महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1807, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रच्छाद्य पृथिवीं तस्थुः सर्वमायोधनं प्रति । शरीराण्यशिरस्कानि विदेहानि शिरांसि च ॥ ३० ॥ उस समय बिना सिरके धड़ और बिना धड़के सिर समस्त रणभूमिको आच्छादित करके बिखरे पड़े थे ॥ ३० ॥
श्वगृध्रकङ्ककाकोलभासगोमायुवायसाः । अतृप्यंस्तत्र वीराणां हतानां मांसशोणितैः ॥ ३१ ॥ वहाँ मारे गये वीरोंके मांस तथा रक्तसे कुत्ते, गीध, कंक (सफेद चीलें), काकोल (पहाड़ी कौए) चीलें, गीदड़ और कौए तृप्त हो रहे थे ॥ ३१ ॥
हतेषु तेषु वीरेषु सिन्धुराजो जयद्रथः । विमुच्य कृष्णां संत्रस्तः पलायनपरोऽभवत् ॥ ३२ ॥ उन वीरोंके मारे जानेपर सिन्धुराज जयद्रथ भयसे थर्रा उठा और द्रौपदीको वहीं छोड़कर उसने भाग जानेका विचार किया ॥ ३२ ॥
स तस्मिन् संकुले सैन्ये द्रौपदीमवतार्य ताम् । प्राणप्रेप्सुरुपाधावद् वनं येन नराधमः ॥ ३३ ॥ उस तितर-बितर हुई सेनाके बीच उस द्रौपदीको रथसे उतारकर नराधम जयद्रथ अपने प्राण बचानेके लिये वनकी ओर भागा ॥ ३३ ॥
द्रौपदीं धर्मराजस्तु दृष्ट्वा धौम्यपुरस्कृताम् । माद्रीपुत्रेण वीरेण रथमरोपयत् तदा ॥ ३४ ॥ धर्मराज युधिष्ठिरने देखा कि द्रौपदी धौम्य मुनिको आगे करके आ रही है, तो उन्होंने वीरवर माद्रीनन्दन सहदेवद्वारा उसे रथपर चढ़वा लिया ॥ ३४ ॥
ततस्तद् विद्रुतं सैन्यमपयाते जयद्रथे । आदिश्यादिश्य नाराचैराजघान वृकोदरः ॥ ३५ ॥ जयद्रथके भाग जानेपर सारी सेना इधर-उधर भाग चली, परंतु भीमसेन अपने नाराचोंद्वारा नाम बता-बताकर उन सैनिकोंका वध करने लगे ॥ ३५ ॥
सव्यसाची तु तं दृष्ट्वा पलायन्तं जयद्रथम् । वारयामास निघ्नन्तं भीमं सैन्धवसैनिकान् ॥ ३६ ॥ जयद्रथको भागते देख अर्जुनने उसके सैनिकोंके संहारमें लगे हुए भीमसेनको रोका ॥ ३६ ॥
अर्जुन उवाच
यस्यापचारात् प्राप्तोऽयमस्मान् क्लेशो दुरासदः । तमस्मिन् समरोद्देशे न पश्यामि जयद्रथम् ॥ ३७ ॥