महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतस्मिन् विनिहते वीरे दानवास्त्रस्तचेतसः । हाहाभूता दिशो जग्मुरर्दिता मम सायकैः ॥ ३८ ॥ वीर शाल्वके मारे जानेपर दानवोंके मनमें भय समा गया। वे मेरे बाणोंसे पीड़ित हो हाहाकार करते हुए सब दिशाओंमें भाग गये ।। ३८ ।।
ततोऽहं समवस्थाप्य रथं सौभसमीपतः । शङ्खं प्रध्माप्य हर्षेण सुहृदः पर्यहर्षयम् ॥ ३९ ॥ तब मैंने सौभविमानके समीप अपने रथको खड़ा करके प्रसन्नतापूर्वक शंख बजाकर सभी सुहृदोंको हर्षमें निमग्न कर दिया ।। ३९ ।।
तन्मेरुशिखराकारं विध्वस्ताट्टालगोपुरम् । दह्यमानमभिप्रेक्ष्य स्त्रियस्ताः सम्प्रदुद्रुवुः ॥ ४० ॥ मेरुपर्वतके शिखरके समान आकृतिवाले सौभ-नगरकी अट्टालिका और गोपुर सभी नष्ट हो गये। उसे जलते देख उसपर रहनेवाली स्त्रियाँ इधर-उधर भाग गयीं ।। ४० ।।
एवं निहत्य समरे सौभं शाल्वं निपात्य च । आनर्तान् पुनरागम्य सुहृदां प्रीतिमावहम् ॥ ४१ ॥