महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1815, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्रौपदी चाब्रवीद् भीममभिप्रेक्ष्य युधिष्ठिरम् । दासोऽयं मुच्यतां राजंस्त्वया पञ्चसटः कृतः ॥ १८ ॥ उस समय द्रौपदीने भी युधिष्ठिरकी ओर देखकर भीमसेनसे कहा—'आपने इसका सिर मूँड़कर पाँच चोटियाँ रख दी हैं तथा यह महाराजका दास हो गया है; अतः अब इसे छोड़ दीजिये' ॥ १८ ॥
स मुक्तोऽभ्येत्य राजानमभिवाद्य युधिष्ठिरम् । ववन्दे विह्वलो राजंस्तांश्च दृष्ट्वा मुनींस्तदा ॥ १९ ॥ राजन्! तब जयद्रथ बन्धनसे मुक्त कर दिया गया। उसने विह्वल होकर राजा युधिष्ठिरके पास जा उन्हें प्रणाम करनेके पश्चात् वहाँ बैठे हुए अन्यान्य मुनियोंको भी देखकर उनके चरणोंमें मस्तक झुकाया ॥ १९ ॥
तमुवाच घृणी राजा धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः । तथा जयद्रथं दृष्ट्वा गृहीतं सव्यसाचिना ॥ २० ॥ उस समय (आदर देते हुए) अर्जुनने जयद्रथका हाथ थाम लिया। तब दयालु राजा धर्मपुत्र युधिष्ठिरने जयद्रथकी ओर देखकर कहा— ॥ २० ॥
अदासो गच्छ मुक्तोऽसि मैवं कार्षीः पुनः क्वचित् । स्त्रीकामं वा धिगस्तु त्वां क्षुद्रः क्षुद्रसहायवान् ॥ २१ ॥ एवंविधं हि कः कुर्यात् त्वदन्यः पुरुषाधमः ।