महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
तच्छ्रुत्वा द्रौपदी भीममुवाच व्याकुलेन्द्रिया । कुपिता ह्रीमती प्राज्ञा पती भीमार्जुनवुभौ ॥ ४४ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! युधिष्ठिरकी यह बात सुनकर द्रौपदीकी सारी इन्द्रियाँ व्याकुल हो उठीं। वह लज्जावती और बुद्धिमती होनेपर भी भीमसेन और अर्जुन दोनों पतियोंसे कुपित होकर बोली— ॥ ४४ ॥
कर्तव्यं चेत् प्रियं मह्यं वध्यः स पुरुषाधमः । सैन्धवापसदः पापो दुर्मतिः कुलपांसनः ॥ ४५ ॥ 'यदि आप लोगोंको मेरा प्रिय करना है तो उस नराधमको अवश्य मार डालिये। वह पापी दुर्बुद्धि जयद्रथ सिन्धुदेशका कलङ्क और कुलाङ्गार है ॥ ४५ ॥
भार्याभिहर्ता वैरी यो यश्च राज्यहरो रिपुः । याचमानोऽपि संग्रामे न मोक्तव्यः कथंचन ॥ ४६ ॥ 'जो अपनी पत्नीका अपहरण करनेवाला तथा राज्यको हड़प लेनेवाला हो, ऐसे शत्रुको युद्धमें पाकर वह प्राणोंकी भीख माँगे तो भी किसी तरह जीवित नहीं छोड़ना चाहिये' ॥ ४६ ॥
इत्युक्तौ तौ नरव्याघ्रौ ययतुर्यत्र सैन्धवः । राजा निववृते कृष्णामादाय सपुरोहितः ॥ ४७ ॥ द्रौपदीके ऐसा कहनेपर वे दोनों नरश्रेष्ठ जिस ओर जयद्रथ गया था, उसी ओर चल दिये तथा राजा युधिष्ठिर द्रौपदीको लेकर पुरोहित धौम्यके साथ आश्रमपर चल पड़े ॥ ४७ ॥
स प्रविश्याश्रमपदमपविद्धबृसीमठम् । मार्कण्डेयादिभिर्विप्रैरनुकीर्णं ददर्श ह ॥ ४८ ॥ उन्होंने आश्रममें प्रवेश करके देखा कि बैठनेके आसन और स्वाध्यायके लिये बनी हुई पर्णशालामें सब वस्तुएँ इधर-उधर बिखरी पड़ी थीं। मार्कण्डेय आदि ब्रह्मर्षि वहाँ इकट्ठे हो रहे थे ॥ ४८ ॥
द्रौपदीमनुशोचद्भिर्ब्राह्मणैस्तैः समाहितैः । समियाय महाप्राज्ञः सभार्यो भ्रातृमध्यगः ॥ ४९ ॥ वे सब ब्राह्मण एकाग्रचित्त हो द्रौपदीके लिये ही बार-बार शोक कर रहे थे। इतनेमें ही पत्नीसहित परम बुद्धिमान् युधिष्ठिर अपने भाई नकुल और सहदेवके बीचमें होकर चलते हुए वहाँ आ पहुँचे ॥ ४९ ॥
ते स्म तं मुदिता दृष्ट्वा पुनः प्रत्यागतं नृपम् । जित्वा तान् सिन्धुसौवीरान् द्रौपदीं चाहृतां पुनः ॥ ५० ॥ सिन्धु और सौवीरदेशके क्षत्रियोंको जीतकर महाराज लौटे हैं और द्रौपदीदेवी भी पुनः आश्रममें आ गयी हैं, यह देखकर उन ऋषियोंको बड़ी प्रसन्नता हुई ॥ ५० ॥
स तैः परिवृतो राजा तत्रैवोपविवेश ह । प्रविवेशाश्रमं कृष्णा यमाभ्यां सह भामिनी ॥ ५१ ॥ उन ब्राह्मणोंसे घिरे हुए राजा युधिष्ठिर वहीं बैठ गये और भामिनी कृष्णा नकुल-सहदेवके साथ आश्रमके भीतर चली गयी ॥ ५१ ॥ भीमसेनार्जुनौ चापि श्रुत्वा क्रोशगतं रिपुम् । स्वयमश्वांस्तुदन्तौ तौ जवेनैवाभ्यधावताम् ॥ ५२ ॥ इधर भीमसेन और अर्जुनने जब सुना कि हमारा शत्रु जयद्रथ एक कोस आगे निकल गया है, तब वे स्वयं अपने घोड़ोंको हाँकते हुए बड़े वेगसे उसके पीछे दौड़े ॥ ५२ ॥ इदमत्यद्भुतं चात्र चकार पुरुषोऽर्जुनः । क्रोशमात्रगतानश्वान् सैन्धवस्य जघान यत् ॥ ५३ ॥ स हि दिव्यास्त्रसम्पन्नः कृच्छ्रकालेऽप्यसम्भ्रमः । अकरोद् दुष्करं कर्म शरैरस्त्रानुमन्त्रितैः ॥ ५४ ॥ यहाँ वीर पुरुष अर्जुनने एक अद्भुत पराक्रम दिखाया। यद्यपि जयद्रथके घोड़े एक कोस आगे निकल गये थे, तो भी उन्होंने दिव्यास्त्रोंसे अभिमन्त्रित बाणोंद्वारा उन्हें दूरसे ही मार डाला। अर्जुन दिव्यास्त्रसे सम्पन्न थे। संकटकालमें भी घबराते नहीं थे। इसीलिये उन्होंने वह दुष्कर कर्म कर दिखाया ॥ ५३-५४ ॥ ततोऽभ्यधावतां वीरावुभौ भीमधनंजयौ । हताश्वं सैन्धवं भीतमेकं व्याकुलचेतसम् ॥ ५५ ॥ तत्पश्चात् वे दोनों वीर भीम और अर्जुन जयद्रथके पीछे दौड़े। वह अकेला तो था ही, घोड़ोंके मारे जानेसे अत्यन्त भयभीत भी हो गया था। उसके हृदयमें व्याकुलता छा गयी थी ॥ ५५ ॥ सैन्धवस्तु हतान् दृष्ट्वा तथाश्वान् स्वान् सुदुःखितः । अतिविक्रमकर्माणि कुर्वाणं च धनंजयम् ॥ ५६ ॥ सिन्धुराज अपने घोड़ोंको मारा गया देख और अलौकिक पराक्रम कर दिखानेवाले अर्जुनको आता जान अत्यन्त दुःखी हो गया ॥ ५६ ॥ पलायनकृतोत्साहः प्राद्रवद् येन वै वनम् । सैन्धवं त्वभिसम्प्रेक्ष्य पराक्रान्तं पलायने ॥ ५७ ॥ अनुयाय महाबाहुः फाल्गुनो वाक्यमब्रवीत् । अब उसमें केवल भागनेका उत्साह रह गया था, अतः वह वनकी ओर भागा। सिन्धुराजको केवल भागनेमें ही पराक्रम दिखाता देख महाबाहु अर्जुन उसका पीछा करते हुए बोले— ॥ ५७ १/२ ॥ अनेन वीर्येण कथं स्त्रियं प्रार्थयसे बलात् ॥ ५८ ॥ राजपुत्र निवर्तस्व न ते युक्तं पलायनम् ।
कथं ह्यनुचरान् हित्वा शत्रुमध्ये पलायसे ॥ ५९ ॥
'राजकुमार! लौटो, तुम्हें पीठ दिखाकर भागना शोभा नहीं देता। अपने सेवकोंको शत्रुओंके बीचमें छोड़कर कैसे भागे जा रहे हो? क्या इसी बलसे तुम दूसरेकी स्त्रीको बलपूर्वक हरकर ले जाना चाहते थे?' ॥ ५८-५९ ॥
इत्युच्यमानः पार्थेन सैन्धवो न न्यवर्तत ।
तिष्ठ तिष्ठेति तं भीमः सहसाभ्यद्रवद् बली ।
मा वधीरिति पार्थस्तं दयावान् प्रत्यभाषत ॥ ६० ॥
अर्जुनके इस प्रकार ताने देनेपर भी सिन्धुराज नहीं लौटा, तब महाबली भीम 'ठहरो, ठहरो' कहते हुए सहसा उसके पीछे दौड़े। उस समय दयालु अर्जुनने उनसे कहा—'भैया! इसकी जान न मारना' ॥ ६० ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि द्रौपदीहरणपर्वणि जयद्रथपलायने एकसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २७१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत द्रौपदीहरणपर्वमें जयद्रथपलायनविषयक दो सौ इकहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २७१ ॥
(जयद्रथविमोक्षणपर्व)
(जयद्रथविमोक्षणपर्व)
द्विसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः
भीमद्वारा बंदी होकर जयद्रथका युधिष्ठिरके सामने उपस्थित होना, उनकी आज्ञासे छूटकर उसका गंगाद्वारमें तप करके भगवान् शिवसे वरदान पाना तथा भगवान् शिवद्वारा अर्जुनके सहायक भगवान् श्रीकृष्णकी महिमाका वर्णन
वैशम्पायन उवाच
जयद्रथस्तु सम्प्रेक्ष्य भ्रातरावुद्यतावुभौ ।
प्राधावत् तूर्णमव्यग्रो जीवितेप्सुः सुदुःखितः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! भीम और अर्जुन दोनों भाइयोंको अपने वधके लिये तुले हुए देख जयद्रथ बहुत दुःखी हुआ और घबराहट छोड़कर प्राण बचानेकी इच्छासे तुरंत तीव्र गतिसे भागने लगा ॥ १ ॥
तं भीमसेनो धावन्तमवतीर्य रथाद् बली ।
अभिद्रुत्य निजग्राह केशपक्षे ह्यमर्षणः ॥ २ ॥
उसे भागता देख अमर्षमें भरे हुए महाबली भीम भी रथसे उतर गये और बड़े वेगसे दौड़कर उन्होंने उसके केश पकड़ लिये ॥ २ ॥
समुद्यम्य च तं भीमो निष्पिपेषा महीतले ।
शिरो गृहीत्वा राजानं ताडयामास चैव ह ॥ ३ ॥
तत्पश्चात् भीमने उसे ऊपर उठाकर धरतीपर पटक दिया और उसे रौंदने लगे। फिर उन्होंने राजा जयद्रथका सिर पकड़कर उसे कई थप्पड़ लगाये ॥ ३ ॥
पुनः संजीवमानस्य तस्योत्पतितुमिच्छतः ।
पदा मूर्ध्नि महाबाहुः प्राहरद् विलपिष्यतः ॥ ४ ॥
तस्य जानू ददौ भीमो जघ्ने चैनमरत्निना ।
स मोहमगमद् राजा प्रहारवरपीडितः ॥ ५ ॥
इतनी मार खाकर भी वह अभी जीवित ही था और उठनेकी इच्छा कर रहा था। इसी समय महाबाहु भीमने उसके मस्तकपर एक लात मारी। इससे वह रोने-चिल्लाने लगा, तो
भी भीमसेनने उसे गिराकर उसके शरीरपर अपने दोनों घुटने रख दिये और उसे घूँसोंसे मारने लगे। इस प्रकार बड़े जोरकी मार पड़नेसे पीड़ाके मारे राजा जयद्रथ मूर्छित हो गया ॥ ४-५ ॥
सरोषं भीमसेनं तु वारयामास फाल्गुनः । दुःशलायाः कृते राजा यत् तदाहेति कौरव ॥ ६ ॥
इतनेपर भी भीमसेनका क्रोध कम नहीं हुआ। यह देख अर्जुनने उन्हें रोका और कहा—'कुरुनन्दन! दुःशलाके वैधव्यका खयाल करके महाराजने जो आज्ञा दी थी, उसका भी तो विचार कीजिये' ॥ ६ ॥
भीमसेन उवाच
नायं पापसमाचारो मत्तो जीवितुमर्हति । कृष्णायास्तदनर्हायाः परिक्लेश नराधमः ॥ ७ ॥
भीमसेनने कहा—इस नराधमने क्लेश पानेके अयोग्य द्रौपदीको कष्ट पहुँचाया है; अतः अब मेरे हाथसे इस पापाचारी जयद्रथका जीवित रहना ठीक नहीं है ॥ ७ ॥
किं नु शक्यं मया कर्तुं यद् राजा सततं घृणी । त्वं च बालिशया बुद्ध्या सदैवस्मान् प्रबाधसे ॥ ८ ॥
परंतु मैं क्या कर सकता हूँ? राजा युधिष्ठिर सदा दयालु ही बने रहते हैं और तुम भी अपनी बालबुद्धिके कारण मेरे ऐसे कामोंमें सदा बाधा पहुँचाया करते हो ॥ ८ ॥
एवमुक्त्वा सटास्तस्य पञ्च चक्रे वृकोदरः । अर्धचन्द्रेण बाणेन किंचिदब्रुवतस्तदा ॥ ९ ॥
ऐसा कहकर भीमने जयद्रथके लम्बे-लम्बे बालोंको अर्द्धचन्द्राकार बाणसे मूँड़कर पाँच चोटियाँ रख दीं। उस समय वह भयके मारे कुछ भी बोल नहीं पाता था ॥ ९ ॥
विकत्थयित्वा राजानं ततः प्राह वृकोदरः । जीवितुं चेच्छसे मूढ हेतुं मे गदतः शृणु ॥ १० ॥
तदनन्तर कटुवचनोंसे सिन्धुराजका तिरस्कार करते हुए भीमने उससे कहा—'अरे मूढ़! यदि तू जीवित रहना चाहता है तो जीवनरक्षाका हेतुभूत मेरा यह वचन सुन— ॥ १० ॥
दासोऽस्मीति तथा वाच्यं संसत्सु च सभासु च । एवं ते जीवितं दद्यामेष युद्धजितो विधिः ॥ ११ ॥
'तू राजाओंकी सभा-समितियोंमें जाकर सदा अपनेको (महाराज युधिष्ठिरका) दास बताया कर। यह शर्त स्वीकार हो, तो तुझे जीवन-दान दे सकता हूँ। युद्धमें विजयी पुरुषकी ओरसे हारे हुएके लिये ऐसा ही विधान है' ॥ ११ ॥
एवमस्त्विति तं राजा कृष्यमाणो जयद्रथः ।
प्रोवाच पुरुषव्याघ्रं भीममाहवशोभिनम् ॥ १२ ॥ उस समय सिन्धुराज जयद्रथ धरतीपर घसीटा जा रहा था। उसने उपर्युक्त शर्त स्वीकार कर ली और युद्धमें शोभा पानेवाले पुरुषसिंह भीमसेनसे अपनी स्वीकृति स्पष्ट बता दी ॥ १२ ॥
तत एनं विचेष्टन्तं बद्ध्वा पार्थो वृकोदरः । रथमारोपयामास विसंज्ञं पांसुगुण्ठितम् ॥ १३ ॥ तदनन्तर वह उठनेकी चेष्टा करने लगा। तब कुन्तीकुमार वृकोदरने उसे बाँधकर रथपर डाल दिया। वह बेचारा धूलसे लथपथ और अचेत हो रहा था ॥
ततस्तं रथमास्थाय भीमः पार्थानुगस्तदा । अभ्येत्याश्रममध्यस्थमभ्यगच्छद् युधिष्ठिरम् ॥ १४ ॥ उसे रथपर चढ़ाकर आगे-आगे भीम चले और पीछे-पीछे अर्जुन। आश्रमपर आकर भीमसेन वहाँ मध्यभागमें बैठे हुए राजा युधिष्ठिरके पास गये ॥ १४ ॥
दर्शयामास भीमस्तु तदवस्थं जयद्रथम् । तं राजा प्राहसद् दृष्ट्वा मुच्यतामिति चाब्रवीत् ॥ १५ ॥ भीमने उसी अवस्थामें जयद्रथको महाराजके सामने उपस्थित किया। उसे देखकर राजा युधिष्ठिर जोर-जोरसे हँसने लगे और बोले—'अब इसे छोड़ दो' ॥ १५ ॥
राजानं चाब्रवीद् भीमो द्रौपद्याः कथ्यतामिति । दासभावगतो ह्येष पाण्डूनां पापचेतनः ॥ १६ ॥ तब भीमसेनने भी राजासे कहा—'आप द्रौपदीको यह सूचित कर दीजिये कि यह पापात्मा जयद्रथ पाण्डवोंका दास हो चुका है' ॥ १६ ॥
तमुवाच ततो ज्येष्ठो भ्राता सप्रणयं वचः । मुञ्चैनमधमाचारं प्रमाणा यदि ते वयम् ॥ १७ ॥ तब बड़े भाई युधिष्ठिरने प्रेमपूर्वक भीमसेनसे कहा—'यदि तुम मेरी बात मानते हो तो इस पापाचारीको छोड़ दो' ॥ १७ ॥
द्रौपदी चाब्रवीद् भीममभिप्रेक्ष्य युधिष्ठिरम् । दासोऽयं मुच्यतां राजंस्त्वया पञ्चसटः कृतः ॥ १८ ॥ उस समय द्रौपदीने भी युधिष्ठिरकी ओर देखकर भीमसेनसे कहा—'आपने इसका सिर मूँड़कर पाँच चोटियाँ रख दी हैं तथा यह महाराजका दास हो गया है; अतः अब इसे छोड़ दीजिये' ॥ १८ ॥
स मुक्तोऽभ्येत्य राजानमभिवाद्य युधिष्ठिरम् । ववन्दे विह्वलो राजंस्तांश्च दृष्ट्वा मुनींस्तदा ॥ १९ ॥ राजन्! तब जयद्रथ बन्धनसे मुक्त कर दिया गया। उसने विह्वल होकर राजा युधिष्ठिरके पास जा उन्हें प्रणाम करनेके पश्चात् वहाँ बैठे हुए अन्यान्य मुनियोंको भी देखकर उनके चरणोंमें मस्तक झुकाया ॥ १९ ॥
तमुवाच घृणी राजा धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः । तथा जयद्रथं दृष्ट्वा गृहीतं सव्यसाचिना ॥ २० ॥ उस समय (आदर देते हुए) अर्जुनने जयद्रथका हाथ थाम लिया। तब दयालु राजा धर्मपुत्र युधिष्ठिरने जयद्रथकी ओर देखकर कहा— ॥ २० ॥
अदासो गच्छ मुक्तोऽसि मैवं कार्षीः पुनः क्वचित् । स्त्रीकामं वा धिगस्तु त्वां क्षुद्रः क्षुद्रसहायवान् ॥ २१ ॥ एवंविधं हि कः कुर्यात् त्वदन्यः पुरुषाधमः ।
(कर्म धर्मविरुद्धं वै लोकदुष्टं च कर्म ते ।) 'सिंधुराज! अब तू दास नहीं रहा, जा, तुझे छोड़ दिया गया है। फिर कभी ऐसा काम न करना। अरे! तू परायी स्त्रीकी इच्छा करता है, तुझे धिक्कार है! तू स्वयं तो नीच है ही तेरे सहायक भी अधम हैं। तेरे सिवा दूसरा कौन ऐसा नराधम है जो ऐसा धर्मविरुद्ध कार्य कर सके? तेरा यह कर्म सम्पूर्ण लोकमें निन्दित है' ।। २१ १/२ ।। गतसत्त्वमिव ज्ञात्वा कर्तारमशुभस्य तम् ।। २२ ।। सम्प्रेक्ष्य भरतश्रेष्ठः कृपां चक्रे नराधिपः । धर्मे ते वर्धतां बुद्धिर्मा चाधर्मे मनः कृथाः ।। २३ ।। साश्वः सरथपादातः स्वस्ति गच्छ जयद्रथ । वह अशुभ कर्म करनेवाला जयद्रथ मृतप्राय-सा हो गया है, यह देख और समझकर भरतश्रेष्ठ राजा युधिष्ठिरने उसपर कृपा की और कहा—'तेरी बुद्धि धर्ममें उत्तरोत्तर बढ़ती रहे, तू कभी अधर्ममें मन न लगाना। जयद्रथ! अपने रथ, घोड़े और पैदल सबको साथ लिये कुशलपूर्वक चला जा' ।। २२-२३ १/२ ।। एवमुक्तस्तु सव्रीडं तूष्णीं किंचिदवाङ्मुखः ।। २४ ।। जगाम राजन् दुःखार्तो गङ्गाद्वाराय भारत । स देवं शरणं गत्वा विरूपाक्षमुमापतिम् ।। २५ ।। तपश्चचार विपुलं तस्य प्रीतो वृषध्वजः । बलिं स्वयं प्रत्यगृह्णात् प्रीयमाणस्त्रिलोचनः ।। २६ ।। राजन्! युधिष्ठिरके ऐसा कहनेपर जयद्रथ बहुत लज्जित हुआ और नीचा मुँह किये वहाँसे चुपचाप चला गया। जनमेजय! वह पराजित होनेके महान् दुःखसे पीड़ित था; अतः वहाँसे घर न जाकर गंगाद्वार (हरिद्वार)-को चल दिया। वहाँ पहुँचकर उसने तीन नेत्रोंवाले भगवान् उमापतिकी शरण ले बड़ी भारी तपस्या की। इससे भगवान् शंकर प्रसन्न हो गये। त्रिनेत्रधारी महादेवने प्रसन्नतापूर्वक स्वयं दर्शन देकर उसकी पूजा ग्रहण की ।। २४—२६ ।। वरं चास्मै ददौ देवः स जग्राह च तच्छृणु । समस्तान् सरथान् पञ्च जयेयं युधि पाण्डवान् ।। २७ ।। इति राजाब्रवीद् देवं नेति देवस्तमब्रवीत् । अजयांश्चाप्यवध्यांश्च वारयिष्यसि तान् युधि ।। २८ ।। ऋतेऽर्जुनं महाबाहुं नरं नाम सुरेश्वरम् । बदर्यां तप्ततपसं नारायणसहायकम् ।। २९ ।। जनमेजय! भगवान्ने उसे वर दिया और जयद्रथने उसको ग्रहण किया। वह वर क्या था? यह बताता हूँ, सुनो—'मैं रथसहित पाँचों पाण्डवोंको युद्धमें जीत लूँ', यही वर सिन्धुराजने महादेवजीसे माँगा। परंतु महादेवजीने उससे कहा—'ऐसा नहीं हो सकता। पाण्डव अजेय और अवध्य हैं। तुम केवल एक दिन युद्धमें महाबाहु अर्जुनको छोड़कर
अन्य चार पाण्डवोंको आगे बढ़नेसे रोक सकते हो। देवेश्वर नर, जो बदरिकाश्रममें भगवान् नारायणके साथ रहकर तपस्या करते हैं, वे ही अर्जुन हैं ।। २७—२९ ।।
अजितं सर्वलोकानां देवैरपि दुरासदम् ।
मया दत्तं पाशुपतं दिव्यमप्रतिमं शरम् ।
अवाप लोकपालेभ्यो वज्रादीन् स महाशरान् ॥ ३० ॥
‘उन्हें तुम तो क्या, सम्पूर्ण लोक मिलकर भी जीत नहीं सकते। उनका सामना करना तो देवताओंके लिये भी कठिन है। मैंने उन्हें पाशुपत नामक दिव्य अस्त्र प्रदान किया है, जिसके जोड़का दूसरा कोई अस्त्र ही नहीं है। इसके सिवा अन्यान्य लोकपालोंसे भी उन्होंने वज्र आदि महान् अस्त्र प्राप्त किये हैं ।। ३० ।।
देवदेवो ह्यनन्तात्मा विष्णुः सुरगुरुः प्रभुः ।
प्रधानपुरुषोऽव्यक्तो विश्वात्मा विश्वमूर्तिमान् ॥ ३१ ॥
[‘अब मैं तुम्हें नरस्वरूप अर्जुनके सहायक भगवान् नारायणकी महिमा बताता हूँ, सुनो] भगवान् नारायण देवताओंके भी देवता, अनन्तस्वरूप, सर्वव्यापी, देवगुरु, सर्वसमर्थ, प्रकृति-पुरुषरूप, अव्यक्त, विश्वात्मा एवं विश्वरूप हैं ।। ३१ ।।
युगान्तकाले सम्प्राप्ते कालाग्निर्दहते जगत् ।
सपर्वतार्णवद्वीपं सशैलवनकाननम् ॥ ३२ ॥ 'प्रलयकाल उपस्थित होनेपर वे भगवान् विष्णु ही कालाग्निरूपसे प्रकट हो पर्वत, समुद्र, द्वीप, शैल, वन और काननोंसहित सम्पूर्ण जगत्को दग्ध कर देते हैं ॥ ३२ ॥
निर्दहन् नागलोकांश्च पातालतलचारिणः । अथान्तरिक्षे सुमहन्नानावर्णाः पयोधराः ॥ ३३ ॥ 'फिर पातालतलमें विचरण करनेवाले नागलोकोंको भी वे भस्म कर डालते हैं। कालाग्निद्वारा सब कुछ भस्म हो जानेपर आकाशमें अनेक रंगके महान् मेघोंकी घोर घटा घिर आती है ॥ ३३ ॥
घोरस्वरा विनदिनस्तडिन्मालावसम्बिनः । समुत्तिष्ठन् दिशः सर्वा विवर्षन्तः समन्ततः ॥ ३४ ॥ 'भयंकर स्वरसे गर्जना करते हुए वे बादल बिजलियोंकी मालाओंसे प्रकाशित हो सम्पूर्ण दिशाओंमें फैल जाते और सब ओर वर्षा करने लग जाते हैं ॥ ३४ ॥
ततोऽग्निं नाशयामासुः संवर्ताग्निनियामकाः । अक्षमात्रैश्च धाराभिस्तिष्ठन्त्यापूर्य सर्वशः ॥ ३५ ॥ 'इससे प्रलयकालीन अग्नि बुझ जाती है। संवर्तक अग्निका नियन्त्रण करनेवाले वे महामेघ लंबे सर्पोंके समान मोटी धाराओंसे जल गिराते हुए सबको डुबो देते हैं ॥ ३५ ॥
एकार्णवे तदा तस्मिन्नुपशान्तचराचरे । नष्टचन्द्रार्कपवने ग्रहनक्षत्रवर्जिते ॥ ३६ ॥ 'उस समय सम्पूर्ण दिशाओंमें पानी भर जानेसे चारों ओर एकाकार जलमय समुद्र ही दृष्टिगोचर होता है। उस एकार्णवके जलमें समस्त चराचर जगत् नष्ट हो जाता है। चन्द्रमा, सूर्य और वायु भी विलीन हो जाते हैं। ग्रह और नक्षत्रोंका अभाव हो जाता है ॥ ३६ ॥
चतुर्युगसहस्रान्ते सलिलेनाप्लुता मही । ततो नारायणाख्यस्तु सहस्राक्षः सहस्रपात् ॥ ३७ ॥ सहस्रशीर्षा पुरुषः स्वप्तुकामस्त्वतीन्द्रियः । फटासहस्रविकटं शेषं पर्यङ्कभाजनम् ॥ ३८ ॥ सहस्रमिव तिग्मांशुसंघातममितद्युतिम् । कुन्देन्दुहारगोक्षीरमृणालकुमुदप्रभम् ॥ ३९ ॥ तत्रासौ भगवान् देवः स्वपञ्जलनिधौ तदा । नैशेन तमसा व्याप्तां स्वां रात्रिं कुरुते विभुः ॥ ४० ॥ 'एक हजार चतुर्युगी समाप्त होनेपर उपर्युक्त एकार्णवके जलमें यह पृथ्वी डूब जाती है। तत्पश्चात् नारायण नामसे प्रसिद्ध भगवान् श्रीहरि उस एकार्णवके जलमें शयन करनेके हेतु अपने लिये निशाकालोचित अन्धकार (तमोगुण)-से व्याप्त महारात्रिका निर्माण करते हैं। उन भगवान्के सहस्रों नेत्र, सहस्रों चरण और सहस्रों मस्तक हैं। वे अन्तर्यामी पुरुष हैं
और इन्द्रियातीत होनेपर भी शयन करनेकी इच्छासे उन शेषनागको अपना पर्यंक बनाते हैं जो सहस्रों फणोंसे विकटाकार दिखायी देते हैं। वे शेषनाग एक सहस्र प्रचण्ड सूर्योंके समूहकी भाँति अनन्त एवं असीम प्रभा धारण करते हैं। उनकी कान्ति कुन्द-पुष्प, चन्द्रमा, मुक्ताहार, गोदुग्ध, कमलनाल तथा कुमुद-कुसुमके समान उज्ज्वल है। उन्हींकी शय्या बनाकर भगवान् श्रीहरि शयन करते हैं ।। सत्त्वोद्रेकात् प्रबुद्धस्तु शून्यं लोकमपश्यत । इमं चोदाहरन्त्यत्र श्लोकं नारायणं प्रति ।। ४१ ।। 'तत्पश्चात् सृष्टिकालमें सत्त्वगुणके आधिक्यसे भगवान् योगनिद्रासे जाग उठे। जागनेपर उन्हें यह समस्त लोक सूना दिखायी दिया। महर्षिगण भगवान् नारायणके सम्बन्धमें यहाँ इस श्लोकका उदाहरण दिया करते हैं— ।। ४१ ।। आपो नारास्ततनव इत्यपां नाम शुश्रुम । अयनं तेन चैवास्ते तेन नारायणः स्मृतः ।। ४२ ।। 'जल भगवान्का शरीर है, इसीलिये उनका नाम 'नार' सुनते आये हैं। वह नार ही उनका अयन (गृह) है अथवा उसके साथ एक होकर वे रहते हैं, इसीलिये उन भगवान्को नारायण कहा गया है' ।। ४२ ।। प्रध्यानसमकालं तु प्रजाहेतोः सनातनः । ध्यातमात्रे तु भगवन्नाभ्यां पद्मः समुत्थितः ।। ४३ ।। 'तत्पश्चात् प्रजाकी सृष्टिके लिये भगवान्ने चिन्तन किया। इस चिन्तनके साथ ही भगवान्की नाभिसे सनातन कमल प्रकट हुआ ।। ४३ ।। ततश्चतुर्मुखो ब्रह्मा नाभिपद्माद् विनिःसृतः । तत्रोपविष्टः सहसा पद्मे लोकपितामहः ।। ४४ ।। शून्यं दृष्ट्वा जगत् कृत्स्नं मानसानात्मनः समान् । ततो मरीचिप्रमुखान् महर्षीनसृजन्नव ।। ४५ ।। 'उस नाभिकमलसे चतुर्मुख ब्रह्माजीका प्रादुर्भाव हुआ। उस कमलपर बैठे हुए लोकपितामह ब्रह्माजीने सहसा सम्पूर्ण जगत्को शून्य देखकर अपने मानसपुत्रके रूपमें अपने ही-जैसे प्रभावशाली मरीचि आदि नौ महर्षियोंको उत्पन्न किया ।। ४४-४५ ।। तेऽसृजन् सर्वभूतानि त्रसानि स्थावराणि च । यक्षराक्षसभूतानि पिशाचोरगमानुषान् ।। ४६ ।। 'उन महर्षियोंने स्थावर-जंगमरूप सम्पूर्ण भूतोंकी तथा यक्ष, राक्षस, भूत, पिशाच, नाग और मनुष्योंकी सृष्टि की ।। ४६ ।। सृज्यते ब्रह्ममूर्तिस्तु रक्षते पौरुषी तनुः । रौद्रीभावेन शमयेत् तिस्रोऽवस्थाः प्रजापतेः ।। ४७ ।।
‘ब्रह्माजीके रूपसे भगवान् सृष्टि करते हैं। परमपुरुष नारायणरूपसे इसकी रक्षा करते हैं तथा रुद्रस्वरूपसे सबका संहार करते हैं। इस प्रकार प्रजापालक भगवान्की ये तीन अवस्थाएँ हैं ।। ४७ ।। न श्रुतं ते सिन्धुपते विष्णोरद्भुतकर्मणः । कथ्यमानानि मुनिभिर्ब्राह्मणैर्वेदपारगैः ।। ४८ ।। ‘सिन्धुराज! क्या तुमने वेदोंके पारंगत ब्रह्मर्षियोंके मुखसे अद्भुतकर्मा भगवान् विष्णुका चरित्र नहीं सुना है? ।। ४८ ।। जलेन समनुप्राप्ते सर्वतः पृथिवीतले । तदा चैकार्णवे तस्मिन्नेकाकाशे प्रभुश्चरन् ।। ४९ ।। निशायामिव खद्योतः प्रावृट्काले समन्ततः । प्रतिष्ठानाय पृथिवीं मार्गमाणस्तदाभवत् ।। ५० ।। ‘समस्त भूमण्डल सब ओरसे जलमें डूबा हुआ था। उस समय एकार्णवसे उपलक्षित एकमात्र आकाशमें पृथ्वीका पता लगानेके लिये भगवान् इस प्रकार विचर रहे थे, जैसे वर्षाकालकी रातमें जुगनू सब ओर उड़ता फिरता है। वे पृथ्वीको कहीं स्थिररूपसे स्थापित करनेके लिये उसकी खोज कर रहे थे ।। ४९-५० ।। जले निमग्नां गां दृष्ट्वा चोद्धर्तुं मनसेच्छति । किं नु रूपमहं कृत्वा सलिलादुद्धरे महीम् ।। ५१ ।। पृथ्वीको जलमें डूबी हुई देख भगवान्ने मन-ही-मन उसे बाहर निकालनेकी इच्छा की। वे सोचने लगे, ‘कौन-सा रूप धारण करके मैं इस जलसे पृथ्वीका उद्धार करूँ’ ।। ५१ ।। एवं संचिन्त्य मनसा दृष्ट्वा दिव्येन चक्षुषा । जलक्रीडाभिरुचितं वाराहं रूपमस्मरत् ।। ५२ ।। ‘इस प्रकार मन-ही-मन चिन्तन करके उन्होंने दिव्य दृष्टिसे देखा कि जलमें क्रीड़ा करनेके योग्य तो वराहरूप है; अतः उन्होंने उसी रूपका स्मरण किया ।। कृत्वा वराहवपुषं वाङ्मयं वेदसम्मितम् । दशयोजनविस्तीर्णमायतं शतयोजनम् ।। ५३ ।। महापर्वतवर्ष्माणं तीक्ष्णदंष्ट्रं प्रदीप्तिमत् । महामेघौघनिर्घोषं नीलजीमूतसंनिभम् ।। ५४ ।। ‘वेदतुल्य वैदिक वाङ्मय वराहरूप धारण करके भगवान्ने जलके भीतर प्रवेश किया। उनका वह विशाल पर्वताकार शरीर सौ योजन लंबा और दस योजन चौड़ा था। उनकी दाढ़ें बड़ी तीखी थीं। उनका शरीर देदीप्यमान हो रहा था। भगवान्का कण्ठस्वर महान् मेघोंकी गर्जनाके समान गम्भीर था। उनकी अंगकान्ति नील जलधरके समान श्याम थी ।। ५३-५४ ।। भूत्वा यज्ञवराहो वै अपः सम्प्राविशत् प्रभुः ।
दंष्ट्रेणैकेन चोद्धृत्य स्वे स्थाने न्यविशन्महीम् ॥ ५५ ॥ 'इस प्रकार यज्ञवराहरूप धारण करके भगवान्ने जलके भीतर प्रवेश किया और एक ही दाँतसे पृथ्वीको उठाकर उसे अपने स्थानपर स्थापित कर दिया ॥ ५५ ॥ पुनरेव महाबाहुरपूर्वां तनुमाश्रितः । नरस्य कृत्वाधंतनुं सिंहस्यार्धतनुं प्रभुः ॥ ५६ ॥ दैत्येन्द्रस्य सभां गत्वा पाणिं संस्पृश्य पाणिना । दैत्यानामादिपुरुषः सुरारिर्दितिनन्दनः ॥ ५७ ॥ दृष्ट्वा चापूर्वपुरुषं क्रोधात् संरक्तलोचनः । 'तदनन्तर महाबाहु भगवान् श्रीहरिने एक अपूर्व शरीर धारण किया, जिसमें आधा अंग तो मनुष्यका था और आधा सिंहका। इस प्रकार नृसिंहरूप धारण करके हाथसे हाथका स्पर्श किये हुए दैत्यराज हिरण्यकशिपुकी सभामें गये। दैत्योंके आदिपुरुष और देवताओंके शत्रु दितिनन्दन हिरण्यकशिपुने उस अपूर्व पुरुषको देखकर क्रोधसे आँखें लाल कर लीं ॥ ५६-५७ १/२ ॥ शूलोद्यतकरः स्रग्वी हिरण्यकशिपुस्तदा ॥ ५८ ॥ मेघस्तनितनिर्घोषो नीलाभ्रचयसंनिभः । देवारिर्दितिजो वीरो नृसिंहं समुपाद्रवत् ॥ ५९ ॥ 'उसने एक हाथमें शूल उठा रखा था। उसके गलेमें पुष्पोंकी माला शोभा पा रही थी। उस समय वीर हिरण्यकशिपुने, जिसकी आवाज मेघकी गर्जनाके समान थी, जो नीले मेघोंके समूह-जैसा श्याम था तथा जो दितिके गर्भसे उत्पन्न होकर देवताओंका शत्रु बना हुआ था; भगवान् नृसिंहपर धावा किया ॥ ५८-५९ ॥ समुपेत्य ततस्तीक्ष्णैर्मृगेन्द्रेण बलीयसा । नारसिंहेन वपुषा दारितः करजैर्भृशम् ॥ ६० ॥ 'इसी समय अत्यन्त बलवान् मृगेन्द्रस्वरूप भगवान् नृसिंहने दैत्यके निकट जाकर उसे अपने तीखे नखोंद्वारा अत्यन्त विदीर्ण कर दिया ॥ ६० ॥ एवं निहत्य भगवान् दैत्येन्द्रं रिपुघातिनम् । भूयोऽन्यः पुण्डरीकाक्षः प्रभुर्लोकहिताय च ॥ ६१ ॥ 'इस प्रकार शत्रुघाती दैत्यराज हिरण्यकशिपुका वध करके भगवान् कमलनयन श्रीहरि पुनः सम्पूर्ण लोकोंके हितके लिये अन्य रूपमें प्रकट हुए ॥ ६१ ॥ कश्यपस्यात्मजः श्रीमानदित्या गर्भधारितः । पूर्णे वर्षसहस्रे तु प्रसूता गर्भमुत्तमम् ॥ ६२ ॥ 'उस समय वे कश्यपजीके तेजस्वी पुत्र हुए। अदितिदेवीने उन्हें गर्भमें धारण किया था। पूरे एक हजार वर्षतक गर्भमें धारण करनेके पश्चात् अदितिने एक उत्तम बालकको जन्म दिया ॥ ६२ ॥
दुर्दिनाम्भोदसदृशो दीप्ताक्षो वामनाकृतिः ।
दण्डी कमण्डलुधरः श्रीवत्सोरसि भूषितः ॥ ६३ ॥
‘वह वर्षाकालके मेघके समान श्यामवर्णका था। उसके नेत्र देदीप्यमान हो रहे थे। वे वामनाकार, दण्ड और कमण्डलु धारण किये तथा वक्षःस्थलमें श्रीवत्सचिह्नसे विभूषित थे॥ ६३ ॥
जटी यज्ञोपवीती च भगवान् बालरूपधृक् ।
यज्ञवाटं गतः श्रीमान् दानवेन्द्रस्य वै तदा ॥ ६४ ॥
‘उनके सिरपर जटा थी और गलेमें यज्ञोपवीत शोभा पाता था। उस समय वे बालरूपधारी श्रीमान् भगवान् दानवराज बलिकी यज्ञशालाके समीप गये ॥
बृहस्पतिसहायोऽसौ प्रविष्टो बलिनो मखे ।
तं दृष्ट्वा वामनतनुं प्रहृष्टो बलिरब्रवीत् ॥ ६५ ॥
‘बृहस्पतिजीकी सहायतासे उनका बलिके यज्ञ-मण्डपमें प्रवेश हुआ। वामनरूपधारी भगवान्को देखकर राजा बलि बहुत प्रसन्न हुए और बोले— ॥ ६५ ॥
प्रीतोऽस्मि दर्शने विप्र ब्रूहि त्वं किं ददानि ते ।
एवमुक्तस्तु बलिना वामनः प्रत्युवाच ह ॥ ६६ ॥
स्वस्तीत्युक्त्वा बलिं देवः स्मयमानोऽभ्यभाषत ।
मेदिनीं दानवपते देहि मे विक्रमत्रयम् ॥ ६७ ॥
‘ब्रह्मन्! आपका दर्शन पाकर मैं बहुत प्रसन्न हुआ हूँ। आज्ञा कीजिये, मैं आपकी सेवाके लिये क्या दूँ?’ बलिके ऐसा कहनेपर भगवान् वामनने ‘(आपका) स्वस्ति (कल्याण हो)’ ऐसा कहकर बलिको आशीर्वाद दिया और मुस्कराते हुए कहा—‘दानवराज! मुझे तीन पग पृथ्वी दे दीजिये’ ॥ ६६-६७ ॥
बलिर्ददौ प्रसन्नात्मा विप्रायमिततेजसे ।
ततो दिव्याद्भुततमं रूपं विक्रमतो हरेः ॥ ६८ ॥
‘बलिने प्रसन्नचित्त होकर उन अमिततेजस्वी ब्राह्मणदेवताको उनकी मुँहमाँगी वस्तु दे दी। तब भूमिको नापते समय श्रीहरिका अत्यन्त अद्भुत दिव्य रूप प्रकट हुआ ॥ ६८ ॥
विक्रमैस्त्रिभिरक्षोभ्यो जहाराशु स मेदिनीम् ।
ददौ शक्राय च महीं विष्णुर्देवः सनातनः ॥ ६९ ॥
‘उन अक्षोभ्य सनातन विष्णुदेवने तीन पगद्वारा शीघ्र ही सारी वसुधा नाप ली और देवराज इन्द्रको समर्पित कर दी ॥ ६९ ॥
एष ते वामनो नाम प्रादुर्भावः प्रकीर्तितः ।
तेन देवाः प्रादुरासन् वैष्णवं चोच्यते जगत् ॥ ७० ॥
‘यह मैंने तुम्हें भगवान्के वामनावतारकी बात बतायी है। उन्हींसे देवताओंकी उत्पत्ति हुई है। यह जगत् भी भगवान् विष्णुसे प्रकट होनेके कारण वैष्णव कहलाता है ॥ ७० ॥
असतां निग्रहार्थाय धर्मसंरक्षणाय च ।
अवतीर्णो मनुष्याणामजायत यदुक्षये ॥ ७१ ॥
स एवं भगवान् विष्णुः कृष्णेति परिकीर्त्यते ।
अनाद्यन्तमजं देवं प्रभुं लोकनमस्कृतम् ॥ ७२ ॥
‘राजन्! वे ही भगवान् विष्णु दुष्टोंका दमन और धर्मका संरक्षण करनेके लिये मनुष्योंके बीच यदुकुलमें अवतीर्ण हुए हैं। उन्हींको श्रीकृष्ण कहते हैं। वे अनादि, अनन्त, अजन्मा, दिव्यस्वरूप, सर्वसमर्थ और विश्ववन्दित हैं ॥ ७१-७२ ॥
यं देवं विदुषो गान्ति तस्य कर्माणि सैन्धव ।
यमाहुरजितं कृष्णं शङ्खचक्रगदाधरम् ॥ ७३ ॥
श्रीवत्सधारिणं देवं पीतकौशेयवाससम् ।
प्रधानः सोऽस्त्रविदुषां तेन कृष्णेन रक्ष्यते ॥ ७४ ॥
‘सिन्धुराज! विद्वान् पुरुष उन्हीं भगवान्की महिमा गाते और उन्हींके पावन चरित्रोंका वर्णन करते हैं। उन्हींको अपराजित, शंखचक्रगदाधारी पीतपट्टाम्बर-विभूषित श्रीवत्सधारी भगवान् श्रीकृष्ण कहा गया है। अस्त्रविद्याके विद्वानोंमें श्रेष्ठ अर्जुन उन्हीं भगवान् श्रीकृष्णके द्वारा सुरक्षित हैं ॥ ७३-७४ ॥
सहायः पुण्डरीकाक्षः श्रीमानतुलविक्रमः ।
समानस्यन्दने पार्थमास्थाय परवीरहा ॥ ७५ ॥
‘शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले अतुलपराक्रमी श्रीमान् कमलनयन श्रीकृष्ण एक ही रथपर अर्जुनके समीप बैठकर उनकी सहायता करते हैं ॥ ७५ ॥
न शक्यते तेन जेतुं त्रिदशैरपि दुःसहः ।
कः पुनर्मानुषो भावो रणे पार्थं विजेष्यति ॥ ७६ ॥
‘इस कारण अर्जुनको कोई नहीं जीत सकता। उनका वेग सहन करना देवताओंके लिये भी कठिन है; फिर कौन ऐसा मनुष्य है जो युद्धमें अर्जुनपर विजय पा सके? ॥
तमेकं वर्जयित्वा तु सर्वं यौधिष्ठिरं बलम् ।
चतुरः पाण्डवान् राजन् दिनैकं जेष्यसे रिपून् ॥ ७७ ॥
‘राजन्! केवल अर्जुनको छोड़कर एक दिन ही तुम युधिष्ठिरकी सारी सेनाको और अपने शत्रु चारों पाण्डवोंको भी जीत सकोगे’ ॥ ७७ ॥
वैशम्पायन उवाच
इत्येवमुक्त्वा नृपतिं सर्वपापहरो हरः ।
उमापतिः पशुपतिर्यज्ञहा त्रिपुरार्दनः ॥ ७८ ॥
वामनैर्विकटैः कुब्जैरूग्रश्रवणदर्शनैः ।
वृतः पारिषदैर्घोरैर्नानाप्रहरणोद्यतैः ॥ ७९ ॥
त्र्यम्बको राजशार्दूल भगनेत्रनिपातनः ।
उमासहायो भगवांस्तत्रैवान्तरधीयत ॥ ८० ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! उमापति भगवान् हर समस्त पापोंका अपहरण करनेवाले हैं। वे पशुरूपी जीवोंके पालक, दक्षयज्ञविध्वंसक तथा त्रिपुरविनाशक हैं। उनके तीन नेत्र हैं और उन्हींके द्वारा भगदेवताके नेत्र नष्ट किये गये हैं। भगवती उमा सदा उनके साथ रहती हैं। नृपश्रेष्ठ! भगवान् शिव सिन्धुराज जयद्रथसे पूर्वोक्त वचन कहकर भयंकर कानों और नेत्रोंवाले भाँति-भाँतिके अस्त्र उठाये रहनेवाले अपने भयंकर पार्षदोंके साथ, जिनमें बौने, कुबड़े और विकट आकृतिवाले प्राणी भी थे, भगवती पार्वतीसहित वहीं अन्तर्धान हो गये ॥ ७८—८० ॥
जयद्रथोऽपि मन्दात्मा स्वमेव भवनं ययौ ।
पाण्डवाश्च वने तस्मिन् न्यवसन् काम्यके तथा ॥ ८१ ॥
तत्पश्चात् मन्दबुद्धि जयद्रथ भी अपने घर चला गया और पाण्डवगण उस काम्यकवनमें उसी प्रकार निवास करने लगे ॥ ८१ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि जयद्रथविमोक्षणपर्वणि
द्विसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २७२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत जयद्रथविमोक्षणपर्वमें दो सौ बहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २७२ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १/३ श्लोक मिलाकर कुल ८१ १/३ श्लोक हैं)
(रामोपाख्यानपर्व)
(रामोपाख्यानपर्व)
त्रिसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः
अपनी दुरवस्थासे दुःखी हुए युधिष्ठिरका मार्कण्डेय मुनिसे प्रश्न करना
जनमेजय उवाच
एवं हृतायां कृष्णायां प्राप्य क्लेशमनुत्तमम् ।
अत ऊर्ध्वं नरव्याघ्राः किमकुर्वत पाण्डवाः ॥ १ ॥
जनमेजयने पूछा— इस प्रकार द्रौपदीका अपहरण होनेपर महान् क्लेश उठानेके पश्चात् मनुष्योंमें सिंहके समान पराक्रमी पाण्डवोंने कौन-सा कार्य किया? ॥ १ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवं कृष्णां मोक्षयित्वा विनिर्जित्य जयद्रथम् ।
आसांचक्रे मुनिगणैर्धर्मराजो युधिष्ठिरः ॥ २ ॥
वैशम्पायनजी बोले— जनमेजय! इस प्रकार जयद्रथको जीतकर द्रौपदीको छुड़ा लेनेके पश्चात् धर्मराज युधिष्ठिर मुनिमण्डलीके साथ बैठे हुए थे ॥ २ ॥
तेषां मध्ये महर्षीणां शृण्वतामनुशोचताम् ।
मार्कण्डेयमिदं वाक्यमब्रवीत् पाण्डुनन्दनः ॥ ३ ॥
महर्षिलोग भी पाण्डवोंपर आये हुए संकटको सुनते और उसके लिये बारंबार शोक प्रकट करते थे। उन्हींमेंसे मार्कण्डेयजीको लक्ष्य करके पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरने इस प्रकार कहा ॥ ३ ॥
युधिष्ठिर उवाच
भगवन् देवर्षीणां त्वं ख्यातो भूतभविष्यवित् ।
संशयं परिपृच्छामि छिन्धि मे हृदि संस्थितम् ॥ ४ ॥
युधिष्ठिर बोले— भगवन्! आप भूत, भविष्य और वर्तमान—तीनों कालोंके ज्ञाता हैं। देवर्षियोंमें भी आपका नाम विख्यात है। अतः आपसे मैं अपने हृदयका एक संदेह पूछता हूँ, उसका निवारण कीजिये ॥ ४ ॥
द्रुपदस्य सुता ह्येषा वेदिमध्यात् समुत्थिता ।
अयोनिजा महाभागा स्नुषा पाण्डोर्महात्मनः ॥ ५ ॥
यह परम सौभाग्यशालिनी द्रुपदकुमारी यज्ञकी वेदीसे प्रकट हुई है; अतः अयोनिजा है (इसे गर्भवासका कष्ट नहीं सहन करना पड़ा है)। इसे महात्मा पाण्डुकी पुत्रवधू होनेका गौरव भी मिला है॥ ५॥
मन्ये कालश्च भगवान् दैवं च विधिनिर्मितम्।
भवितव्यं च भूतानां यस्य नास्ति व्यतिक्रमः ॥ ६॥
मेरी समझमें भगवान् काल, विधिनिर्मित दैव और समस्त प्राणियोंकी भवितव्यता अर्थात् उनके लिये होनेवाली घटना—ये तीनों ही प्रबल हैं; इनको कोई टाल नहीं सकता॥ ६॥
इमां हि पत्नीमस्माकं धर्मज्ञां धर्मचारिणीम्।
संस्पृशेदीदृशो भावः शुचिं स्तैन्यमिवानृतम् ॥ ७॥
अन्यथा हमारी इस पत्नीको, जो धर्मको जाननेवाली तथा धर्मके पालनमें तत्पर रहनेवाली है, ऐसा भाव (अपहृत होनेका लांछन) कैसे स्पर्श कर सकता था? यह तो ठीक वैसा ही है, जैसे किसी शुद्ध आचार-विचारवाले मनुष्यपर झूठे ही चोरीका कलंक लग जाय॥ ७॥
न हि पापं कृतं किंचित् कर्म वा निन्दितं क्वचित्।
द्रौपद्या ब्राह्मणेष्वेव धर्मः सुचरितो महान् ॥ ८॥
इसने कभी कोई पाप या निन्दित कर्म नहीं किया है। द्रौपदीने ब्राह्मणोंके प्रति सेवा-सत्कार आदिके रूपमें महान् धर्मका आचरण किया है॥ ८॥
तां जहार बलाद् राजा मूढबुद्धिर्जयद्रथः।
तस्याः संहरणात् पापः शिरसः केशपातनम् ॥ ९॥
पराजयं च संग्रामे ससहायः समाप्तवान्।
प्रत्याहृता तथा स्माभिर्हत्वा तत् सैन्धवं बलम् ॥ १०॥
ऐसी स्त्रीका भी मूढ़बुद्धि पापी राजा जयद्रथने बलपूर्वक अपहरण किया। इस अपहरणके ही कारण उसका सिर मूँड़ा गया, वह अपने सहायकों-सहित युद्धमें पराजित हुआ तथा हमलोग सिन्धु-देशकी सेनाका संहार करके पुनः द्रौपदीको लौटा लाये हैं॥ ९-१०॥
तद् दारहरणं प्राप्तमस्माभिरवितर्कितम्।
ज्ञातिभिर्विप्रवासश्च मिथ्याव्यवसितैरियम् ॥ ११॥
इस प्रकार हमने जिसे कभी सोचातक न था, वह अपनी पत्नीका अपहरणरूप अपमान हमें प्राप्त हुआ और मिथ्या व्यवसायमें लगे हुए बान्धवोंने हमें देशसे निर्वासित कर दिया है॥ ११॥
अस्ति नूनं मया कश्चिदल्पभाग्यतरो नरः।
भवता दृष्टपूर्वो वा श्रुतपूर्वोऽपि वा भवेत् ॥ १२॥
अतः मैं पूछता हूँ, क्या संसारमें मेरे-जैसा मन्दभाग्य मनुष्य कोई और भी है अथवा आपने पहले कभी मुझ-जैसे भाग्यहीनको कहीं देखा या सुना है? ।। १२ ।।
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि रामोपाख्यानपर्वणि युधिष्ठिरप्रश्ने त्रिसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ।। २७३ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत रामोपाख्यानपर्वमें युधिष्ठिरप्रश्नविषयक दो सौ तिहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। २७३ ।।
२७४-
चतुःसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः
श्रीराम आदिका जन्म तथा कुबेरकी उत्पत्ति और उन्हें ऐश्वर्यकी प्राप्ति
मार्कण्डेय उवाच
प्राप्तमप्रतिमं दुःखं रामेण भरतर्षभ ।
रक्षसा जानकी तस्य हृता भार्या बलीयसा ॥ १ ॥
आश्रमाद् राक्षसेन्द्रेण रावणेन दुरात्मना ।
मायामास्थाय तरसा हत्वा गृध्रं जटायुषम् ॥ २ ॥
मार्कण्डेयजीने कहा— भरतश्रेष्ठ! श्रीरामचन्द्रजीको भी वनवास तथा स्त्रीवियोगका अनुपम दुःख सहन करना पड़ा था। दुरात्मा राक्षसराज महाबली रावण अपना मायाजाल बिछाकर आश्रमसे उनकी पत्नी सीताको वेगपूर्वक हर ले गया था और अपने कार्यमें बाधा डालनेवाले गृध्रराज जटायुको उसने वहीं मार गिराया था ॥ १-२ ॥
प्रत्याजहार तां रामः सुग्रीवबलमाश्रितः ।
बद्ध्वा सेतुं समुद्रस्य दग्ध्वा लङ्कां शितैः शरैः ॥ ३ ॥
फिर श्रीरामचन्द्रजी भी सुग्रीवकी सेनाका सहारा ले समुद्रपर पुल बाँधकर लंकामें गये और अपने तीखे (आग्नेय आदि) बाणोंसे उसको भस्म करके वहाँसे सीताको वापस लाये ॥ ३ ॥
युधिष्ठिर उवाच
कस्मिन् रामः कुले जातः किंवीर्यः किम्पराक्रमः ।
रावणः कस्य पुत्रो वा किं वैरं तस्य तेन ह ॥ ४ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— भगवन्! श्रीरामचन्द्रजी किस कुलमें प्रकट हुए थे? उनका बल और पराक्रम कैसा था? रावण किसका पुत्र था और उसका रामचन्द्रजीसे क्या वैर था? ॥ ४ ॥
एतन्मे भगवन् सर्वं सम्यगाख्यातुमर्हसि ।
श्रोतुमिच्छामि चरितं रामस्याक्लिष्टकर्मणः ॥ ५ ॥
भगवन्! ये सभी बातें मुझे अच्छी प्रकार बताइये। मैं अनायास ही महान् कर्म करनेवाले भगवान् श्रीरामका चरित्र सुनना चाहता हूँ ॥ ५ ॥
मार्कण्डेय उवाच
अजो नामाभवद् राजा महानिक्ष्वाकुवंशजः ।
तस्य पुत्रो दशरथः शश्वत्स्वाध्यायवाञ्छुचिः ॥ ६ ॥