भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 190

तदनन्तर सारथि इन्द्रसेन राजकुमारी सुभद्राके वस्त्र, आभूषण, धायों तथा दासियोंको लेकर तुरंत ही रथके द्वारा द्वारकापुरीको चल दिया ।। ४ ।। ततः कुरुश्रेष्ठमुपेत्य पौराः प्रदक्षिणं चक्रुरदीनसत्त्वाः । तं ब्राह्मणाश्चाभ्यवदन् प्रसन्ना मुख्याश्च सर्वे कुरुजाङ्गलानाम् ॥ ५ ॥ इसके बाद उदार हृदयवाले पुरवासियोंने कुरुश्रेष्ठ युधिष्ठिरके पास जा उनकी परिक्रमा की। कुरुजांगलदेशके ब्राह्मणों तथा सभी प्रमुख लोगोंने उनसे प्रसन्नतापूर्वक बातचीत की ।। ५ ।। स चापि तानभ्यवदत् प्रसन्नः सहैव तैर्भ्रातृभिर्धर्मराजः । तस्थौ च तत्राधिपतिर्महात्मा दृष्ट्वा जनौघं कुरुजाङ्गलानाम् ॥ ६ ॥ अपने भाइयोंसहित धर्मराज युधिष्ठिरने भी प्रसन्न होकर उन सबसे वार्तालाप किया। कुरुजांगलदेशके उस जनसमुदायको देखकर महात्मा राजा युधिष्ठिर थोड़ी देरके लिये वहाँ ठहर गये ।। ६ ।। पितेव पुत्रेषु स तेषु भावं चक्रे कुरूणामृषभो महात्मा । ते चापि तस्मिन् भरतप्रबर्हे तदा बभूवुः पितरीव पुत्राः ॥ ७ ॥ जैसे पिताका अपने पुत्रोंपर वात्सल्यभाव होता है, उसी प्रकार कुरुश्रेष्ठ महात्मा युधिष्ठिरने उन सबके प्रति अपने आन्तरिक स्नेहका परिचय दिया। वे भी उन भरतश्रेष्ठ युधिष्ठिरके प्रति वैसे ही अनुरक्त थे, जैसे पुत्र अपने पितापर ।। ७ ।। ततस्तमासाद्य महाजनौघाः कुरुप्रवीरं परिवार्य तस्थुः । हा नाथ हा धर्म इति ब्रुवाणा भीताश्च सर्वेऽश्रुमुखाश्च राजन् ॥ ८ ॥ वरः कुरूणामधिपः प्रजानां पितेव पुत्रानपहाय चास्मान् । पौरानिमाञ्जानपदांश्च सर्वान् हित्वा प्रयातः क्व नु धर्मराजः ॥ ९ ॥ उस महान् जनसमुदाय (प्रजा)-के लोग कुरुकुलके प्रमुख वीर युधिष्ठिरके पास जा उन्हें चारों ओरसे घेरकर खड़े हो गये। राजन्! उस समय उन सबके मुखपर आँसुओंकी