महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1820, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ें‘ब्रह्माजीके रूपसे भगवान् सृष्टि करते हैं। परमपुरुष नारायणरूपसे इसकी रक्षा करते हैं तथा रुद्रस्वरूपसे सबका संहार करते हैं। इस प्रकार प्रजापालक भगवान्की ये तीन अवस्थाएँ हैं ।। ४७ ।। न श्रुतं ते सिन्धुपते विष्णोरद्भुतकर्मणः । कथ्यमानानि मुनिभिर्ब्राह्मणैर्वेदपारगैः ।। ४८ ।। ‘सिन्धुराज! क्या तुमने वेदोंके पारंगत ब्रह्मर्षियोंके मुखसे अद्भुतकर्मा भगवान् विष्णुका चरित्र नहीं सुना है? ।। ४८ ।। जलेन समनुप्राप्ते सर्वतः पृथिवीतले । तदा चैकार्णवे तस्मिन्नेकाकाशे प्रभुश्चरन् ।। ४९ ।। निशायामिव खद्योतः प्रावृट्काले समन्ततः । प्रतिष्ठानाय पृथिवीं मार्गमाणस्तदाभवत् ।। ५० ।। ‘समस्त भूमण्डल सब ओरसे जलमें डूबा हुआ था। उस समय एकार्णवसे उपलक्षित एकमात्र आकाशमें पृथ्वीका पता लगानेके लिये भगवान् इस प्रकार विचर रहे थे, जैसे वर्षाकालकी रातमें जुगनू सब ओर उड़ता फिरता है। वे पृथ्वीको कहीं स्थिररूपसे स्थापित करनेके लिये उसकी खोज कर रहे थे ।। ४९-५० ।। जले निमग्नां गां दृष्ट्वा चोद्धर्तुं मनसेच्छति । किं नु रूपमहं कृत्वा सलिलादुद्धरे महीम् ।। ५१ ।। पृथ्वीको जलमें डूबी हुई देख भगवान्ने मन-ही-मन उसे बाहर निकालनेकी इच्छा की। वे सोचने लगे, ‘कौन-सा रूप धारण करके मैं इस जलसे पृथ्वीका उद्धार करूँ’ ।। ५१ ।। एवं संचिन्त्य मनसा दृष्ट्वा दिव्येन चक्षुषा । जलक्रीडाभिरुचितं वाराहं रूपमस्मरत् ।। ५२ ।। ‘इस प्रकार मन-ही-मन चिन्तन करके उन्होंने दिव्य दृष्टिसे देखा कि जलमें क्रीड़ा करनेके योग्य तो वराहरूप है; अतः उन्होंने उसी रूपका स्मरण किया ।। कृत्वा वराहवपुषं वाङ्मयं वेदसम्मितम् । दशयोजनविस्तीर्णमायतं शतयोजनम् ।। ५३ ।। महापर्वतवर्ष्माणं तीक्ष्णदंष्ट्रं प्रदीप्तिमत् । महामेघौघनिर्घोषं नीलजीमूतसंनिभम् ।। ५४ ।। ‘वेदतुल्य वैदिक वाङ्मय वराहरूप धारण करके भगवान्ने जलके भीतर प्रवेश किया। उनका वह विशाल पर्वताकार शरीर सौ योजन लंबा और दस योजन चौड़ा था। उनकी दाढ़ें बड़ी तीखी थीं। उनका शरीर देदीप्यमान हो रहा था। भगवान्का कण्ठस्वर महान् मेघोंकी गर्जनाके समान गम्भीर था। उनकी अंगकान्ति नील जलधरके समान श्याम थी ।। ५३-५४ ।। भूत्वा यज्ञवराहो वै अपः सम्प्राविशत् प्रभुः ।