महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1816, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ें(कर्म धर्मविरुद्धं वै लोकदुष्टं च कर्म ते ।) 'सिंधुराज! अब तू दास नहीं रहा, जा, तुझे छोड़ दिया गया है। फिर कभी ऐसा काम न करना। अरे! तू परायी स्त्रीकी इच्छा करता है, तुझे धिक्कार है! तू स्वयं तो नीच है ही तेरे सहायक भी अधम हैं। तेरे सिवा दूसरा कौन ऐसा नराधम है जो ऐसा धर्मविरुद्ध कार्य कर सके? तेरा यह कर्म सम्पूर्ण लोकमें निन्दित है' ।। २१ १/२ ।। गतसत्त्वमिव ज्ञात्वा कर्तारमशुभस्य तम् ।। २२ ।। सम्प्रेक्ष्य भरतश्रेष्ठः कृपां चक्रे नराधिपः । धर्मे ते वर्धतां बुद्धिर्मा चाधर्मे मनः कृथाः ।। २३ ।। साश्वः सरथपादातः स्वस्ति गच्छ जयद्रथ । वह अशुभ कर्म करनेवाला जयद्रथ मृतप्राय-सा हो गया है, यह देख और समझकर भरतश्रेष्ठ राजा युधिष्ठिरने उसपर कृपा की और कहा—'तेरी बुद्धि धर्ममें उत्तरोत्तर बढ़ती रहे, तू कभी अधर्ममें मन न लगाना। जयद्रथ! अपने रथ, घोड़े और पैदल सबको साथ लिये कुशलपूर्वक चला जा' ।। २२-२३ १/२ ।। एवमुक्तस्तु सव्रीडं तूष्णीं किंचिदवाङ्मुखः ।। २४ ।। जगाम राजन् दुःखार्तो गङ्गाद्वाराय भारत । स देवं शरणं गत्वा विरूपाक्षमुमापतिम् ।। २५ ।। तपश्चचार विपुलं तस्य प्रीतो वृषध्वजः । बलिं स्वयं प्रत्यगृह्णात् प्रीयमाणस्त्रिलोचनः ।। २६ ।। राजन्! युधिष्ठिरके ऐसा कहनेपर जयद्रथ बहुत लज्जित हुआ और नीचा मुँह किये वहाँसे चुपचाप चला गया। जनमेजय! वह पराजित होनेके महान् दुःखसे पीड़ित था; अतः वहाँसे घर न जाकर गंगाद्वार (हरिद्वार)-को चल दिया। वहाँ पहुँचकर उसने तीन नेत्रोंवाले भगवान् उमापतिकी शरण ले बड़ी भारी तपस्या की। इससे भगवान् शंकर प्रसन्न हो गये। त्रिनेत्रधारी महादेवने प्रसन्नतापूर्वक स्वयं दर्शन देकर उसकी पूजा ग्रहण की ।। २४—२६ ।। वरं चास्मै ददौ देवः स जग्राह च तच्छृणु । समस्तान् सरथान् पञ्च जयेयं युधि पाण्डवान् ।। २७ ।। इति राजाब्रवीद् देवं नेति देवस्तमब्रवीत् । अजयांश्चाप्यवध्यांश्च वारयिष्यसि तान् युधि ।। २८ ।। ऋतेऽर्जुनं महाबाहुं नरं नाम सुरेश्वरम् । बदर्यां तप्ततपसं नारायणसहायकम् ।। २९ ।। जनमेजय! भगवान्ने उसे वर दिया और जयद्रथने उसको ग्रहण किया। वह वर क्या था? यह बताता हूँ, सुनो—'मैं रथसहित पाँचों पाण्डवोंको युद्धमें जीत लूँ', यही वर सिन्धुराजने महादेवजीसे माँगा। परंतु महादेवजीने उससे कहा—'ऐसा नहीं हो सकता। पाण्डव अजेय और अवध्य हैं। तुम केवल एक दिन युद्धमें महाबाहु अर्जुनको छोड़कर