भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 1978, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 1978

आप सर्वथा मेरे अनुरूप और योग्य हैं। मैं भी आपके योग्य हूँ। आप मेरी इस कन्याको अपने श्रेष्ठ पुत्र सत्यवान्‌की पत्नी एवं अपनी पुत्रवधूके रूपमें ग्रहण कीजिये ॥ १२ ॥

द्युमत्सेन उवाच

पूर्वमेवाभिलषितः सम्बन्धो मे त्वया सह । भ्रष्टराज्यस्त्वहमिति तत एतद् विचारितम् ॥ १३ ॥ **द्युमत्सेन बोले—**महाराज! मैं तो पहलेसे ही आपके साथ सम्बन्ध करना चाहता था; परंतु इस समय अपने राज्यसे भ्रष्ट हो गया हूँ, ऐसा सोचकर मैंने ऐसा विचार कर लिया था कि अब यह सम्बन्ध नहीं हो सकेगा ॥ १३ ॥

अभिप्रायस्त्वयं यो मे पूर्वमेवाभिकाङ्क्षितः । स निर्वर्ततु मेऽद्यैव काङ्क्षितो ह्यसि मेऽतिथिः ॥ १४ ॥ किंतु मेरा यह अभिप्राय, जो मुझे पहलेसे ही अभीष्ट था, यदि आज ही सिद्ध होना चाहता है तो अवश्य हो। आप मेरे मनोवांछित अतिथि हैं ॥ १४ ॥

ततः सर्वान् समानाय्य द्विजानाश्रमवासिनः । यथाविधि समुद्वाहं कारयामासतुर्नृपौ ॥ १५ ॥ तदनन्तर उस आश्रममें रहनेवाले सभी ब्राह्मणोंको बुलाकर दोनों राजाओंने सत्यवान्‌-सावित्रीका विवाह-संस्कार विधिवत् सम्पन्न कराया ॥ १५ ॥

दत्त्वा सोऽश्वपतिः कन्यां यथार्हं सपरिच्छदम् । ययौ स्वमेव भवनं युक्तः परमया मुदा ॥ १६ ॥ राजा अश्वपति दहेजसहित कन्यादान देकर बड़ी प्रसन्नताके साथ अपनी राजधानीको लौट गये ॥ १६ ॥

सत्यवानपि तां भार्यां लब्ध्वा सर्वगुणान्विताम् । मुमुदे सा च तं लब्ध्वा भर्तारं मनसेप्सितम् ॥ १७ ॥ उस सर्वसद्गुणसम्पन्न भार्याको पाकर सत्यवान्‌को बड़ी प्रसन्नता हुई और सत्यवान्‌को अपने मनोवांछित पतिके रूपमें पाकर सावित्रीको भी बड़ा आनन्द हुआ ॥

गते पितरि सर्वाणि संन्यस्याभरणानि सा । जगृहे वल्कलान्येव वस्त्रं काषायमेव च ॥ १८ ॥ पिताके चले जानेपर सावित्री अपने सब आभूषण उतारकर वल्कल तथा गेरुआ वस्त्र पहनने लगी ॥ १८ ॥

परिचारैर्गुणैश्चैव प्रश्रयेण दमेन च । सर्वकामक्रियाभिश्च सर्वेषां तुष्टिमादधे ॥ १९ ॥ सावित्रीने सेवा, गुण, विनय, संयम और सबके मनके अनुसार कार्य करनेसे सभीको प्रसन्न कर लिया ॥ १९ ॥

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