भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 1879

अविन्ध्यो नाम मेधावी वृद्धो राक्षसपुङ्गवः ।

स रामस्य हितान्वेषी त्वदर्थे हि स मावदत् ॥ ५६ ॥

‘यहाँ अविन्ध्य नामसे प्रसिद्ध एक बुद्धिमान्, वृद्ध और श्रेष्ठ राक्षस रहते हैं जो सदा

श्रीरामचन्द्रजीके हितका चिन्तन करते रहते हैं। उन्होंने तुमसे कहनेके लिये मेरेद्वारा यह

संदेश भेजा है ।। ५६ ।।

सीता मद्वचनाद् वाच्या समाश्वास्य प्रसाद्य च ।

भर्ता ते कुशली रामो लक्ष्मणानुगतो बली ॥ ५७ ॥

सख्यं वानरराजेन शक्रप्रतिमतेजसा ।

कृतवान् राघवः श्रीमांस्त्वदर्थे च समुद्यतः ॥ ५८ ॥

मा च तेऽस्तु भयं भीरु रावणाल्लोकगर्हितात् ।

नलकूबरशापेन रक्षिता ह्यसि नन्दिनि ॥ ५९ ॥

शप्तो ह्येष पुरा पापो वधूं रम्भां परामृशन् ।

न शक्नोत्यवशां नारीमुपैतुमजितेन्द्रियः ॥ ६० ॥

क्षिप्रमेष्यति ते भर्ता सुग्रीवेणाभिरक्षितः ।

सौमित्रिसहितो धीमांस्त्वां चेतो मोक्षयिष्यति ॥ ६१ ॥

‘उनका कहना है कि त्रिजटे! तुम मेरी ओरसे सीताको समझा-बुझाकर संतुष्ट करके

यह कहना कि—‘तुम्हारे स्वामी महाबली श्रीराम लक्ष्मणसहित सकुशल हैं। श्रीमान्

रघुनाथजीने इन्द्रतुल्य तेजस्वी वानरराज सुग्रीवके साथ मैत्री की है और तुम्हें यहाँसे

छुड़ानेके लिये उद्योग आरम्भ कर दिया है; अतः भीरु! अब तुम्हें लोकनिन्दित रावणसे

तनिक भी भय नहीं करना चाहिये। नन्दिनि! नलकूबरने रावणको जो शाप दे रखा है,

उसीसे तुम सदा सुरक्षित रहोगी। कुछ समय पहलेकी बात है, इस पापी रावणने

नलकूबरकी पत्नी एवं अपनी पुत्रवधूके तुल्य रम्भाका स्पर्श किया था, इसीसे उसको शाप

प्राप्त हुआ है। यद्यपि यह रावण जितेन्द्रिय नहीं है, तो भी किसी अवशा—स्वतन्त्रतापूर्वक

उसे न चाहनेवाली नारीके पास नहीं जा सकता है। सुग्रीवद्वारा सुरक्षित तुम्हारे स्वामी

बुद्धिमान् भगवान् श्रीराम अपने भाई लक्ष्मणके साथ शीघ्र ही यहाँ आयेंगे और तुम्हें यहाँसे

छुड़ा ले जायेंगे’ ।। ५७–६१ ।।

स्वप्ना हि सुमहाघोरा दृष्टा मेऽनिष्टदर्शनाः ।

विनाशायस्य दुर्बुद्धेः पौलस्त्यकुलघातिनः ॥ ६२ ॥

(अविन्ध्यका संदेश सुनाकर फिर त्रिजटाने अपनी ओरसे कहा—) ‘सखी! मैंने भी

रातमें बड़े भयंकर स्वप्न देखे हैं, जो इस पुलस्त्यकुल-घातक दुर्बुद्धि रावणके विनाश एवं

अनिष्टकी सूचना देनेवाले हैं ।। ६२ ।।

दारुणो ह्येष दुष्टात्मा क्षुद्रकर्मा निशाचरः ।

स्वभावाच्छीलदोषेण सर्वेषां भयवर्धनः ॥ ६३ ॥