भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 1973, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 1973

अश्वपतिरुवाच अपि राजात्मजो दाता ब्रह्मण्यश्चापि सत्यवान् । रूपवानप्युदारो वाप्यथवा प्रियदर्शनः ॥ १६ ॥ **अश्वपतिने पूछा—**क्या राजपुत्र सत्यवान् दानी, ब्राह्मणभक्त, रूपवान्, उदार अथवा प्रियदर्शन भी है? ॥

नारद उवाच सांकृते रन्तिदेवस्य स्वशक्त्या दानतः समः । ब्रह्मण्यः सत्यवादी च शिबिरौशीनरो यथा ॥ १७ ॥ **नारदजीने कहा—**सत्यवान् अपनी शक्तिके अनुसार दान देनेमें संकृतिनन्दन रन्तिदेवके समान है तथा उशीनरपुत्र शिबिके समान ब्राह्मणभक्त और सत्यवादी है ॥ १७ ॥

ययातिरिव चोदारः सोमवत् प्रियदर्शनः । रूपेणान्यतमोऽश्विभ्यां द्युमत्सेनसुतो बली ॥ १८ ॥ वह ययातिकी भाँति उदार और चन्द्रमाके समान प्रियदर्शन है। द्युमत्सेनका वह बलवान् पुत्र रूपवान् तो इतना है मानो अश्विनीकुमारोंमेंसे ही एक हो ॥ १८ ॥

स दान्तः स मृदुः शूरः स सत्यः संयतेन्द्रियः । स मैत्रः सोऽनसूयश्च स ह्रीमान् द्युतिमांश्च सः ॥ १९ ॥ वह जितेन्द्रिय, मृदुल, शूरवीर, सत्यस्वरूप, इन्द्रियसंयमी, सबके प्रति मैत्रीभाव रखनेवाला, अदोषदर्शी, लज्जावान् और कान्तिमान् है ॥ १९ ॥

नित्यश्चार्जवं तस्मिन् स्थितिस्तस्यैव च ध्रुवा । संक्षेपतस्तपोवृद्धैः शीलवृद्धैश्च कथ्यते ॥ २० ॥ तप और शीलमें बढ़े हुए वृद्ध पुरुष संक्षेपमें उसके विषयमें ऐसा कहते हैं कि राजकुमार सत्यवान्‌में सरलताका नित्य निवास है और उस सद्गुणमें उसकी अविचल स्थिति है ॥ २० ॥

अश्वपतिरुवाच गुणैरुपेतं सर्वैस्तं भगवन् प्रब्रवीषि मे । दोषानप्यस्य मे ब्रूहि यदि सन्तीह केचन ॥ २१ ॥ **अश्वपति बोले—**भगवन्! आप तो उसे सभी गुणोंसे सम्पन्न ही बता रहे हैं, यदि उसमें कोई दोष हों तो उन्हें भी बतलािये ॥ २१ ॥

नारद उवाच एक एवास्य दोषो हि गुणानाक्रम्य तिष्ठति ।