भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 185, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 185

इतना ही नहीं, वह यक्षों, राक्षसों, दानवों तथा विपक्षी राजाओंको भी भस्म कर डालनेवाला और महान् था ॥ ३० ॥ क्षुरान्तममलं चक्रं कालान्तकयमोपमम् । अनुमन्त्र्याहमतुलं द्विषतां विनिबर्हणम् ॥ ३१ ॥ जहि सौभं स्ववीर्येण ये चात्र रिपवो मम । इत्युक्त्वा भुजवीर्येण तस्मै प्राहिणवं रुषा ॥ ३२ ॥ वह आग्नेयास्त्र (सुदर्शन) चक्रके रूपमें था। उसके परिधिभागमें सब ओर तीखे छुरे लगे हुए थे। वह उज्ज्वल अस्त्र काल, यम और अन्तकके समान भयंकर था। उस शत्रुनाशक अनुपम अस्त्रको अभिमन्त्रित करके मैंने कहा—'तुम अपनी शक्तिसे सौभविमान और उसपर रहनेवाले मेरे शत्रुओंको मार डालो।' ऐसा कहकर अपने बाहुबलसे रोषपूर्वक मैंने वह अस्त्र सौभ-विमानकी ओर चलाया ॥ ३१-३२ ॥ रूपं सुदर्शनस्यासीदाकाशे पततस्तदा । द्वितीयस्येव सूर्यस्य युगान्ते प्रपतिष्यतः ॥ ३३ ॥ आकाशमें जाते ही उस सुदर्शन चक्रका स्वरूप प्रलयकालमें उगनेवाले द्वितीय सूर्यके समान प्रकाशित हो उठा ॥ ३३ ॥ तत् समासाद्य नगरं सौभं व्यपगतत्विषम् । मध्येन पाटयामास क्रकचो दार्विवोच्छ्रितम् ॥ ३४ ॥ उस दिव्यास्त्रने सौभनगरमें पहुँचकर उसे श्रीहीन कर दिया और जैसे आरा ऊँचे काठको चीर डालता है, उसी प्रकार सौभविमानको बीचसे काट डाला ॥ ३४ ॥ द्विधा कृतं ततः सौभं सुदर्शनबलाद्धतम् । महेश्वरशरोद्धूतं पपात त्रिपुरं यथा ॥ ३५ ॥ सुदर्शन चक्रकी शक्तिसे कटकर दो टुकड़ोंमें बँटा हुआ सौभविमान महादेवजीके बाणोंसे छिन्न-भिन्न हुए त्रिपुरकी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ ३५ ॥ तस्मिन् निपतिते सौभे चक्रमागात् करं मम । पुनश्चादाय वेगेन शाल्वायेत्यहमब्रुवम् ॥ ३६ ॥ सौभविमानके गिरनेपर चक्र फिर मेरे हाथमें आ गया। मैंने फिर उसे लेकर वेगपूर्वक चलाया और कहा—'अबकी बार शाल्वको मारनेके लिये तुम्हें छोड़ रहा हूँ' ॥ ३६ ॥ ततः शाल्वं गदां गुर्वीमाविध्यन्तं महाहवे । द्विधा चकार सहसा प्रजज्वाल च तेजसा ॥ ३७ ॥ तब उस चक्रने महासमरमें बड़ी भारी गदा घुमानेवाले शाल्वके सहसा दो टुकड़े कर दिये और वह तेजसे प्रज्वलित हो उठा ॥ ३७ ॥

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