भारतकोश
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महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

सर्वैः पराक्रमैर्वीर वध्यः शत्रुरमित्रहन् । न शत्रुरवमन्तव्यो दुर्बलोऽपि बलीयसा ॥ २३ ॥ ‘शत्रुहन्ता वीरवर! आपको सारा पराक्रम लगाकर इस शत्रु का वध कर डालना चाहिये। कोई कितना ही बलवान् क्यों न हो, उसे अपने दुर्बल शत्रु की भी अवहेलना नहीं करनी चाहिये॥ २३ ॥

योऽपि स्यात् पीठगः कश्चित् किं पुनः समरे स्थितः । स त्वं पुरुषशार्दूल सर्वयत्नैरिमं प्रभो ॥ २४ ॥ जहि वृष्णिकुलश्रेष्ठ मा त्वां कालोऽत्यगात् पुनः । नैष मार्दवसाध्यो वै मतो नापि सखा तव ॥ २५ ॥ येन त्वं योधितो वीर द्वारका चावमर्दिता । एवमादि तु कौन्तेय श्रुत्वाहं सारथेर्वचः ॥ २६ ॥ तत्त्वमेतदिति ज्ञात्वा युद्धे मतिमधारयम् । वधाय शाल्वराजस्य सौभस्य च निपातने ॥ २७ ॥ ‘कोई शत्रु अपने घरमें आसनपर बैठा हो (युद्ध न करना चाहता हो), तो भी उसे नष्ट करनेमें नहीं चूकना चाहिये; फिर जो संग्राममें युद्ध करनेके लिये खड़ा हो, उसकी तो बात ही क्या है? अतः पुरुषसिंह! प्रभो! आप सभी उपायोंसे इस शत्रुको मार डालिये। वृष्णिवंशावतंस! इस कार्यमें आपको पुनः विलम्ब नहीं करना चाहिये। यह मृदुतापूर्ण उपायसे वशमें आनेवाला नहीं। वास्तवमें यह आपका मित्र भी नहीं है; क्योंकि वीर! इसने आपके साथ युद्ध किया और द्वारकापुरीको तहस-नहस कर दिया, अतः इसको शीघ्र मार डालना चाहिये।’ कुन्तीनन्दन! सारथिके मुखसे इस तरहकी बातें सुनकर मैंने सोचा, यह ठीक ही तो कहता है। यह विचारकर मैंने शाल्वराजका वध करने और सौभविमानको मार गिरानेके लिये युद्धमें मन लगा दिया॥ २४—२७ ॥

दारुकं चाब्रुवं वीर मुहूर्तं स्थीयतामिति । ततोऽप्रतिहतं दिव्यमभेद्यमतिवीर्यवत् ॥ २८ ॥ आग्नेयमस्त्रं दयितं सर्वसाहं महाप्रभम् । योजयं तत्र धनुषा दानवान्तकरं रणे ॥ २९ ॥ वीर! तत्पश्चात् मैंने दारुकसे कहा—‘सारथे! दो घड़ी और ठहरो (फिर तुम्हारी इच्छा पूरी हो जायगी)।’ तदनन्तर मैंने कहीं भी कुण्ठित न होनेवाले दिव्य, अभेद्य, अत्यन्त शक्तिशाली, सब कुछ सहन करनेमें समर्थ, प्रिय तथा परम कान्तिमान् आग्नेयास्त्रका अपने धनुषपर संधान किया। वह अस्त्र युद्धमें दानवोंका अन्त करनेवाला था॥ २८-२९ ॥

यक्षाणां रक्षसानां च दानवानां च संयुगे । राज्ञां च प्रतिलोमानां भस्मान्तकरणं महत् ॥ ३० ॥

इतना ही नहीं, वह यक्षों, राक्षसों, दानवों तथा विपक्षी राजाओंको भी भस्म कर डालनेवाला और महान् था ॥ ३० ॥ क्षुरान्तममलं चक्रं कालान्तकयमोपमम् । अनुमन्त्र्याहमतुलं द्विषतां विनिबर्हणम् ॥ ३१ ॥ जहि सौभं स्ववीर्येण ये चात्र रिपवो मम । इत्युक्त्वा भुजवीर्येण तस्मै प्राहिणवं रुषा ॥ ३२ ॥ वह आग्नेयास्त्र (सुदर्शन) चक्रके रूपमें था। उसके परिधिभागमें सब ओर तीखे छुरे लगे हुए थे। वह उज्ज्वल अस्त्र काल, यम और अन्तकके समान भयंकर था। उस शत्रुनाशक अनुपम अस्त्रको अभिमन्त्रित करके मैंने कहा—'तुम अपनी शक्तिसे सौभविमान और उसपर रहनेवाले मेरे शत्रुओंको मार डालो।' ऐसा कहकर अपने बाहुबलसे रोषपूर्वक मैंने वह अस्त्र सौभ-विमानकी ओर चलाया ॥ ३१-३२ ॥ रूपं सुदर्शनस्यासीदाकाशे पततस्तदा । द्वितीयस्येव सूर्यस्य युगान्ते प्रपतिष्यतः ॥ ३३ ॥ आकाशमें जाते ही उस सुदर्शन चक्रका स्वरूप प्रलयकालमें उगनेवाले द्वितीय सूर्यके समान प्रकाशित हो उठा ॥ ३३ ॥ तत् समासाद्य नगरं सौभं व्यपगतत्विषम् । मध्येन पाटयामास क्रकचो दार्विवोच्छ्रितम् ॥ ३४ ॥ उस दिव्यास्त्रने सौभनगरमें पहुँचकर उसे श्रीहीन कर दिया और जैसे आरा ऊँचे काठको चीर डालता है, उसी प्रकार सौभविमानको बीचसे काट डाला ॥ ३४ ॥ द्विधा कृतं ततः सौभं सुदर्शनबलाद्धतम् । महेश्वरशरोद्धूतं पपात त्रिपुरं यथा ॥ ३५ ॥ सुदर्शन चक्रकी शक्तिसे कटकर दो टुकड़ोंमें बँटा हुआ सौभविमान महादेवजीके बाणोंसे छिन्न-भिन्न हुए त्रिपुरकी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ ३५ ॥ तस्मिन् निपतिते सौभे चक्रमागात् करं मम । पुनश्चादाय वेगेन शाल्वायेत्यहमब्रुवम् ॥ ३६ ॥ सौभविमानके गिरनेपर चक्र फिर मेरे हाथमें आ गया। मैंने फिर उसे लेकर वेगपूर्वक चलाया और कहा—'अबकी बार शाल्वको मारनेके लिये तुम्हें छोड़ रहा हूँ' ॥ ३६ ॥ ततः शाल्वं गदां गुर्वीमाविध्यन्तं महाहवे । द्विधा चकार सहसा प्रजज्वाल च तेजसा ॥ ३७ ॥ तब उस चक्रने महासमरमें बड़ी भारी गदा घुमानेवाले शाल्वके सहसा दो टुकड़े कर दिये और वह तेजसे प्रज्वलित हो उठा ॥ ३७ ॥

तस्मिन् विनिहते वीरे दानवास्त्रस्तचेतसः । हाहाभूता दिशो जग्मुरर्दिता मम सायकैः ॥ ३८ ॥ वीर शाल्वके मारे जानेपर दानवोंके मनमें भय समा गया। वे मेरे बाणोंसे पीड़ित हो हाहाकार करते हुए सब दिशाओंमें भाग गये ।। ३८ ।।

ततोऽहं समवस्थाप्य रथं सौभसमीपतः । शङ्खं प्रध्माप्य हर्षेण सुहृदः पर्यहर्षयम् ॥ ३९ ॥ तब मैंने सौभविमानके समीप अपने रथको खड़ा करके प्रसन्नतापूर्वक शंख बजाकर सभी सुहृदोंको हर्षमें निमग्न कर दिया ।। ३९ ।।

तन्मेरुशिखराकारं विध्वस्ताट्टालगोपुरम् । दह्यमानमभिप्रेक्ष्य स्त्रियस्ताः सम्प्रदुद्रुवुः ॥ ४० ॥ मेरुपर्वतके शिखरके समान आकृतिवाले सौभ-नगरकी अट्टालिका और गोपुर सभी नष्ट हो गये। उसे जलते देख उसपर रहनेवाली स्त्रियाँ इधर-उधर भाग गयीं ।। ४० ।।

एवं निहत्य समरे सौभं शाल्वं निपात्य च । आनर्तान् पुनरागम्य सुहृदां प्रीतिमावहम् ॥ ४१ ॥

धर्मराज! इस प्रकार युद्धमें सौभविमान तथा राजा शाल्वको नष्ट करके मैं पुनः आनर्तनगर (द्वारका)-में लौट आया और सुहृदोंका हर्ष बढ़ाया ॥ ४१ ॥

तदेतत् कारणं राजन् यदहं नागसाह्वयम् ।
नागमं परवीरघ्न न हि जीवेत् सुयोधनः ॥ ४२ ॥
मय्यागतेऽथवा वीर द्यूतं न भविता तथा ।
अद्याहं किं करिष्यामि भिन्नसेतुरिवोदकम् ॥ ४३ ॥

राजन्! यही कारण है, जिससे मैं उन दिनों हस्तिनापुरमें न आ सका। शत्रुवीरोंका नाश करनेवाले धर्मराज! मेरे आनेपर या तो जूआ नहीं होता या दुर्योधन जीवित नहीं रह पाता। जैसे बाँध टूट जानेपर पानीको कोई नहीं रोक सकता, उसी प्रकार आज जबकि सब कुछ बिगड़ चुका है, तब मैं क्या कर सकूँगा ॥ ४२-४३ ॥

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्त्वा महाबाहुः कौरवं पुरुषोत्तमः ।
आमन्त्र्य प्रययौ श्रीमान् पाण्डवान् मधुसूदनः ॥ ४४ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! ऐसा कहकर पुरुषोंमें श्रेष्ठ महाबाहु श्रीमान् मधुसूदन कुरुनन्दन युधिष्ठिरकी आज्ञा लेकर द्वारकाकी ओर चले ॥ ४४ ॥

अभिवाद्य महाबाहुर्धर्मराजं युधिष्ठिरम् ।
राज्ञा मूर्ध्न्युपाघ्रातो भीमेन च महाभुजः ॥ ४५ ॥

महाबाहु श्रीकृष्णने धर्मराज युधिष्ठिरको प्रणाम किया। राजा युधिष्ठिर तथा भीमने बड़ी-बड़ी भुजाओंवाले श्रीकृष्णका सिर सूँघा ॥ ४५ ॥

परिष्वक्तश्चार्जुनेन यमाभ्यां चाभिवादितः ।
सम्मानितश्च धौम्येन द्रौपद्या चार्चितोऽश्रुभिः ॥ ४६ ॥

अर्जुनने उनको हृदयसे लगाया और नकुल-सहदेवने उनके चरणोंमें प्रणाम किया। पुरोहित धौम्यजीने उनका सम्मान किया तथा द्रौपदीने अपने आँसुओंसे उनकी अर्चना की ॥ ४६ ॥

सुभद्रामभिमन्युं च रथमारोप्य काञ्चनम् ।
आरुरोह रथं कृष्णः पाण्डवैरभिपूजितः ॥ ४७ ॥

पाण्डवोंसे सम्मानित श्रीकृष्ण सुभद्रा और अभिमन्युको अपने सुवर्णमय रथपर बैठाकर स्वयं भी उसपर आरूढ़ हुए ॥ ४७ ॥

शैब्यसुग्रीवयुक्तेन रथेनादित्यवर्चसा ।
द्वारकां प्रययौ कृष्णः समाश्वास्य युधिष्ठिरम् ॥ ४८ ॥

उस रथमें शैब्य और सुग्रीव नामक घोड़े जुते हुए थे और वह सूर्यके समान तेजस्वी प्रतीत होता था। युधिष्ठिरको आश्वासन देकर श्रीकृष्ण उसी रथके द्वारा द्वारकापुरीकी ओर

चल दिये ॥ ४८ ॥
ततः प्रयाते दाशार्हे धृष्टद्युम्नोऽपि पार्षतः ।
द्रौपदेयानुपादाय प्रययौ स्वपुरं तदा ॥ ४९ ॥
श्रीकृष्णके चले जानेपर द्रुपदपुत्र धृष्टद्युम्नने भी द्रौपदीकुमारोंको साथ ले अपनी राजधानीको प्रस्थान किया ॥ ४९ ॥
धृष्टकेतुः स्वसारं च समादायाथ चेदिराट् ।
जगाम पाण्डवान् दृष्ट्वा रम्यां शुक्तिमतीं पुरीम् ॥ ५० ॥
चेदिराज धृष्टकेतु भी अपनी बहिन करेणुमतीको, जो नकुलकी भार्या थी, साथ ले पाण्डवोंसे मिल-जुलकर अपनी सुरम्य राजधानी शुक्तिमतीपुरीको चले गये ॥ ५० ॥
केकयाश्चाप्यनुज्ञाताः कौन्तेयेनामितौजसा ।
आमन्त्र्य पाण्डवान् सर्वान् प्रययुस्तेऽपि भारत ॥ ५१ ॥
भारत! केकयराजकुमार भी अमित तेजस्वी कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरकी आज्ञा पा समस्त पाण्डवोंसे विदा लेकर अपने नगरको चले गये ॥ ५१ ॥
ब्राह्मणाश्च विशश्चैव तथा विषयवासिनः ।
विसृज्यमानाः सुभृशं न त्यजन्ति स्म पाण्डवान् ॥ ५२ ॥
युधिष्ठिरके राज्यमें रहनेवाले ब्राह्मण तथा वैश्य बारंबार विदा करनेपर भी पाण्डवोंको छोड़कर जाना नहीं चाहते थे ॥ ५२ ॥
समवायः स राजेन्द्र सुमहानद्भुतदर्शनः ।
आसीन्महात्मनां तेषां काम्यके भरतर्षभ ॥ ५३ ॥
भरतवंशभूषण महाराज जनमेजय! उस समय काम्यकवनमें उन महात्माओंका बड़ा अद्भुत सम्मेलन जुटा था ॥ ५३ ॥
युधिष्ठिरस्तु विप्रांस्ताननुमान्य महामनाः ।
शशास पुरुषान् काले रथान् योजयतेति वै ॥ ५४ ॥
तदनन्तर महामना युधिष्ठिरने सब ब्राह्मणोंकी अनुमतिसे अपने सेवकोंको समयपर आज्ञा दी—‘रथोंको जोतकर तैयार करो’ ॥ ५४ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अर्जुनाभिगमनपर्वणि सौभवधोपाख्याने
द्वाविंशोऽध्यायः ॥ २२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत अर्जुनाभिगमनपर्वमें सौभवधोपाख्यानविषयक
बाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २२ ॥

अध्याय (पृष्ठ 189)

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त्रयोविंशोऽध्यायः

पाण्डवोंका द्वैतवनमें जानेके लिये उद्यत होना और प्रजावर्गकी व्याकुलता

वैशम्पायन उवाच

तस्मिन् दशार्हाधिपतौ प्रयाते
युधिष्ठिरो भीमसेनार्जुनौ च ।
यमौ च कृष्णा च पुरोहितश्च
रथान् महार्हान् परमाश्वयुक्तान् ॥ १ ॥
आस्थाय वीराः सहिता वनाय
प्रतस्थिरे भूतपतिप्रकाशाः ।
हिरण्यनिष्कान् वसनानि गाश्च
प्रदाय शिक्षाक्षरमन्त्रविद्भ्यः ॥ २ ॥

**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! यादवकुलके अधिपति भगवान् श्रीकृष्णके चले जानेपर युधिष्ठिर, भीमसेन, अर्जुन, नकुल, सहदेव, द्रौपदी और पुरोहित धौम्य उत्तम घोड़ोंसे जुते हुए बहुमूल्य रथोंपर बैठे। फिर भूतनाथ भगवान् शंकरके समान सुशोभित होनेवाले वे सभी वीर एक साथ दूसरे वनमें जानेके लिये उद्यत हुए। वेद-वेदांग और मन्त्रके जाननेवाले ब्राह्मणोंको सोनेकी मुद्राएँ, वस्त्र तथा गौएँ प्रदान करके उन्होंने यात्रा प्रारम्भ की ॥ १-२ ॥

प्रेष्याः पुरो विंशतिरात्तशस्त्रा
धनूंषि शस्त्राणि शरांश्च दीप्तान् ।
मौर्वीश्च यन्त्राणि च सायकांश्च
सर्वे समादाय जघन्यमीयुः ॥ ३ ॥

भगवान् श्रीकृष्णके साथ बीस सेवक अस्त्र-शस्त्रोंसे सुसज्जित हो धनुष, तेजस्वी बाण, शस्त्र, डोरी, यन्त्र और अनेक प्रकारके सायक लेकर पहले ही पश्चिम दिशामें स्थित द्वारकापुरीकी ओर चले गये थे ॥ ३ ॥

ततस्तु वासांसि च राजपुत्र्या
धात्र्यश्च दास्यश्च विभूषणं च ।
तदिन्द्रसेनस्त्वरितः प्रगृह्य
जघन्यमेवोपययौ रथेन ॥ ४ ॥

तदनन्तर सारथि इन्द्रसेन राजकुमारी सुभद्राके वस्त्र, आभूषण, धायों तथा दासियोंको लेकर तुरंत ही रथके द्वारा द्वारकापुरीको चल दिया ।। ४ ।। ततः कुरुश्रेष्ठमुपेत्य पौराः प्रदक्षिणं चक्रुरदीनसत्त्वाः । तं ब्राह्मणाश्चाभ्यवदन् प्रसन्ना मुख्याश्च सर्वे कुरुजाङ्गलानाम् ॥ ५ ॥ इसके बाद उदार हृदयवाले पुरवासियोंने कुरुश्रेष्ठ युधिष्ठिरके पास जा उनकी परिक्रमा की। कुरुजांगलदेशके ब्राह्मणों तथा सभी प्रमुख लोगोंने उनसे प्रसन्नतापूर्वक बातचीत की ।। ५ ।। स चापि तानभ्यवदत् प्रसन्नः सहैव तैर्भ्रातृभिर्धर्मराजः । तस्थौ च तत्राधिपतिर्महात्मा दृष्ट्वा जनौघं कुरुजाङ्गलानाम् ॥ ६ ॥ अपने भाइयोंसहित धर्मराज युधिष्ठिरने भी प्रसन्न होकर उन सबसे वार्तालाप किया। कुरुजांगलदेशके उस जनसमुदायको देखकर महात्मा राजा युधिष्ठिर थोड़ी देरके लिये वहाँ ठहर गये ।। ६ ।। पितेव पुत्रेषु स तेषु भावं चक्रे कुरूणामृषभो महात्मा । ते चापि तस्मिन् भरतप्रबर्हे तदा बभूवुः पितरीव पुत्राः ॥ ७ ॥ जैसे पिताका अपने पुत्रोंपर वात्सल्यभाव होता है, उसी प्रकार कुरुश्रेष्ठ महात्मा युधिष्ठिरने उन सबके प्रति अपने आन्तरिक स्नेहका परिचय दिया। वे भी उन भरतश्रेष्ठ युधिष्ठिरके प्रति वैसे ही अनुरक्त थे, जैसे पुत्र अपने पितापर ।। ७ ।। ततस्तमासाद्य महाजनौघाः कुरुप्रवीरं परिवार्य तस्थुः । हा नाथ हा धर्म इति ब्रुवाणा भीताश्च सर्वेऽश्रुमुखाश्च राजन् ॥ ८ ॥ वरः कुरूणामधिपः प्रजानां पितेव पुत्रानपहाय चास्मान् । पौरानिमाञ्जानपदांश्च सर्वान् हित्वा प्रयातः क्व नु धर्मराजः ॥ ९ ॥ उस महान् जनसमुदाय (प्रजा)-के लोग कुरुकुलके प्रमुख वीर युधिष्ठिरके पास जा उन्हें चारों ओरसे घेरकर खड़े हो गये। राजन्! उस समय उन सबके मुखपर आँसुओंकी

धारा बह रही थी और वे वियोगके भयसे भीत हो हा नाथ! हा धर्म! इस प्रकार पुकारते हुए कह रहे थे—‘कुरुवंशके श्रेष्ठ अधिपति, प्रजाजनोंपर पिताका-सा स्नेह रखनेवाले धर्मराज युधिष्ठिर हम सब पुत्रों, पुरवासियों तथा समस्त देशवासियोंको छोड़कर अब कहाँ चले जा रहे हैं? ।। ८-९ ।।

धिग् धार्तराष्ट्रं सुनृशंसबुद्धिं धिक् सौबलं पापमतिं च कर्णम् । अनर्थमिच्छन्ति नरेन्द्र पापा ये धर्मनित्यस्य सतस्तवैवम् ।। १० ।। ‘क्रूरबुद्धि धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधनको धिक्कार है। सुबलपुत्र शकुनि तथा पापपूर्ण विचार रखनेवाले कर्णको भी धिक्कार है, जो पापी सदा धर्ममें तत्पर रहनेवाले आपका इस प्रकार अनर्थ करना चाहते हैं ।। १० ।।

स्वयं निवेश्याप्रतिमं महात्मा पुरं महादेवपुरप्रकाशम् । शतक्रतुप्रस्थममेयकर्मा हित्वा प्रयातः क्व नु धर्मराजः ।। ११ ।। ‘जिन महात्माने स्वयं ही पुरुषार्थ करके महादेवजीके नगर कैलासकी-सी सुषमावाले अनुपम इन्द्रप्रस्थ नामक नगरको बसाया था, वे अचिन्त्यकर्मा धर्मराज युधिष्ठिर अपनी उस पुरीको छोड़कर अब कहाँ जा रहे हैं? ।। ११ ।।

चकार यामप्रतिमां महात्मा सभां मयो देवसभाप्रकाशाम् । तां देवगुप्तामिव देवमायां हित्वा प्रयातः क्व नु धर्मराजः ।। १२ ।। ‘महामना मयदानवने देवताओंकी सभाके समान सुशोभित होनेवाली जिस अनुपम सभाका निर्माण किया था, देवताओंद्वारा रक्षित देवमायाके समान उस सभाका परित्याग करके धर्मराज युधिष्ठिर कहाँ चले जा रहे हैं?’ ।। १२ ।।

तान् धर्मकामार्थविदुत्तमौजा बीभत्सुरुच्चैः सहितानुवाच । आदास्यते वासमिमं निरुष्य वनेषु राजा द्विषतां यशांसि ।। १३ ।। धर्म, अर्थ और कामके ज्ञाता उत्तम पराक्रमी अर्जुनने उन सब प्रजाजनोंको सम्बोधित करके उच्च स्वरसे कहा—‘राजा युधिष्ठिर इस वनवासकी अवधि पूर्ण करके शत्रुओंका यश छीन लेंगे ।। १३ ।।

द्विजातिमुख्याः सहिताः पृथक् च

भवद्भिरासाद्य तपस्विनश्च ।
प्रसाद्य धर्मार्थविदश्च वाच्या
यथार्थसिद्धिः परमा भवेन्नः ॥ १४ ॥

‘आपलोग एक साथ या अलग-अलग श्रेष्ठ ब्राह्मणों, तपस्वियों तथा धर्म-अर्थके ज्ञाता महापुरुषोंको प्रसन्न करके उन सबसे यह प्रार्थना करें, जिससे हमलोगोंके अभीष्ट मनोरथकी उत्तम सिद्धि हो’ ॥ १४ ॥
इत्येवमुक्ते वचनेऽर्जुनेन
ते ब्राह्मणाः सर्ववर्णाश्च राजन् ।
मुदाभ्यनन्दन् सहिताश्च चक्रुः
प्रदक्षिणं धर्मभृतां वरिष्ठम् ॥ १५ ॥

राजन्! अर्जुनके ऐसा कहनेपर ब्राह्मणों तथा अन्य सब वर्णके लोगोंने एक स्वरसे प्रसन्नतापूर्वक उनकी बातका अभिनन्दन किया तथा धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ युधिष्ठिरकी परिक्रमा की ॥ १५ ॥
आमन्त्र्य पार्थं च वृकोदरं च
धनंजयं याज्ञसेनीं यमौ च ।
प्रतस्थिरे राष्ट्रमपेतहर्षा
युधिष्ठिरेणानुमता यथास्वम् ॥ १६ ॥

तदनन्तर सब लोग कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर, भीमसेन, अर्जुन, द्रौपदी तथा नकुल-सहदेवसे विदा ले एवं युधिष्ठिरकी अनुमति प्राप्त करके उदास होकर अपने राष्ट्रको प्रस्थित हुए ॥ १६ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अर्जुनाभिगमनपर्वणि द्वैतवनप्रवेशे त्रयोविंशोऽध्यायः ॥ २३ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत अर्जुनाभिगमनपर्वमें द्वैतवनप्रवेशविषयक तेईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २३ ॥

अध्याय (पृष्ठ 193)

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चतुर्विंशोऽध्यायः

पाण्डवोंका द्वैतवनमें जाना

वैशम्पायन उवाच

ततस्तेषु प्रयातेषु कौन्तेयः सत्यसंगरः ।
अभ्यभाषत धर्मात्मा भ्रातॄन् सर्वान् युधिष्ठिरः ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तदनन्तर प्रजाजनोंके चले जानेपर सत्यप्रतिज्ञ एवं धर्मात्मा कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरने अपने सब भाइयोंसे कहा— ॥ १ ॥

द्वादशेमानि वर्षाणि वस्तव्यं निर्जने वने ।
समीक्षध्वं महारण्ये देशं बहुमृगद्विजम् ॥ २ ॥
‘हमलोगोंको इन आगामी बारह वर्षोंतक निर्जन वनमें निवास करना है, अतः इस महान् वनमें कोई ऐसा स्थान ढूँढ़ो, जहाँ बहुत-से पशु-पक्षी निवास करते हों ॥ २ ॥

बहुपुष्पफलं रम्यं शिवं पुण्यजनावृतम् ।
यत्रेमाः शरदः सर्वाः सुखं प्रतिवसेमहि ॥ ३ ॥
‘जहाँ फल-फूलोंकी अधिकता हो, जो देखनेमें रमणीय एवं कल्याणकारी हो तथा जहाँ बहुत-से पुण्यात्मा पुरुष रहते हों। वह स्थान इस योग्य होना चाहिये, जहाँ हम सब लोग इन बारह वर्षोंतक सुखपूर्वक रह सकें’ ॥ ३ ॥

एवमुक्ते प्रत्युवाच धर्मराजं धनंजयः ।
गुरुवन्मानवगुरुं मानयित्वा मनस्विनम् ॥ ४ ॥
धर्मराजके ऐसा कहनेपर अर्जुनने उन मनस्वी मानवगुरु युधिष्ठिरका गुरुतुल्य सम्मान करके उनसे इस प्रकार कहा ॥ ४ ॥

अर्जुन उवाच

भवानेव महर्षीणां वृद्धानां पर्युपासिता ।
अज्ञातं मानुषे लोके भवतो नास्ति किंचन ॥ ५ ॥
**अर्जुन बोले—**आर्य! आप स्वयं ही बड़े-बड़े ऋषियों तथा वृद्ध पुरुषोंका संग करनेवाले हैं। इस मनुष्यलोकमें कोई ऐसी वस्तु नहीं है, जो आपको ज्ञात न हो ॥ ५ ॥

त्वया ह्युपासिता नित्यं ब्राह्मणा भरतर्षभ ।
द्वैपायनप्रभृतयो नारदश्च महातपाः ॥ ६ ॥
भरतश्रेष्ठ! आपने सदा द्वैपायन आदि बहुत-से ब्राह्मणों तथा महातपस्वी नारदजीकी उपासना की है ॥ ६ ॥

यः सर्वलोकद्वाराणि नित्यं संचरते वशी ।

देवलोकाद् ब्रह्मलोकं गन्धर्वाप्सरसामपि ॥ ७ ॥ जो मन और इन्द्रियोंको वशमें रखकर सदा सम्पूर्ण लोकोंमें विचरते रहते हैं। देवलोकसे लेकर ब्रह्मलोक तथा गन्धर्वों और अप्सराओंके लोकोंमें भी उनकी पहुँच है ॥ ७ ॥

अनुभावांश्च जानासि ब्राह्मणानां न संशयः । प्रभावांश्चैव वेत्थ त्वं सर्वेषामेव पार्थिव ॥ ८ ॥ राजन्! आप सभी ब्राह्मणोंके अनुभव और प्रभावको जानते हैं, इसमें संशय नहीं है ॥ ८ ॥

त्वमेव राजन् जानासि श्रेयःकारणमेव च । यत्रेच्छसि महाराज निवासं तत्र कुर्महे ॥ ९ ॥ राजन्! आप ही श्रेय (मोक्ष)-के कारणका ज्ञान रखते हैं। महाराज! आपकी जहाँ इच्छा हो वहीं हमलोग निवास करेंगे ॥ ९ ॥

इदं द्वैतवनं नाम सरः पुण्यजलोचितम् । बहुपुष्पफलं रम्यं नानाद्विजनिषेवितम् ॥ १० ॥ यह जो पवित्र जलसे भरा हुआ सरोवर है, इसका नाम द्वैतवन है। यहाँ फल और फूलोंकी बहुलता है। देखनेमें यह स्थान रमणीय तथा अनेक ब्राह्मणोंसे सेवित है ॥ १० ॥

अत्रेमा द्वादश समा विहरेमेति रोचये । यदि तेऽनुमतं राजन् किमन्यन्मन्यते भवान् ॥ ११ ॥ मेरी इच्छा है कि यहीं हमलोग इन बारह वर्षोंतक निवास करें। राजन्! यदि आपकी अनुमति हो तो द्वैतवनके समीप रहा जाय। अथवा आप दूसरे किस स्थानको उत्तम मानते हैं ॥ ११ ॥

युधिष्ठिर उवाच

ममाप्येतन्मतं पार्थ त्वया यत् समुदाहृतम् । गच्छामः पुण्यविख्यातं महद् द्वैतवनं सरः ॥ १२ ॥ युधिष्ठिरने कहा—पार्थ! तुमने जैसा बताया है, वही मेरा भी मत है। हमलोग पवित्र जलके कारण प्रसिद्ध द्वैतवन नामक विशाल सरोवरके समीप चलें ॥ १२ ॥

वैशम्पायन उवाच

ततस्ते प्रययुः सर्वे पाण्डवा धर्मचारिणः । ब्राह्मणैर्बहुभिः सार्धं पुण्यं द्वैतवनं सरः ॥ १३ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तदनन्तर वे सभी धर्मात्मा पाण्डव बहुत-से ब्राह्मणोंके साथ पवित्र द्वैतवन नामक सरोवरको चले गये ॥ १३ ॥

ब्राह्मणाः साग्निहोत्राश्च तथैव च निरग्नयः ।

स्वाध्यायिनो भिक्षवश्च तथैव वनवासिनः ॥ १४ ॥ बहवो ब्राह्मणास्तत्र परिवव्रुर्युधिष्ठिरम् । तपःसिद्धा महात्मानः शतशः संशितव्रताः ॥ १५ ॥ वहाँ बहुत-से अग्निहोत्री ब्राह्मणों, निरग्निकों, स्वाध्यायपरायण ब्रह्मचारियों, वानप्रस्थियों, संन्यासियों, सैकड़ों कठोर व्रतका पालन करनेवाले तपःसिद्ध महात्माओं तथा अन्य अनेक ब्राह्मणोंने महाराज युधिष्ठिरको घेर लिया ॥ १४-१५ ॥ ते यात्वा पाण्डवास्तत्र ब्राह्मणैर्बहुभिः सह । पुण्यं द्वैतवनं रम्यं विविशुर्भरतर्षभाः ॥ १६ ॥ वहाँ पहुँचकर भरतश्रेष्ठ पाण्डवोंने बहुत-से ब्राह्मणोंके साथ पवित्र एवं रमणीय द्वैतवनमें प्रवेश किया ॥ १६ ॥ तमालतालाम्रमधूकनीप- कदम्बसर्जार्जुनकर्णिकारैः । तपात्यये पुष्पधरैरुपेतं महावनं राष्ट्रपतिर्ददर्श ॥ १७ ॥ राष्ट्रपति युधिष्ठिरने देखा, वह महान् वन तमाल, ताल, आम, महुआ, नीप, कदम्ब, साल, अर्जुन और कनेर आदि वृक्षोंसे, जो ग्रीष्म-ऋतु बीतनेपर फूल धारण करते हैं, सम्पन्न है ॥ १७ ॥ महाद्रुमाणां शिखरेषु तस्थु- र्मनोरमां वाचमुदीरयन्तः । मयूरदात्यूहचकोरसङ्घा- स्तस्मिन् वने बर्हिणकोकिलाश्च ॥ १८ ॥ उस वनमें बड़े-बड़े वृक्षोंकी ऊँची शाखाओं-पर मयूर, चातक, चकोर, बर्हिण तथा कोकिल आदि पक्षी मनको भानेवाली मीठी बोली बोलते हुए बैठे थे ॥ १८ ॥ करेणुयूथैः सह यूथपानां मदोत्कटानामचलप्रभाणाम् । महान्ति यूथानि महाद्विपानां तस्मिन् वने राष्ट्रपतिर्ददर्श ॥ १९ ॥ राष्ट्रपति युधिष्ठिरको उस वनमें पर्वतोंके समान प्रतीत होनेवाले मदोन्मत्त गजराजोंके, जो एक-एक यूथके अधिपति थे, हथिनियोंके साथ विचरनेवाले कितने ही भारी-भारी झुंड दिखायी दिये ॥ १९ ॥ मनोरमां भोगवतीमुपेत्य पूतात्मनां चीरजटाधराणाम् । तस्मिन् वने धर्मभृतां निवासे

ददर्श सिद्धर्षिगणानेकान् ॥ २० ॥ मनोरम भोगवती (सरस्वती) नदीमें स्नान करके जिनके अन्तःकरण पवित्र हो गये हैं, जो वल्कल और जटा धारण करते हैं, ऐसे धर्मात्माओंके निवासभूत उस वनमें राजाने सिद्धमहर्षियोंके अनेक समुदाय देखे ॥ २० ॥

ततः स यानादवरुह्य राजा सभ्रातृकः सजनः काननं तत् । विवेश धर्मात्मवतां वरिष्ठ- स्त्रिविष्टपं शक्र इवामितौजाः ॥ २१ ॥ तदनन्तर धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ एवं अमित तेजस्वी राजा युधिष्ठिरने अपने सेवकों और भाइयोंसहित रथसे उतरकर स्वर्गमें इन्द्रके समान उस वनमें प्रवेश किया ॥ २१ ॥

तं सत्यसंधं सहसाभिपेतु- र्दिदृक्षवश्चारणसिद्धसङ्घाः । वनौकसश्चापि नरेन्द्रसिंहं मनस्विनं तं परिवार्य तस्थुः ॥ २२ ॥ उस समय उन सत्यप्रतिज्ञ मनस्वी राजसिंह युधिष्ठिरको देखनेकी इच्छासे सहसा बहुत-से चारण, सिद्ध एवं वनवासी महर्षि आये और उन्हें घेरकर खड़े हो गये ॥ २२ ॥

स तत्र सिद्धानभिवाद्य सर्वान् प्रत्यर्चितो राजवद् देववच्च । विवेश सर्वैः सहितो द्विजाग्र्यैः कृताञ्जलिर्धर्मभृतां वरिष्ठः ॥ २३ ॥ वहाँ आये हुए समस्त सिद्धोंको प्रणाम करके धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ युधिष्ठिर उनके द्वारा भी राजा तथा देवताके समान पूजित हुए एवं दोनों हाथ जोड़कर उन्होंने उन समस्त श्रेष्ठ ब्राह्मणोंके साथ वनके भीतर पदार्पण किया ॥ २३ ॥

स पुण्यशीलः पितृवन्महात्मा तपस्विभिर्धर्मपरैरुपैत्य । प्रत्यर्चितः पुष्पधरस्य मूले महाद्रुमस्योपविवेश राजा ॥ २४ ॥ उस वनमें रहनेवाले धर्मपरायण तपस्वियोंने उन पुण्यशील महात्मा राजाके पास जाकर उनका पिताकी भाँति सम्मान किया। तत्पश्चात् राजा युधिष्ठिर फूलोंसे लदे हुए एक महान् वृक्षके नीचे उसकी जड़के समीप बैठे ॥ २४ ॥

भीमश्च कृष्णा च धनंजयश्च
यमौ च ते चानुचरा नरेन्द्रम्।
विमुच्य वाहानवशाश्च सर्वे
तत्रोपतस्थुर्भरतप्रबर्हाः॥ २५॥

तदनन्तर पराधीन-दशामें पड़े हुए भीम, द्रौपदी, अर्जुन, नकुल, सहदेव तथा सेवकगण सवारी छोड़कर उतर गये। वे सभी भरतश्रेष्ठ वीर महाराज युधिष्ठिरके समीप जा बैठे॥ २५॥

लतावतानावनतः स पाण्डवै-
र्महाद्रुमः पञ्चभिरेव धन्विभिः।
बभौ निवासोपगतैर्महात्मभि-
र्महागिरिर्वारणयूथपैरिव॥ २६॥

जैसे महान् पर्वत यूथपति गजराजोंसे सुशोभित होता है, उसी प्रकार, लतासमूहसे झुका हुआ वह महान् वृक्ष वहाँ निवासके लिये आये हुए पाँच धनुर्धर महात्मा पाण्डवोंद्वारा शोभा पाने लगा॥ २६॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अर्जुनाभिगमनपर्वणि द्वैतवनप्रवेशे चतुर्विंशोऽध्यायः ।। २४ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत अर्जुनाभिगमनपर्वमें द्वैतवनप्रवेशविषयक चौबीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। २४ ।।

अध्याय (पृष्ठ 199)

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पञ्चविंशोऽध्यायः

महर्षि मार्कण्डेयका पाण्डवोंको धर्मका आदेश देकर उत्तर दिशाकी ओर प्रस्थान

वैशम्पायन उवाच

तत् काननं प्राप्य नरेन्द्रपुत्राः
सुखोचिता वासमुपेत्य कृच्छ्रम् ।
विजहुरिन्द्रप्रतिमाः शिवेषु
सरस्वतीशालवनेषु तेषु ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! सुख भोगनेके योग्य राजकुमार पाण्डव इन्द्रके समान तेजस्वी थे। वे वनवासके संकटमें पड़कर द्वैतवनमें प्रवेश करके वहाँ सरस्वतीतटवर्ती सुखद शालवनोंमें विहार करने लगे ॥ १ ॥

यतींश्च राजा स मुनींश्च सर्वां-
स्तस्मिन् वने मूलफलैरुदग्रैः ।
द्विजातिमुख्यानृषभः कुरूणां
संतर्पयामास महानुभावः ॥ २ ॥

इष्टीश्च पित्र्याणि तथा क्रियाश्च
महावने वसतां पाण्डवानाम् ।
पुरोहितस्तत्र समृद्धतेजा-
श्चकार धौम्यः पितृवन्नृपाणाम् ॥ ३ ॥

कुरुश्रेष्ठ महानुभाव राजा युधिष्ठिरने उस वनमें रहनेवाले सम्पूर्ण यतियों, मुनियों और श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको उत्तम फल-मूलोंके द्वारा तृप्त किया। अत्यन्त तेजस्वी पुरोहित धौम्य पिताकी भाँति उस महावनमें रहनेवाले राजकुमार पाण्डवोंके यज्ञ-याग, पितृ-श्राद्ध तथा अन्य सत्कर्म करते-कराते रहते थे ॥ २-३ ॥

अपेत्य राष्ट्राद् वसतां तु तेषा-
मृषिः पुराणोऽतिथिराजगाम ।
तमाश्रमं तीव्रसमृद्धतेजा
मार्कण्डेयः श्रीमतां पाण्डवानाम् ॥ ४ ॥

राज्यसे दूर होकर वनमें निवास करनेवाले श्रीमान् पाण्डवोंके उस आश्रमपर उद्दीप्त तेजस्वी पुरातन महर्षि मार्कण्डेयजी अतिथिके रूपमें आये ॥ ४ ॥

तमागतं ज्वलितहुताशनप्रभं

महामनाः कुरुवृषभो युधिष्ठिरः । अपूजयत् सुरऋषिमानवार्चितं महामुनिं ह्यनुपमसत्त्ववीर्यवान् ॥ ५ ॥ उनकी अंग-कान्ति प्रज्वलित अग्निके समान उद्भासित हो रही थी। देवताओं, ऋषियों तथा मनुष्योंद्वारा पूजित महामुनि मार्कण्डेयको आया देख अनुपम धैर्य और पराक्रमसे सम्पन्न महामनस्वी कुरुश्रेष्ठ युधिष्ठिरने उनकी यथावत् पूजा की ॥ ५ ॥

स सर्वविद् द्रौपदीं वीक्ष्य कृष्णां युधिष्ठिरं भीमसेनार्जुनौ च । संस्मृत्य रामं मनसा महात्मा तपस्विमध्येऽस्मयतामितौजाः ॥ ६ ॥ अमित तेजस्वी तथा सर्वज्ञ महात्मा मार्कण्डेयजी द्रुपदकुमारी कृष्णा, युधिष्ठिर, भीमसेन, अर्जुन (और नकुल-सहदेव)-को देखकर मन-ही-मन श्रीरामचन्द्रजीका स्मरण करके तपस्वियोंके बीचमें मुसकराने लगे ॥ ६ ॥

तं धर्मराजो विमना इवाब्रवीत् सर्वे ह्रिया सन्ति तपस्विनोऽमी । भवानिदं किं स्मयतीव हृष्ट- स्तपस्विनां पश्यतां मामुदीक्ष्य ॥ ७ ॥ तब धर्मराज युधिष्ठिरने उदासीन-से होकर पूछा—‘मुने! ये सब तपस्वी तो मेरी अवस्था देखकर कुछ संकुचित-से हो रहे हैं, परंतु क्या कारण है कि आप इन सब महात्माओंके सामने मेरी ओर देखकर प्रसन्नतापूर्वक यों मुसकराते-से दिखायी देते हैं?’ ॥ ७ ॥

मार्कण्डेय उवाच

न तात हृष्यामि न च स्मयामि प्रहर्षजो मां भजते न दर्पः । तवापदं त्वद्य समीक्ष्य रामं सत्यव्रतं दाशरथिं स्मरामि ॥ ८ ॥ **मार्कण्डेयजी बोले—**तात! न तो मैं हर्षित होता हूँ और न मुसकराता ही हूँ। हर्षजनित अभिमान कभी मेरा स्पर्श नहीं कर सकता। आज तुम्हारी यह विपत्ति देखकर मुझे सत्यप्रतिज्ञ दशरथनन्दन श्रीरामचन्द्रजीका स्मरण हो आया ॥ ८ ॥

स चापि राजा सह लक्ष्मणेन वने निवासं पितुरेव शासनात् । धन्वी चरन् पार्थ मयैव दृष्टो

गिरेः पुरा ऋष्यमूकस्य सानौ ॥ ९ ॥ कुन्तीनन्दन! प्राचीनकालकी बात है राजा रामचन्द्रजी भी अपने पिताकी आज्ञासे ही केवल धनुष हाथमें लिये लक्ष्मणके साथ वनमें निवास एवं भ्रमण करते थे। उस समय ऋष्यमूकपर्वतके शिखरपर मैंने ही उनका भी दर्शन किया था ॥ ९ ॥ सहस्रनेत्रप्रतिमो महात्मा यमस्य नेता नमुचेश्च हन्ता । पितुर्निदेशादनघः स्वधर्मं वासं वने दाशरथिश्चकार ॥ १० ॥ दशरथनन्दन श्रीराम सर्वथा निष्पाप थे। इन्द्र उनके दूसरे स्वरूप थे। वे यमराजके भी नियन्ता और नमुचि-जैसे दानवोंके नाशक थे, तो भी उन महात्माने पिताकी आज्ञासे अपना धर्म समझकर वनमें निवास किया ॥ १० ॥ स चापि शक्रस्य समप्रभावो महानुभावः समरेष्वजेयः । विहाय भोगानचरद् वनेषु नेशे बलस्येति चरेदधर्मम् ॥ ११ ॥ जो इन्द्रके समान प्रभावशाली थे, जिनका अनुभव महान् था तथा जो युद्धमें सर्वदा अजेय थे, उन्होंने भी सम्पूर्ण भोगोंका परित्याग करके वनमें निवास किया था। इसलिये अपनेको बलका स्वामी समझकर अधर्म नहीं करना चाहिये ॥ ११ ॥ भूपाश्च नाभागभगीरथादयो महीमिमां सागरान्तां विजित्य । सत्येन तेऽप्यजयंस्तात लोकान् नेशे बलस्येति चरेदधर्मम् ॥ १२ ॥ नाभाग और भगीरथ आदि राजाओंने भी समुद्रपर्यन्त पृथ्‍वीको जीतकर सत्यके द्वारा उत्तम लोकोंपर विजय पायी। इसलिये तात! अपनेको बलका स्वामी मानकर अधर्मका आचरण नहीं करना चाहिये ॥ १२ ॥ अलर्कमाहुर्नरवर्य सन्तं सत्यव्रतं काशिकरूषराजम् । विहाय राज्यानि वसूनि चैव नेशे बलस्येति चरेदधर्मम् ॥ १३ ॥ नरश्रेष्ठ! काशी और करूषदेशके राजा अलर्कको सत्यप्रतिज्ञ संत बताया गया है। उन्होंने राज्य और धन त्यागकर धर्मका आश्रय लिया है। अतः अपनेको अधिक शक्तिशाली समझकर अधर्मका आचरण नहीं करना चाहिये ॥ १३ ॥ धात्रा विधिर्यो विहितः पुराणे-

स्तं पूजयन्तो नरवर्य सन्तः । सप्तर्षयः पार्थ दिवि प्रभान्ति नेशे बलस्येति चरेदधर्मम् ॥ १४ ॥ मनुष्योंमें श्रेष्ठ कुन्तीकुमार! विधाताने पुरातन वेदवाक्योंद्वारा जो अग्निहोत्र आदि कर्मोंका विधान किया है, उसका समादर करनेके कारण ही साधु सप्तर्षिगण देवलोकमें प्रकाशित हो रहे हैं। अतः अपनेको शक्तिशाली मानकर कभी अधर्मका आचरण नहीं करना चाहिये ॥ १४ ॥

महाबलान् पर्वतकूटमात्रान् विषाणिनः पश्य गजान् नरेन्द्र । स्थितान् निदेशे नरवर्य धातु- र्नैशे बलस्येति चरेदधर्मम् ॥ १५ ॥ कुन्तीनन्दन महाराज युधिष्ठिर! पर्वतशिखरके समान ऊँचे और बड़े-बड़े दाँतोंवाले इन महाबली गजराजोंकी ओर तो देखो। ये भी विधाताके आदेशका पालन करनेमें लगे हैं। इसलिये मैं शक्तिका स्वामी हूँ ऐसा समझकर कभी अधर्माचरण न करे ॥ १५ ॥

सर्वाणि भूतानि नरेन्द्र पश्य तथा यथावद् विहितं विधात्रा । स्वयोनितः कर्म सदा चरन्ति नेशे बलस्येति चरेदधर्मम् ॥ १६ ॥ नरेन्द्र! देखो, ये समस्त प्राणी विधाताके विधानके अनुसार अपनी योनिके अनुरूप सदा कार्य करते रहते हैं, अतः अपनेको बलका स्वामी समझकर अधर्म न करे ॥ १६ ॥

सत्येन धर्मेण यथार्हवृत्त्या ह्रिया तथा सर्वभूतान्यतीत्य । यशश्च तेजश्च तवापि दीप्तं विभावसोर्भास्करस्येव पार्थ ॥ १७ ॥ कुन्तीनन्दन! तुम अपने सत्य, धर्म, यथायोग्य बर्ताव तथा लज्जा आदि सद्गुणोंके कारण समस्त प्राणियोंसे ऊँचे उठे हुए हो। तुम्हारा यश और तेज अग्नि तथा सूर्यके समान प्रकाशित हो रहा है ॥ १७ ॥

यथाप्रतिज्ञं च महानुभाव कृच्छ्रं वने वासमिमं निरुष्य । ततः श्रियं तेजसा तेन दीप्ता- मादास्यसे पार्थिव कौरवेभ्यः ॥ १८ ॥ महानुभाव नरेश! तुम अपनी प्रतिज्ञाके अनुसार इस कष्टसाध्य वनवासकी अवधि पूरी करके कौरवोंके हाथसे अपनी तेजस्विनी राजलक्ष्मीको प्राप्त कर लोगे ॥ १८ ॥

वैशम्पायन उवाच

तमेवमुक्त्वा वचनं महर्षि- स्तपस्विमध्ये सहितं सुहृद्भिः । आमन्त्र्य धौम्यं सहितांश्च पार्था- स्ततः प्रतस्थे दिशमुत्तरां सः ॥ १९ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तपस्वी महात्माओंके बीचमें अपने सुहृदोंके साथ बैठे हुए धर्मराज युधिष्ठिरसे पूर्वोक्त बातें कहकर महर्षि मार्कण्डेय धौम्य एवं समस्त पाण्डवोंसे विदा ले उत्तर दिशाकी ओर चल दिये ॥ १९ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अर्जुनाभिगमनपर्वणि द्वैतवनप्रवेशे पञ्चविंशोऽध्यायः ॥ २५ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत अर्जुनाभिगमनपर्वमें द्वैतवनप्रवेशविषयक पचीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २५ ॥