमुख हुआ देख योद्धाओंमें श्रेष्ठ पाण्डुनन्दन भीमसेनने उसके पास जाकर प्रास नामक मूठदार शस्त्रसे उसे मार डाला ॥ २६ ॥
द्वादशानां तु सर्वेषां सौवीराणां धनंजयः । चकर्त निशितैर्भल्लैर्धनूंषि च शिरांसि च ॥ २७ ॥ अर्जुनने सौवीरदेशके जो बारह राजकुमार थे, उन सबके धनुष और मस्तक अपने भल्ल नामक तीखे बाणोंसे काट गिराये ॥ २७ ॥
शिबीनेक्ष्वाकुमुख्यांश्च त्रिगर्तान् सैन्धवानपि । जघानातिरथः संख्ये बाणगोचरमागतान् ॥ २८ ॥ उन अतिरथी वीरने युद्धमें बाणोंके लक्ष्य बने हुए शिबि, इक्ष्वाकु, त्रिगर्त और सिन्धुदेशके क्षत्रियोंको भी मार डाला ॥ २८ ॥
सादिताः प्रत्यदृश्यन्त बहवः सव्यसाचिना । सपताकाश्च मातङ्गाः सध्वजाश्च महारथाः ॥ २९ ॥ सव्यसाची अर्जुनके द्वारा मारे या नष्ट किये गये पताकासहित बहुतेरे हाथी और ध्वजायुक्त अनेक विशाल रथ दृष्टिगोचर हो रहे थे ॥ २९ ॥