भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 1972

महारण्यं गतश्चापि तपस्तेपे महाव्रतः ॥ ९ ॥
तस्य पुत्रः पुरे जातः संवृद्धश्च तपोवने ।
सत्यवाननुरूपो मे भर्तेति मनसा वृतः ॥ १० ॥
तब अपनी छोटी अवस्थाके पुत्रवाली पत्नीके साथ वे वनमें चले आये और विशाल वनके भीतर रहकर बड़े-बड़े व्रतोंका पालन करते हुए तपस्या करने लगे। उनके एक पुत्र हैं सत्यवान्, जो पैदा तो नगरमें हुए हैं, परंतु उनका पालन-पोषण एवं संवर्धन तपोवनमें हुआ है। वे ही मेरे योग्य पति हैं। उन्हींका मैंने मन-ही-मन वरण किया है ॥ ९-१० ॥

नारद उवाच

अहो बत महत् पापं सावित्र्या नृपते कृतम् ।
अजानन्त्या यदनया गुणवान् सत्यवान् वृतः ॥ ११ ॥
(यह सुनकर) नारदजी बोल उठे—अहो! यह बड़े खेदकी बात है। राजन्! सावित्रीने बिना जाने ही अपना बड़ा अनिष्ट किया है, जो कि इसने सत्यवान्‌को गुणवान् समझकर वरण कर लिया है ॥ ११ ॥
सत्यं वदत्यस्य पिता सत्यं माता प्रभाषते ।
तथास्य ब्राह्मणाश्चक्रुर्नामैतत् सत्यवानिति ॥ १२ ॥
इस राजकुमारके पिता सदा सत्य बोलते हैं। इसकी माता भी सत्यभाषण करती है। इसलिये ब्राह्मणोंने इसका नाम ‘सत्यवान्’ रख दिया था ॥ १२ ॥
बालस्याश्वाः प्रियाश्चास्य करोत्यश्वांश्च मृन्मयान् ।
चित्रेऽपि विलिखत्यश्वांश्चित्राश्व इति चोच्यते ॥ १३ ॥
इस बालकको अश्व बहुत प्रिय हैं। यह मिट्टीके अश्व बनाया करता है और चित्र लिखते समय भी अश्वोंको ही अंकित करता है, अतः इसे ‘चित्राश्व’ भी कहते हैं ॥ १३ ॥

राजोवाच

अपिदानीं स तेजस्वी बुद्धिमान् वा नृपात्मजः ।
क्षमावानपि वा शूरः सत्यवान् पितृवत्सलः ॥ १४ ॥
राजाने पूछा—देवर्षे! इस समय पितृभक्त राजकुमार सत्यवान् तेजस्वी, बुद्धिमान्, क्षमावान् और शूरवीर तो है न? ॥ १४ ॥

नारद उवाच

विवस्वानिव तेजस्वी बृहस्पतिसमो मतौ ।
महेन्द्र इव वीरश्च वसुधेव समन्वितः ॥ १५ ॥
नारदजीने कहा—वह राजकुमार सूर्यके समान तेजस्वी, बृहस्पतिके समान बुद्धिमान्, इन्द्रके समान वीर और पृथ्वीके समान क्षमाशील है ॥ १५ ॥