भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 1850

धर्मवत्सल श्रीरामचन्द्रजीने तपस्वी मुनियोंकी रक्षाके लिये महाबली खर और दूषणको मारकर वहाँके चौदह हजार राक्षसोंका संहार कर डाला तथा उन बुद्धिमान् रघुनाथजीने पुनः उस वनको क्षेमकारक धर्मारण्य बना दिया ।। ४३-४४ ।।

हतेषु तेषु रक्षःसु ततः शूर्पणखा पुनः । ययौ निकृत्तनासोष्ठी लङ्कां भ्रातुर्निवेशनम् ।। ४५ ।। उन राक्षसोंके मारे जानेपर शूर्पणखा, जिसकी नाक और ओंठ काट लिये गये थे, पुनः लंकामें अपने भाई रावणके घर गयी ।। ४५ ।। ततो रावणमभ्येत्य राक्षसी दुःखमूर्च्छिता । पपात पादयोर्भ्रातुः संशुष्करुधिरानना ।। ४६ ।। रावणके पास पहुँचकर वह राक्षसी दुःखसे मूर्च्छित हो भाईके चरणोंमें गिर पड़ी। उसके मुखपर रक्त बहकर सूख गया था ।। ४६ ।। तां तथा विकृतां दृष्ट्वा रावणः क्रोधमूर्च्छितः । उत्पपातासनात् क्रुद्धो दन्तैर्दन्तानुपस्पृशन् ।। ४७ ।। बहिनका रूप इस प्रकार विकृत हुआ देखकर रावण क्रोधसे मूर्च्छित हो उठा और दाँतोंसे दाँत पीसता हुआ रोषपूर्वक आसनसे उठकर खड़ा हो गया ।। ४७ ।। स्वानमात्यान् विसृज्याथ विविक्ते तामुवाच सः ।