महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1878, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंखादाम पाटयामैनां तिलशः प्रविभज्य ताम् ।
येयं भर्तारमस्माकमवमन्येह जीवति ॥ ४८ ॥
‘अरी! यह हमारे स्वामीकी अवहेलना करके अबतक यहाँ जीवित कैसे है? हम इसे
चीर डालें। इसे तिल-तिल काटकर खा जायँ' ॥ ४८ ॥
इत्येवं परिभर्त्सन्तीस्त्रास्यमाना पुनः पुनः ।
भर्तृशोकसमाविष्टा निःश्वस्येदमुवाच ताः ॥ ४९ ॥
इस तरह कठोर वचनोंद्वारा डराने-धमकानेवाली उन राक्षसियोंसे बार-बार डरायी
जाती हुई सीता पतिवियोगके शोकसे संतप्त हो लंबी साँसें खींचती हुई बोलीं- ॥
आर्याः खादत मां शीघ्रं न मे लोभोऽस्ति जीविते ।
विना तं पुण्डरीकाक्षं नीलकुञ्चितमूर्धजम् ॥ ५० ॥
अप्येवाहं निराहारा जीवितप्रियवर्जिता ।
शोषयिष्यामि गात्राणि व्याली तालगता यथा ॥ ५१ ॥
न त्वन्यमभिगच्छेयं पुमांसं राघवादृते ।
इति जानीत सत्यं मे क्रियतां यदनन्तरम् ॥ ५२ ॥
‘बहिनो! तुमलोग शीघ्र मुझे मारकर खा जाओ। अब इस जीवनके लिये मुझे तनिक
भी लोभ नहीं है। मैं काले घुँघराले केश-कलापसे सुशोभित अपने स्वामी कमलनयन
भगवान् श्रीरामके बिना जीना ही नहीं चाहती। प्राणवल्लभ रघुनाथजीके दर्शनसे वंचित
होनेके कारण निराहार ही रहकर ताड़के पेड़पर रहनेवाली नागिनकी तरह मैं अपने
शरीरको सुखा डालूँगी; परंतु श्रीरामके सिवा दूसरे किसी पुरुषका सेवन कदापि नहीं
करूँगी। मेरी इस बातको सत्य समझो और इसके बाद जो कुछ करना हो, करो' ॥ ५०-
५२ ॥
तस्यास्तद् वचनं श्रुत्वा राक्षस्यस्ताः खरस्वनाः ।
आख्यातुं राक्षसेन्द्राय जग्मुस्तत् सर्वमादृताः ॥ ५३ ॥
सीताकी यह बात सुनकर कठोर बोली बोलनेवाली वे राक्षसियाँ राक्षसराज रावणको
आदरपूर्वक वह सब समाचार निवेदन करनेके लिये चली गयीं ॥ ५३ ॥
गतासु तासु सर्वासु त्रिजटा नाम राक्षसी ।
सान्त्वयामास वैदेहीं धर्मज्ञा प्रियवादिनी ॥ ५४ ॥
वहाँ केवल धर्मको जाननेवाली प्रियवादिनी त्रिजटा नामकी राक्षसी रह गयी। अन्य सब
राक्षसियोंके चले जानेपर उसने सीताको सान्त्वना देते हुए कहा- ॥ ५४ ॥
सीते वक्ष्यामि ते किंचिद् विश्वासं कुरु मे सखि ।
भयं त्वं त्यज वामोरु शृणु चेदं वचो मम ॥ ५५ ॥
‘सखी सीते! मैं तुमसे एक बात कहूँगी। तुम मुझपर विश्वास करो। वामोरु! तुम भय
छोड़ो और मेरी यह बात सुनो ॥ ५५ ॥