महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 182, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंतस्मिन्नुपरते शब्दे पुनरेवान्यतोऽभवत् । शब्दोऽपरो महाराज तत्रापि प्राहरं शरैः ॥ ७ ॥ महाराज! वह कोलाहल शान्त होनेपर फिर दूसरी ओर उनका शब्द सुनायी दिया। तब मैंने उधर भी बाणोंका प्रहार किया ॥ ७ ॥
एवं दश दिशः सर्वास्तिर्यगूर्ध्वं च भारत । नादयामासुरासुरास्ते चापि निहता मया ॥ ८ ॥ भारत! इस तरह वे असुर इधर-उधर ऊपर-नीचे दसों दिशाओंमें कोलाहल करते और मेरे हाथसे मारे जाते थे ॥ ८ ॥
ततः प्राग्ज्योतिषं गत्वा पुनरेव व्यदृश्यत । सौभं कामगमं वीर मोहयन्मम चक्षुषी ॥ ९ ॥ तदनन्तर इच्छानुसार चलनेवाला सौभविमान प्राग्ज्योतिषपुरके निकट जाकर मेरे नेत्रोंको भ्रममें डालता हुआ फिर दिखायी दिया ॥ ९ ॥
ततो लोकान्तकरणो दानवो दारुणाकृतिः । शिलावर्षेण महता सहसा मां समावृणोत् ॥ १० ॥ तत्पश्चात् लोकान्तकारी भयंकर आकृतिवाले दानवने आकर सहसा पत्थरोंकी भारी वर्षाके द्वारा मुझे आवृत कर दिया ॥ १० ॥
सोऽहं पर्वतवर्षेण वध्यमानः पुनः पुनः । वल्मीक इव राजेन्द्र पर्वतोपचितोऽभवम् ॥ ११ ॥ राजेन्द्र! शिलाखण्डोंकी उस निरन्तर वृष्टिसे बार-बार आहत होकर मैं पर्वतोंसे आच्छादित बाँबी-सा प्रतीत होने लगा ॥ ११ ॥
ततोऽहं पर्वतचितः सहयः सहसारथिः । अप्रख्यातिमिया राजन् सर्वतः पर्वतैश्चितः ॥ १२ ॥ राजन्! मेरे चारों ओर शिलाखण्ड जमा हो गये थे। मैं घोड़ों और सारथिसहित प्रस्तरखण्डोंसे चुना-सा गया था, जिससे दिखायी नहीं देता था ॥ १२ ॥
ततो वृष्णिप्रवीरा ये ममासन् सैनिकास्तदा । ते भयार्ता दिशः सर्वे सहसा विप्रदुद्रुवुः ॥ १३ ॥ यह देख वृष्णिकुलके श्रेष्ठ वीर जो मेरे सैनिक थे, भयसे आर्त हो सहसा चारों दिशाओंमें भाग चले ॥ १३ ॥
ततो हाहाकृतमभूत् सर्वं किल विशाम्पते । द्यौश्च भूमिश्च खं चैवादृश्यमाने तथा मयि ॥ १४ ॥ प्रजानाथ! मेरे अदृश्य हो जानेपर भूलोक, अन्तरिक्ष तथा स्वर्गलोक—सभी स्थानोंमें हाहाकार मच गया ॥ १४ ॥
ततो विषण्णमनसो मम राजन् सुहृज्जनाः ।