महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1810, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंस तैः परिवृतो राजा तत्रैवोपविवेश ह । प्रविवेशाश्रमं कृष्णा यमाभ्यां सह भामिनी ॥ ५१ ॥ उन ब्राह्मणोंसे घिरे हुए राजा युधिष्ठिर वहीं बैठ गये और भामिनी कृष्णा नकुल-सहदेवके साथ आश्रमके भीतर चली गयी ॥ ५१ ॥ भीमसेनार्जुनौ चापि श्रुत्वा क्रोशगतं रिपुम् । स्वयमश्वांस्तुदन्तौ तौ जवेनैवाभ्यधावताम् ॥ ५२ ॥ इधर भीमसेन और अर्जुनने जब सुना कि हमारा शत्रु जयद्रथ एक कोस आगे निकल गया है, तब वे स्वयं अपने घोड़ोंको हाँकते हुए बड़े वेगसे उसके पीछे दौड़े ॥ ५२ ॥ इदमत्यद्भुतं चात्र चकार पुरुषोऽर्जुनः । क्रोशमात्रगतानश्वान् सैन्धवस्य जघान यत् ॥ ५३ ॥ स हि दिव्यास्त्रसम्पन्नः कृच्छ्रकालेऽप्यसम्भ्रमः । अकरोद् दुष्करं कर्म शरैरस्त्रानुमन्त्रितैः ॥ ५४ ॥ यहाँ वीर पुरुष अर्जुनने एक अद्भुत पराक्रम दिखाया। यद्यपि जयद्रथके घोड़े एक कोस आगे निकल गये थे, तो भी उन्होंने दिव्यास्त्रोंसे अभिमन्त्रित बाणोंद्वारा उन्हें दूरसे ही मार डाला। अर्जुन दिव्यास्त्रसे सम्पन्न थे। संकटकालमें भी घबराते नहीं थे। इसीलिये उन्होंने वह दुष्कर कर्म कर दिखाया ॥ ५३-५४ ॥ ततोऽभ्यधावतां वीरावुभौ भीमधनंजयौ । हताश्वं सैन्धवं भीतमेकं व्याकुलचेतसम् ॥ ५५ ॥ तत्पश्चात् वे दोनों वीर भीम और अर्जुन जयद्रथके पीछे दौड़े। वह अकेला तो था ही, घोड़ोंके मारे जानेसे अत्यन्त भयभीत भी हो गया था। उसके हृदयमें व्याकुलता छा गयी थी ॥ ५५ ॥ सैन्धवस्तु हतान् दृष्ट्वा तथाश्वान् स्वान् सुदुःखितः । अतिविक्रमकर्माणि कुर्वाणं च धनंजयम् ॥ ५६ ॥ सिन्धुराज अपने घोड़ोंको मारा गया देख और अलौकिक पराक्रम कर दिखानेवाले अर्जुनको आता जान अत्यन्त दुःखी हो गया ॥ ५६ ॥ पलायनकृतोत्साहः प्राद्रवद् येन वै वनम् । सैन्धवं त्वभिसम्प्रेक्ष्य पराक्रान्तं पलायने ॥ ५७ ॥ अनुयाय महाबाहुः फाल्गुनो वाक्यमब्रवीत् । अब उसमें केवल भागनेका उत्साह रह गया था, अतः वह वनकी ओर भागा। सिन्धुराजको केवल भागनेमें ही पराक्रम दिखाता देख महाबाहु अर्जुन उसका पीछा करते हुए बोले— ॥ ५७ १/२ ॥ अनेन वीर्येण कथं स्त्रियं प्रार्थयसे बलात् ॥ ५८ ॥ राजपुत्र निवर्तस्व न ते युक्तं पलायनम् ।