महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1809, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंतच्छ्रुत्वा द्रौपदी भीममुवाच व्याकुलेन्द्रिया । कुपिता ह्रीमती प्राज्ञा पती भीमार्जुनवुभौ ॥ ४४ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! युधिष्ठिरकी यह बात सुनकर द्रौपदीकी सारी इन्द्रियाँ व्याकुल हो उठीं। वह लज्जावती और बुद्धिमती होनेपर भी भीमसेन और अर्जुन दोनों पतियोंसे कुपित होकर बोली— ॥ ४४ ॥
कर्तव्यं चेत् प्रियं मह्यं वध्यः स पुरुषाधमः । सैन्धवापसदः पापो दुर्मतिः कुलपांसनः ॥ ४५ ॥ 'यदि आप लोगोंको मेरा प्रिय करना है तो उस नराधमको अवश्य मार डालिये। वह पापी दुर्बुद्धि जयद्रथ सिन्धुदेशका कलङ्क और कुलाङ्गार है ॥ ४५ ॥
भार्याभिहर्ता वैरी यो यश्च राज्यहरो रिपुः । याचमानोऽपि संग्रामे न मोक्तव्यः कथंचन ॥ ४६ ॥ 'जो अपनी पत्नीका अपहरण करनेवाला तथा राज्यको हड़प लेनेवाला हो, ऐसे शत्रुको युद्धमें पाकर वह प्राणोंकी भीख माँगे तो भी किसी तरह जीवित नहीं छोड़ना चाहिये' ॥ ४६ ॥
इत्युक्तौ तौ नरव्याघ्रौ ययतुर्यत्र सैन्धवः । राजा निववृते कृष्णामादाय सपुरोहितः ॥ ४७ ॥ द्रौपदीके ऐसा कहनेपर वे दोनों नरश्रेष्ठ जिस ओर जयद्रथ गया था, उसी ओर चल दिये तथा राजा युधिष्ठिर द्रौपदीको लेकर पुरोहित धौम्यके साथ आश्रमपर चल पड़े ॥ ४७ ॥
स प्रविश्याश्रमपदमपविद्धबृसीमठम् । मार्कण्डेयादिभिर्विप्रैरनुकीर्णं ददर्श ह ॥ ४८ ॥ उन्होंने आश्रममें प्रवेश करके देखा कि बैठनेके आसन और स्वाध्यायके लिये बनी हुई पर्णशालामें सब वस्तुएँ इधर-उधर बिखरी पड़ी थीं। मार्कण्डेय आदि ब्रह्मर्षि वहाँ इकट्ठे हो रहे थे ॥ ४८ ॥
द्रौपदीमनुशोचद्भिर्ब्राह्मणैस्तैः समाहितैः । समियाय महाप्राज्ञः सभार्यो भ्रातृमध्यगः ॥ ४९ ॥ वे सब ब्राह्मण एकाग्रचित्त हो द्रौपदीके लिये ही बार-बार शोक कर रहे थे। इतनेमें ही पत्नीसहित परम बुद्धिमान् युधिष्ठिर अपने भाई नकुल और सहदेवके बीचमें होकर चलते हुए वहाँ आ पहुँचे ॥ ४९ ॥
ते स्म तं मुदिता दृष्ट्वा पुनः प्रत्यागतं नृपम् । जित्वा तान् सिन्धुसौवीरान् द्रौपदीं चाहृतां पुनः ॥ ५० ॥ सिन्धु और सौवीरदेशके क्षत्रियोंको जीतकर महाराज लौटे हैं और द्रौपदीदेवी भी पुनः आश्रममें आ गयी हैं, यह देखकर उन ऋषियोंको बड़ी प्रसन्नता हुई ॥ ५० ॥