भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 1857, कुल 2580 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1857

श्रीरघुनाथजीने एक अमोघ बाण लेकर उस मृगरूपधारी निशाचरको मार डाला॥ २०-२१॥ स रामबाणाभिहतः कृत्वा रामस्वरं तदा ॥ २२ ॥ हा सीते लक्ष्मणेत्येवं चुक्रोशार्तस्वरेण ह । श्रीरामचन्द्रजीके बाणसे आहत हो मरते समय मारीचने उनके ही स्वरमें 'हा सीते, हा लक्ष्मण' कहकर आर्तनाद किया ॥ २२ १/२ ॥ शुश्राव तस्य वैदेही ततस्तां करुणां गिरम् ॥ २३ ॥ सा प्राद्रवद् यतः शब्दस्तामुवाचाथ लक्ष्मणः । अलं ते शङ्कया भीरु को रामं प्रहरिष्यति ॥ २४ ॥ मुहूर्ताद् द्रक्ष्यसे रामं भर्तारं त्वं शुचिस्मिते । विदेहनन्दिनी सीताने भी उसकी वह करुणाभरी पुकार सुनी। उसकी पुकार सुनते ही जिस ओरसे वह आवाज आयी थी, उसी ओर वे दौड़ पड़ीं। तब लक्ष्मणने उनसे कहा—'भीरु! डरनेकी कोई बात नहीं है। भला, कौन ऐसा है, जो भगवान् रामको मार सकेगा? शुचिस्मिते! तुम दो ही घड़ीमें अपने पति भगवान् श्रीरामको यहाँ उपस्थित देखोगी॥ २३-२४ १/२ ॥ इत्युक्ता सा प्ररुदती पर्यशङ्कत लक्ष्मणम् ॥ २५ ॥ हता वै स्त्रीस्वभावेन शुक्लचारित्रभूषणा । सा तं परुषमारब्धा वक्तुं साध्वी पतिव्रता ॥ २६ ॥ लक्ष्मणकी यह बात सुनकर रोती हुई सीताने उन्हें संदेहकी दृष्टिसे देखा। यद्यपि शुद्ध सदाचार ही उनका आभूषण था। वे साध्वी और पतिव्रता थीं; तथापि स्त्री स्वभाववश उस समय उनकी बुद्धि मारी गयी। उन्होंने लक्ष्मणको कठोर बातें सुनानी आरम्भ कीं—॥ २५-२६॥ नैष कामो भवेन्मूढ यं त्वं प्रार्थयसे हृदा । अप्यहं शस्त्रमादाय हन्यामात्मानमात्मना ॥ २७ ॥ पतेयं गिरिशृङ्गाद् वा विशेयं वा हुताशनम् । रामं भर्तारमुत्सृज्य न त्वहं त्वां कथंचन ॥ २८ ॥ निहीनमुपतिष्ठेयं शार्दूली क्रोष्टुकं यथा । 'ओ मूढ़! तुम मन-ही-मन जिस वस्तुको पाना चाहते हो, तुम्हारा वह मनोरथ कभी पूर्ण न होगा। मैं स्वयं तलवार लेकर अपना गला काट लूँगी, पर्वतके शिखरसे कूद पडूँगी अथवा जलती हुई आगमें समा जाऊँगी; परंतु' राम-जैसे स्वामीको छोड़कर तुम-जैसे नीच पुरुषका कदापि वरण न करूँगी। जैसे सिंहिनी सियारको नहीं स्वीकार कर सकती, उसी प्रकार मैं तुम्हें नहीं ग्रहण करूँगी' ॥ २७-२८ १/२ ॥ एतादृशं वचः श्रुत्वा लक्ष्मणः प्रियराघवः ॥ २९ ॥