भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 1818

सपर्वतार्णवद्वीपं सशैलवनकाननम् ॥ ३२ ॥ 'प्रलयकाल उपस्थित होनेपर वे भगवान् विष्णु ही कालाग्निरूपसे प्रकट हो पर्वत, समुद्र, द्वीप, शैल, वन और काननोंसहित सम्पूर्ण जगत्को दग्ध कर देते हैं ॥ ३२ ॥

निर्दहन् नागलोकांश्च पातालतलचारिणः । अथान्तरिक्षे सुमहन्नानावर्णाः पयोधराः ॥ ३३ ॥ 'फिर पातालतलमें विचरण करनेवाले नागलोकोंको भी वे भस्म कर डालते हैं। कालाग्निद्वारा सब कुछ भस्म हो जानेपर आकाशमें अनेक रंगके महान् मेघोंकी घोर घटा घिर आती है ॥ ३३ ॥

घोरस्वरा विनदिनस्तडिन्मालावसम्बिनः । समुत्तिष्ठन् दिशः सर्वा विवर्षन्तः समन्ततः ॥ ३४ ॥ 'भयंकर स्वरसे गर्जना करते हुए वे बादल बिजलियोंकी मालाओंसे प्रकाशित हो सम्पूर्ण दिशाओंमें फैल जाते और सब ओर वर्षा करने लग जाते हैं ॥ ३४ ॥

ततोऽग्निं नाशयामासुः संवर्ताग्निनियामकाः । अक्षमात्रैश्च धाराभिस्तिष्ठन्त्यापूर्य सर्वशः ॥ ३५ ॥ 'इससे प्रलयकालीन अग्नि बुझ जाती है। संवर्तक अग्निका नियन्त्रण करनेवाले वे महामेघ लंबे सर्पोंके समान मोटी धाराओंसे जल गिराते हुए सबको डुबो देते हैं ॥ ३५ ॥

एकार्णवे तदा तस्मिन्नुपशान्तचराचरे । नष्टचन्द्रार्कपवने ग्रहनक्षत्रवर्जिते ॥ ३६ ॥ 'उस समय सम्पूर्ण दिशाओंमें पानी भर जानेसे चारों ओर एकाकार जलमय समुद्र ही दृष्टिगोचर होता है। उस एकार्णवके जलमें समस्त चराचर जगत् नष्ट हो जाता है। चन्द्रमा, सूर्य और वायु भी विलीन हो जाते हैं। ग्रह और नक्षत्रोंका अभाव हो जाता है ॥ ३६ ॥

चतुर्युगसहस्रान्ते सलिलेनाप्लुता मही । ततो नारायणाख्यस्तु सहस्राक्षः सहस्रपात् ॥ ३७ ॥ सहस्रशीर्षा पुरुषः स्वप्तुकामस्त्वतीन्द्रियः । फटासहस्रविकटं शेषं पर्यङ्कभाजनम् ॥ ३८ ॥ सहस्रमिव तिग्मांशुसंघातममितद्युतिम् । कुन्देन्दुहारगोक्षीरमृणालकुमुदप्रभम् ॥ ३९ ॥ तत्रासौ भगवान् देवः स्वपञ्जलनिधौ तदा । नैशेन तमसा व्याप्तां स्वां रात्रिं कुरुते विभुः ॥ ४० ॥ 'एक हजार चतुर्युगी समाप्त होनेपर उपर्युक्त एकार्णवके जलमें यह पृथ्वी डूब जाती है। तत्पश्चात् नारायण नामसे प्रसिद्ध भगवान् श्रीहरि उस एकार्णवके जलमें शयन करनेके हेतु अपने लिये निशाकालोचित अन्धकार (तमोगुण)-से व्याप्त महारात्रिका निर्माण करते हैं। उन भगवान्के सहस्रों नेत्र, सहस्रों चरण और सहस्रों मस्तक हैं। वे अन्तर्यामी पुरुष हैं