भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 1819, कुल 2580 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1819

और इन्द्रियातीत होनेपर भी शयन करनेकी इच्छासे उन शेषनागको अपना पर्यंक बनाते हैं जो सहस्रों फणोंसे विकटाकार दिखायी देते हैं। वे शेषनाग एक सहस्र प्रचण्ड सूर्योंके समूहकी भाँति अनन्त एवं असीम प्रभा धारण करते हैं। उनकी कान्ति कुन्द-पुष्प, चन्द्रमा, मुक्ताहार, गोदुग्ध, कमलनाल तथा कुमुद-कुसुमके समान उज्ज्वल है। उन्हींकी शय्या बनाकर भगवान् श्रीहरि शयन करते हैं ।। सत्त्वोद्रेकात् प्रबुद्धस्तु शून्यं लोकमपश्यत । इमं चोदाहरन्त्यत्र श्लोकं नारायणं प्रति ।। ४१ ।। 'तत्पश्चात् सृष्टिकालमें सत्त्वगुणके आधिक्यसे भगवान् योगनिद्रासे जाग उठे। जागनेपर उन्हें यह समस्त लोक सूना दिखायी दिया। महर्षिगण भगवान् नारायणके सम्बन्धमें यहाँ इस श्लोकका उदाहरण दिया करते हैं— ।। ४१ ।। आपो नारास्ततनव इत्यपां नाम शुश्रुम । अयनं तेन चैवास्ते तेन नारायणः स्मृतः ।। ४२ ।। 'जल भगवान्‌का शरीर है, इसीलिये उनका नाम 'नार' सुनते आये हैं। वह नार ही उनका अयन (गृह) है अथवा उसके साथ एक होकर वे रहते हैं, इसीलिये उन भगवान्‌को नारायण कहा गया है' ।। ४२ ।। प्रध्यानसमकालं तु प्रजाहेतोः सनातनः । ध्यातमात्रे तु भगवन्नाभ्यां पद्मः समुत्थितः ।। ४३ ।। 'तत्पश्चात् प्रजाकी सृष्टिके लिये भगवान्‌ने चिन्तन किया। इस चिन्तनके साथ ही भगवान्‌की नाभिसे सनातन कमल प्रकट हुआ ।। ४३ ।। ततश्चतुर्मुखो ब्रह्मा नाभिपद्माद् विनिःसृतः । तत्रोपविष्टः सहसा पद्मे लोकपितामहः ।। ४४ ।। शून्यं दृष्ट्वा जगत् कृत्स्नं मानसानात्मनः समान् । ततो मरीचिप्रमुखान् महर्षीनसृजन्नव ।। ४५ ।। 'उस नाभिकमलसे चतुर्मुख ब्रह्माजीका प्रादुर्भाव हुआ। उस कमलपर बैठे हुए लोकपितामह ब्रह्माजीने सहसा सम्पूर्ण जगत्‌को शून्य देखकर अपने मानसपुत्रके रूपमें अपने ही-जैसे प्रभावशाली मरीचि आदि नौ महर्षियोंको उत्पन्न किया ।। ४४-४५ ।। तेऽसृजन् सर्वभूतानि त्रसानि स्थावराणि च । यक्षराक्षसभूतानि पिशाचोरगमानुषान् ।। ४६ ।। 'उन महर्षियोंने स्थावर-जंगमरूप सम्पूर्ण भूतोंकी तथा यक्ष, राक्षस, भूत, पिशाच, नाग और मनुष्योंकी सृष्टि की ।। ४६ ।। सृज्यते ब्रह्ममूर्तिस्तु रक्षते पौरुषी तनुः । रौद्रीभावेन शमयेत् तिस्रोऽवस्थाः प्रजापतेः ।। ४७ ।।