महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंधारा बह रही थी और वे वियोगके भयसे भीत हो हा नाथ! हा धर्म! इस प्रकार पुकारते हुए कह रहे थे—‘कुरुवंशके श्रेष्ठ अधिपति, प्रजाजनोंपर पिताका-सा स्नेह रखनेवाले धर्मराज युधिष्ठिर हम सब पुत्रों, पुरवासियों तथा समस्त देशवासियोंको छोड़कर अब कहाँ चले जा रहे हैं? ।। ८-९ ।।
धिग् धार्तराष्ट्रं सुनृशंसबुद्धिं धिक् सौबलं पापमतिं च कर्णम् । अनर्थमिच्छन्ति नरेन्द्र पापा ये धर्मनित्यस्य सतस्तवैवम् ।। १० ।। ‘क्रूरबुद्धि धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधनको धिक्कार है। सुबलपुत्र शकुनि तथा पापपूर्ण विचार रखनेवाले कर्णको भी धिक्कार है, जो पापी सदा धर्ममें तत्पर रहनेवाले आपका इस प्रकार अनर्थ करना चाहते हैं ।। १० ।।
स्वयं निवेश्याप्रतिमं महात्मा पुरं महादेवपुरप्रकाशम् । शतक्रतुप्रस्थममेयकर्मा हित्वा प्रयातः क्व नु धर्मराजः ।। ११ ।। ‘जिन महात्माने स्वयं ही पुरुषार्थ करके महादेवजीके नगर कैलासकी-सी सुषमावाले अनुपम इन्द्रप्रस्थ नामक नगरको बसाया था, वे अचिन्त्यकर्मा धर्मराज युधिष्ठिर अपनी उस पुरीको छोड़कर अब कहाँ जा रहे हैं? ।। ११ ।।
चकार यामप्रतिमां महात्मा सभां मयो देवसभाप्रकाशाम् । तां देवगुप्तामिव देवमायां हित्वा प्रयातः क्व नु धर्मराजः ।। १२ ।। ‘महामना मयदानवने देवताओंकी सभाके समान सुशोभित होनेवाली जिस अनुपम सभाका निर्माण किया था, देवताओंद्वारा रक्षित देवमायाके समान उस सभाका परित्याग करके धर्मराज युधिष्ठिर कहाँ चले जा रहे हैं?’ ।। १२ ।।
तान् धर्मकामार्थविदुत्तमौजा बीभत्सुरुच्चैः सहितानुवाच । आदास्यते वासमिमं निरुष्य वनेषु राजा द्विषतां यशांसि ।। १३ ।। धर्म, अर्थ और कामके ज्ञाता उत्तम पराक्रमी अर्जुनने उन सब प्रजाजनोंको सम्बोधित करके उच्च स्वरसे कहा—‘राजा युधिष्ठिर इस वनवासकी अवधि पूर्ण करके शत्रुओंका यश छीन लेंगे ।। १३ ।।
द्विजातिमुख्याः सहिताः पृथक् च