महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1849, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंरामस्तु पुनराशङ्क्य पौरजानपदागमम् । प्रविवेश महारण्यं शरभङ्गाश्रमं प्रति ॥ ४० ॥ श्रीरामचन्द्रजीने वहाँ नगर और जनपदके लोगोंके बराबर आने-जानेकी आशंकासे शरभंग मुनिके आश्रमके पास विशाल वनमें प्रवेश किया ॥ ४० ॥
सत्कृत्य शरभङ्गं स दण्डकारण्यमाश्रितः । नदीं गोदावरीं रम्यामाश्रित्य न्यवसत् तदा ॥ ४१ ॥ वहाँ शरभंग मुनिका सत्कार करके वे दण्डकारण्यमें चले गये और वहाँ सुरम्य गोदावरी नदीके तटका आश्रय लेकर रहने लगे ॥ ४१ ॥
वसतस्तस्य रामस्य ततः शूर्पणखाकृतम् । खरेणासीन्महद् वैरं जनस्थाननिवासिना ॥ ४२ ॥ वहाँ रहते समय शूर्पणखाके (नाक, कान और ओंठ काटनेके) कारण श्रीरामचन्द्रजीका जनस्थान-निवासी खर नामक राक्षसके साथ महान् वैर हो गया ॥ ४२ ॥
रक्षार्थं तापसानां तु राघवो धर्मवत्सलः । चतुर्दश सहस्राणि जघान भुवि रक्षसाम् ॥ ४३ ॥
दूषणं च खरं चैव निहत्य सुमहाबलौ । चक्रे क्षेमं पुनर्धीमान् धर्मारण्यं स राघवः ॥ ४४ ॥