महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 184, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्वैः पराक्रमैर्वीर वध्यः शत्रुरमित्रहन् । न शत्रुरवमन्तव्यो दुर्बलोऽपि बलीयसा ॥ २३ ॥ ‘शत्रुहन्ता वीरवर! आपको सारा पराक्रम लगाकर इस शत्रु का वध कर डालना चाहिये। कोई कितना ही बलवान् क्यों न हो, उसे अपने दुर्बल शत्रु की भी अवहेलना नहीं करनी चाहिये॥ २३ ॥
योऽपि स्यात् पीठगः कश्चित् किं पुनः समरे स्थितः । स त्वं पुरुषशार्दूल सर्वयत्नैरिमं प्रभो ॥ २४ ॥ जहि वृष्णिकुलश्रेष्ठ मा त्वां कालोऽत्यगात् पुनः । नैष मार्दवसाध्यो वै मतो नापि सखा तव ॥ २५ ॥ येन त्वं योधितो वीर द्वारका चावमर्दिता । एवमादि तु कौन्तेय श्रुत्वाहं सारथेर्वचः ॥ २६ ॥ तत्त्वमेतदिति ज्ञात्वा युद्धे मतिमधारयम् । वधाय शाल्वराजस्य सौभस्य च निपातने ॥ २७ ॥ ‘कोई शत्रु अपने घरमें आसनपर बैठा हो (युद्ध न करना चाहता हो), तो भी उसे नष्ट करनेमें नहीं चूकना चाहिये; फिर जो संग्राममें युद्ध करनेके लिये खड़ा हो, उसकी तो बात ही क्या है? अतः पुरुषसिंह! प्रभो! आप सभी उपायोंसे इस शत्रुको मार डालिये। वृष्णिवंशावतंस! इस कार्यमें आपको पुनः विलम्ब नहीं करना चाहिये। यह मृदुतापूर्ण उपायसे वशमें आनेवाला नहीं। वास्तवमें यह आपका मित्र भी नहीं है; क्योंकि वीर! इसने आपके साथ युद्ध किया और द्वारकापुरीको तहस-नहस कर दिया, अतः इसको शीघ्र मार डालना चाहिये।’ कुन्तीनन्दन! सारथिके मुखसे इस तरहकी बातें सुनकर मैंने सोचा, यह ठीक ही तो कहता है। यह विचारकर मैंने शाल्वराजका वध करने और सौभविमानको मार गिरानेके लिये युद्धमें मन लगा दिया॥ २४—२७ ॥
दारुकं चाब्रुवं वीर मुहूर्तं स्थीयतामिति । ततोऽप्रतिहतं दिव्यमभेद्यमतिवीर्यवत् ॥ २८ ॥ आग्नेयमस्त्रं दयितं सर्वसाहं महाप्रभम् । योजयं तत्र धनुषा दानवान्तकरं रणे ॥ २९ ॥ वीर! तत्पश्चात् मैंने दारुकसे कहा—‘सारथे! दो घड़ी और ठहरो (फिर तुम्हारी इच्छा पूरी हो जायगी)।’ तदनन्तर मैंने कहीं भी कुण्ठित न होनेवाले दिव्य, अभेद्य, अत्यन्त शक्तिशाली, सब कुछ सहन करनेमें समर्थ, प्रिय तथा परम कान्तिमान् आग्नेयास्त्रका अपने धनुषपर संधान किया। वह अस्त्र युद्धमें दानवोंका अन्त करनेवाला था॥ २८-२९ ॥
यक्षाणां रक्षसानां च दानवानां च संयुगे । राज्ञां च प्रतिलोमानां भस्मान्तकरणं महत् ॥ ३० ॥