महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1979, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्वश्रूं शरीरसत्कारैः सर्वैराच्छादनादिभिः ।
श्वशुरं देवसत्कारैर्वाचः संयमनेन च ॥ २० ॥
उसने शारीरिक सेवा तथा वस्त्राभूषण आदिके द्वारा सासको और वाणीके संयमपूर्वक देवोचित सत्कारद्वारा ससुरको संतुष्ट किया ॥ २० ॥
तथैव प्रियवादेन नैपुणेन शमेन च ।
रहश्चैवोपचारेण भर्तारं पर्यतोषयत् ॥ २१ ॥
इसी प्रकार मधुर सम्भाषण, कार्य-कुशलता, शान्ति तथा एकान्तसेवाद्वारा पतिदेवको भी सदा प्रसन्न रखा ॥ २१ ॥
एवं तत्राश्रमे तेषां तदा निवसतां सताम् ।
कालस्तपस्यतां कश्चिदपाक्रामत भारत ॥ २२ ॥
भरतनन्दन! इस प्रकार उन सब लोगोंको उस आश्रममें रहकर तपस्या करते कुछ काल व्यतीत हो गया ॥ २२ ॥
सावित्र्या ग्लायमानायास्तिष्ठन्त्यास्तु दिवानिशम् ।
नारदेन यदुक्तं तद् वाक्यं मनसि वर्तते ॥ २३ ॥
इधर सावित्री निरन्तर चिन्तासे गली जा रही थी। दिन-रात सोते-उठते हर समय नारदजीकी कही हुई बात उसके मनमें बनी रहती थी—वह उसे क्षणभरके लिये भी नहीं भूलती थी ॥ २३ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि पतिव्रतामाहात्म्यपर्वणि सावित्र्युपाख्याने
पञ्चनवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २९५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत पतिव्रतामाहात्म्यपर्वमें सावित्री-
उपाख्यानविषयक दो सौ पंचानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २९५ ॥