भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 183

रुरुदुश्चक्रुशुश्चैव दुःखशोकसमन्विताः ॥ १५ ॥
राजन्! उस समय मेरे सभी सुहृद् खिन्नचित्त हो दुःख-शोकमें डूबकर रोने-चिल्लाने लगे ॥ १५ ॥
द्विषतां च प्रहर्षोऽभूदार्तिश्चाद्विषतामपि ।
एवं विजितवान् वीर पश्चादश्रौषमच्युत ॥ १६ ॥
शत्रुओंमें उल्लास छा गया और मित्रोंमें शोक। अपनी मर्यादासे च्युत न होनेवाले वीर युधिष्ठिर! इस प्रकार राजा शाल्व एक बार मुझपर विजयी हो चुका था। यह बात मैंने सचेत होनेपर पीछे सारथिके मुँहसे सुनी थी ॥ १६ ॥
ततोऽहमिन्द्रदयितं सर्वपाषाणभेदनम् ।
वज्रमुद्यम्य तान् सर्वान् पर्वतान् समशातयम् ॥ १७ ॥
तब मैंने सब प्रकारके प्रस्तरोंको विदीर्ण करनेवाले इन्द्रके प्रिय आयुध वज्रका प्रहार करके उन समस्त शिलाखण्डोंको चूर-चूर कर दिया ॥ १७ ॥
ततः पर्वतभारार्त्ता मन्दप्राणविचेष्टिताः ।
हया मम महाराज वेपमाना इवाभवन् ॥ १८ ॥
महाराज! उस समय पर्वतखण्डोंके भारसे पीड़ित हुए मेरे घोड़े कम्पित-से हो रहे थे। उनकी बलसाध्य चेष्टाएँ बहुत कम हो गयी थीं ॥ १८ ॥
मेघजालमिवाकाशे विदार्याभ्युदितं रविम् ।
दृष्ट्वा मां बान्धवाः सर्वे हर्षमाहारयन् पुनः ॥ १९ ॥
जैसे आकाशमें बादलोंके समुदायको छिन्न-भिन्न करके सूर्य उदित होता है, उसी प्रकार शिलाखण्डोंको हटाकर मुझे प्रकट हुआ देख मेरे सभी बन्धु-बान्धव पुनः हर्षसे खिल उठे ॥ १९ ॥
ततः पर्वतभारार्त्तान् मन्दप्राणविचेष्टितान् ।
हयान् संदृश्य मां सूतः प्राह तात्कालिकं वचः ॥ २० ॥
तब प्रस्तरखण्डोंके भारसे पीड़ित तथा धीरे-धीरे प्राणसाध्य चेष्टा करनेवाले घोड़ोंको देखकर सारथिने मुझसे यह समयोचित बात कही— ॥ २० ॥
साधु सम्पश्य वार्ष्णेय शाल्वं सौभपतिं स्थितम् ।
अलं कृष्णावमन्यैनं साधु यत्नं समाचर ॥ २१ ॥
‘वार्ष्णेय! वह देखिये, सौभराज शाल्व वहाँ खड़ा है। श्रीकृष्ण! इसकी उपेक्षा करनेसे कोई लाभ नहीं। इसके वधका कोई उचित उपाय कीजिये ॥ २१ ॥
मार्दवं सखितां चैव शाल्वादद्य व्यपाहर ।
जहि शाल्वं महाबाहो मैनं जीवय केशव ॥ २२ ॥
‘महाबाहु केशव! अब शाल्वकी ओरसे कोमलता और मित्रभाव हटा लीजिये। इसे मार डालिये, जीवित न रहने दीजिये ॥ २२ ॥