भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 1877

थे ।। ४० ।। रावणोऽपि पुरीं गत्वा लङ्कां कामबलात्कृतः । सीतां निवेशयामास भवने नन्दनोपमे ।। ४१ ।। अशोकवनिकाभ्याशे तापसाश्रमसंनिभे । भर्तृस्मरणतन्वङ्गी तापसीवेषधारिणी ।। ४२ ।। इधर कामके वशीभूत हुए रावणने भी लंकापुरीमें पहुँचकर सीताको अशोकवाटिकाके निकट तपस्वी मुनियोंके आश्रमकी भाँति शान्तिपूर्ण तथा नन्दनवनके समान रमणीय भवनमें ठहराया। पतिका निरन्तर चिन्तन करते-करते सीताका शरीर दुर्बल हो गया था। वे तपस्विनीवेषमें वहाँ रहती थीं ।। ४१-४२ ।। उपवासतपःशीला तत्रास पृथुलेक्षणा । उवास दुःखवसतिं फलमूलकृताशना ।। ४३ ।। उपवास और तपस्या करनेका उनका स्वभाव-सा बन गया था। विशाल नेत्रोंवाली जानकी वहाँ फल-मूल खाकर बड़े दुःखसे दिन बिताती थीं ।। ४३ ।। दिदेश राक्षसीस्तत्र रक्षणे राक्षसाधिपः । प्रासासिशूलपरशुमुद्गरालातधारिणीः ।। ४४ ।। राक्षसराज रावणने सीताकी रक्षाके लिये कुछ राक्षसियोंको नियुक्त कर दिया था, जो भाला, तलवार, त्रिशूल, फरसा, मुद्गर और जलती हुई लुआठी लिये वहाँ पहरा देती थीं ।। ४४ ।। द्व्यक्षीं त्र्यक्षीं ललाटाक्षीं दीर्घजिह्वामजिह्विकाम् । त्रिस्तनीमेकपादां च त्रिजटामेकलोचनाम् ।। ४५ ।। उनमेंसे किसीके दो आँखें थीं, किसीके तीन। किसीके ललाटमें ही आँखें थीं, किसीके बहुत बड़ी जिह्वा थी, तो किसीके जीभ थी ही नहीं। किसीके तीन स्तन थे तो किसीका एक पैर। कोई अपने सिरपर तीन जटाएँ रखती थी तो किसीके एक ही आँख थी ।। ४५ ।। एताश्चान्याश्च दीप्ताक्ष्यः करभोत्कटमूर्धजाः । परिवार्यासिते सीतां दिवारात्रमतन्द्रिताः ।। ४६ ।। ये तथा दूसरी बहुत-सी राक्षसियाँ निद्रा और आलस्यको छोड़कर दिन-रात सीताको घेरे रहती थीं। उनकी आँखें आगकी तरह प्रज्वलित होती थीं और सिरके बाल ऊँटोंके समान रूखे तथा भूरे थे ।। ४६ ।। तास्तु तामायतापाङ्गीं पिशाच्यो दारुणस्वराः । तर्जयन्ति सदा रौद्राः परुषव्यञ्जनस्वराः ।। ४७ ।। वे पिशाची स्त्रियाँ देखनेमें बड़ी भयंकर थीं। उनका स्वर अत्यन्त दारुण था। उनके मुखसे जो स्वर और व्यंजन निकलते थे, वे बड़े कठोर होते थे। वे राक्षसियाँ निम्नांकित बातें कहकर विशाल नेत्रोंवाली सीताको सदा डाँटती-फटकारती रहती थीं— ।। ४७ ।।