महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1858, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंपिधाय कर्णौ सद्वृत्तः प्रस्थितो येन राघवः । स रामस्य पदं गृह्य प्रससार धनुर्धरः ॥ ३० ॥ अवीक्षमाणो बिम्बोष्ठीं प्रययौ लक्ष्मणस्तदा । लक्ष्मण सदाचारी तथा श्रीरामचन्द्रजीके प्रेमी थे। उन्होंने सीताके ये कठोर वचन सुनकर अपने दोनों कान बंद कर लिये और उसी मार्गसे चल दिये, जिससे श्रीरामचन्द्रजी गये थे। उस समय लक्ष्मणके हाथमें धनुष था। उन्होंने बिम्बफलके समान अरुण अधरोंवाली सीताकी ओर आँख उठाकर देखातक नहीं। श्रीरामके पदचिह्नोंका अनुसरण करते हुए उन्होंने वहाँसे प्रस्थान कर दिया ॥ २९-३० १/२ ॥ एतस्मिन्नन्तरे रक्षो रावणः प्रत्यदृश्यत ॥ ३१ ॥ अभव्यो भव्यरूपेण भस्मच्छन्न इवानलः । यतिवेषप्रतिच्छन्नो जिहीर्षुस्तामनिन्दिताम् ॥ ३२ ॥ इसी समय अवसर पाकर राक्षस रावण साध्वी सीताको हर ले जानेकी इच्छासे वहाँ दिखायी दिया। वह भयानक निशाचर सुन्दर रूप धारण करके राखमें छिपी हुई आगके समान संन्यासीके वेषमें अपने यथार्थ रूपको छिपाये हुए था ॥ ३१-३२ ॥ सा तमालक्ष्य सम्प्राप्तं धर्मज्ञा जनकात्मजा । निमन्त्रयामास तदा फलमूलाश्नादिभिः ॥ ३३ ॥ उस समय यतिको अपने आश्रमपर आया हुआ देख धर्मको जाननेवाली जनकनन्दिनी सीता फल-मूलके भोजन आदिके अतिथिसत्कारके लिये उसे निमन्त्रित किया ॥ अवमन्य ततः सर्वं स्वरूपं प्रत्यपद्यत । सान्त्वयामास वैदेहीमिति राक्षसपुङ्गवः ॥ ३४ ॥ राक्षसराज रावण सीताकी दी हुई उन सभी वस्तुओंकी अवहेलना करके अपने असली रूपमें प्रकट हो गया और विदेहराजकुमारीको इस प्रकार सान्त्वना देने लगा— ॥ ३४ ॥ सीते राक्षसराजोऽहं रावणो नाम विश्रुतः । मम लङ्कापुरी नाम्ना रम्या पारे महोदधेः ॥ ३५ ॥ 'सीते! मैं राक्षसोंका राजा हूँ। मेरा 'रावण' नाम सर्वत्र विख्यात है। समुद्रके पार बसी हुई रमणीय लंकापुरी मेरी राजधानी है ॥ ३५ ॥ तत्र त्वं नरनारीषु शोभिष्यसि मया सह । भार्या मे भव सुश्रोणि तापसं त्यज राघवम् ॥ ३६ ॥ 'वहाँ नर-नारियोंके बीच मेरे साथ रहकर तुम बड़ी शोभा पाओगी। अतः सुन्दरी! तुम मेरी पत्नी हो जाओ और इस तपस्वी रामको छोड़ दो' ॥ ३६ ॥ एवमादीनि वाक्यानि श्रुत्वा तस्याथ जानकी । पिधाय कर्णौ सुश्रोणी मैवमित्यब्रवीद् वचः ॥ ३७ ॥ प्रपतेद् द्यौः सनक्षत्रा पृथिवी शकलीभवेत् ।